105421: पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मोहब्बत को दिल की छवि बनाकर चिन्हित करना


कुंजियों के कुछ चेन ऐसे पाए जाते हैं जो दिल के आकार पर तराशे गए होते हैं, और वह प्यार का चिन्ह और प्रतीक है, और उसके ऊपर यह लिखा होता है : (मैं, फिर दिल की छवि, पैगंबर) अर्थात् मैं पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्यार करता हूँ। और पीछे यह लिखा होता है : (ऐ मेरे प्रिय ऐ अल्लाह के पैगंबर), और एक दूसरा गोलाकार होता है जिसे सीने पर लटकाया जाता है, और उस पर वही वाक्यांश लिखा होता है, इसी तरह कुछ महिलाओं के बीच ज़नाना कमीच पहनने का चलन है जिस पर बाईं ओर सीने के ऊपर यही इबारत लिखी होती है, तो इन चीज़ों का क्या हुक्म है ?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

“कपड़ों और पदकों इत्यादि पर उपर्युक्त चित्र बनाना और उपर्युक्त वाक्यांश लिखना, इस उम्मत के पूर्वजों के तरीक़े से प्रमाणित नहीं है, जो कि सबसे श्रेष्ठ सदियों के लोग थे और अपने बाद आने वालों से कहीं बढ़कर पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से मोहब्बत और आपका सम्मान करने वाले थे। तथा इसमें दुराचारियों की छवि अपनाना पाया जाता है जो इस तरह के चिन्हों व प्रतीकों को दूसरों के साथ अपने निषिद्ध प्यार और इश्क का प्रमाण बनाते हैं और  इस के बारे में पवित्र शरीअत के हुक्म की उपेक्षा करते हुए इसमें समर्पित हो जाते हैं। तथा उपर्युक्त चित्र से यह भी समझा जाता है कि : रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मोहब्बत आपके अलावा अन्य लोगों के समान ही है, हालाँकि यह बहुत बड़ी त्रुटि और गलती है ; क्योंकि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मोहब्बत शरीअत के दृष्टिकोण से अनिवाय है, और इसके बिना ईमान संपूण नहीं हो सकता। जहाँ तक आपके अलावा से मोहब्बत करने का मामला है तो वह कभी धर्मसंगत होती है और कभी वर्जित होती है। पीछे वर्णित बातों के आधार पर उपर्युक्त वाक्यांश को लिखना, उसको बेचना, खरीदना और प्रयोग करना जायज़ नहीं है।

और अल्लाह तआला ही तौफीक़ प्रदान करने वाला (शक्ति का स्रोत) है, तथा अल्लाह तआला हमारे ईश्दूत मुहम्मद, उनकी संतान और उनके साथियों पर दया और शांति अवतरित करे।” अंत हुआ।

“इफ्ता और वैज्ञानिक अनुसंधान की स्थायी समिति”

शैख अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह आलुश्शैख .. शैख अब्दुल्लाह बिन गुदैयान  ... शैख सालेह अल-फौज़ान ... शैख बकर अबू ज़ैद.

“इफ्ता और वैज्ञानिक अनुसंधान की स्थायी समिति का फतावा” (24/90)
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