Sat 19 Jm2 1435 - 19 April 2014
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उस व्यक्ति के रोज़े का हुक्म जो केवल रमज़ान में नमाज़ पढ़ता है

उस व्यक्ति के रोज़े का क्या हुक्म है जो केवल रमज़ान में नमाज़ पढ़ता है बल्कि ऐसा भी होता है कि रोज़ा रखकर भी नमाज़ नहीं पढ़ता है ॽ

उत्तर :

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

जिस व्यक्ति पर भी कुफ्र का हुक्म लगा दिया गया उसके आमाल नष्ट और व्यर्थ हो गए, अल्लाह तआला ने फरमाया :

﴿وَلَوْ أَشْرَكُوا لَحَبِطَ عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ ﴾ [الأنعام : 88]

“यदि ये (चयनित संदेष्टा) लोग भी शिर्क करते तो जो कुछ कार्य ये किया करते थे सब उनसे नष्ट हो जाते।” (सूरतुल अनआमः 88).

तथा अल्लाह तआला ने फरमाया :

﴿وَمَنْ يَكْفُرْ بِالإِيمَانِ فَقَدْ حَبِطَ عَمَلُهُ وَهُوَ فِي الآخِرَةِ مِنَ الْخَاسِرِينَ ﴾ [المائدة : 5]

“और जो ईमान को नकार दे तो उसका अमल नष्ट हो गया और वह परलोक में घाटा उठाने वालों में से होगा।” (सूरतुल मायदाः 5)

विद्वानों का एक समूह इस बात की ओर गया है कि अगर वह उसके अनिवार्य होने का इक़रार करने वाला है तो वह कुफ्र अक्बर (बड़े कुफ्र) का करने वाला नहीं होगा, बल्कि उसका कुफ्र छोटा कुफ्र होगा, और उसका यह कार्य ज़िना (व्यभिचार) और चोरी आदि करने वाले के कार्य से बढ़कर घिनावना और घृणित होगा, इसके बावजूद उनके निकट उसका रोज़ा और हज्ज सही होगा यदि उसने उन्हें शरीअत के अनुसार किया है, लेकिन उसका अपराध नमाज़ की पाबंदी न करना होगा, और वह विद्वानों के एक समूह के निकट बड़े शिर्क में पड़ने के भयानक खतरे पर है। तथा कुछ लोगों ने अधिकांश लोगों का कथन यह उल्लेख किया है कि यदि उसने सुस्ती व लापरवाही के तौर पर नमाज़ छोड़ी है तो वह कुफ्र अक्बर का करने वाला नहीं होगा, बल्कि उसने इसकी वजह से छोटा कुफ्र, एक महा अपराध और एक घिनावनी बुराई की है जो ज़िना, चोरी, माता पिता की अवज्ञा से बढ़कर और शराब पीने से बढ़कर है, - हम अल्लाह तआला से सलामती का प्रश्न करते है -, लेकिन विद्वानों के दो कथनों में से शुद्ध और सही कथन यह है कि उसने कुफ्र अक्बर (महा कुफ्र) किया है, - हम अल्लाह तआला से इस से बचाव का सवाल करते हैं -, उन शरई प्रमाणों के आधार पर जो पीछे गुज़र चुके हैं। अतः जो व्यक्ति रोज़ा रखे और नमाज़ न पढ़े तो उसका रोज़ा नहीं है, और न ही उसका हज्ज सही है।” अंत हुआ।

 

‘‘मजमूओ फतावा शैख इब्न बाज़’’ (15/179)
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