10543: ताबीज़ और उसे लटकाने का हुक्म और क्या ताबीज़ से बुरी नज़र और हसद (इर्ष्या) दूर हो जाती है ?


मैं जानना चाहता हूँ कि क्या ताबीज़ पहनने की अनुमति है। मैं ने बिलाल फिलिप्स के द्वारा लिखित किताबुत्तौहीद और कुछ अन्य पुस्तकें पढ़ी हैं, किन्तु मुवत्ता में मुझे कुछ ऐसी हदीसें मिली हैं जो कुछ प्रकार के तीबीज़ को जाइज़ ठहराती हैं। जिस तरह कि किताबुत्तौहीद में उल्लेख हुआ है कि कुछ सलफ ने इस की अनुमति दी है। और ये हदीसें मुवत्ता 50वें भाग में मौजूद हैं, जो हदीस संख्या 4, 11 और 14 के अंतरगत वर्णित हुई हैं। अनुरोध है कि उत्तर दें, और इन हदीसों की प्रामाणिकता से मुझे अवगत करायें, तथा इस विषय के बारे में मुझे अतिरिक्त जानकारी देने की कृपा करें। धन्यवाद।

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

सर्व प्रथमः

हमें उन हदीसों का पता नहीं चल सका जिन की प्रामाणिकता के बारे में प्रश्न कर्ता ने जानकारी चाही है ; क्योंकि हमें ठीक उन्ही हदीसों की जानकारी नहीं मिल सकी। प्रश्न कर्ता ने उल्लेख किया है कि वे मुवत्ता के 50वें भाग में हैं! जबकि मुवत्ता का एक ही भाग है।

इस लिए हम जितना हो सकता है इस विषय में वर्णित हदीसों का उल्लेख करेंगे, और यदि अल्लाह ने चाहा तो उन के बारे में विद्वानों के हुक्म (फैसले) का वर्णन करेंगे, और संभव है कि कुछ हदीसें वही हों जिन के बारे में प्रश्न कर्ता ने जानकारी चाही हैः

1- अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दस चीज़ों को नापसंद करते थेः पीला रंग -अर्थात् खलूक़ नामी सुगंध जिस का रंग पीला होता था- सफेद बालों को परिवर्तित करना, तहबंद घसीटना, सोने की अंगूठी पहनना, नर्द खेलना, महिलाओं का अनुचित रूप से (अर्थात् पति और महरम रिश्तेदारों के अलावा अन्य लोगों के समक्ष) अपने श्रृंगार का प्रदर्शन करना, मुऔविज़ात (सूरतुल फलक़, सूरतुन्नास और अन्य प्रमाणित शरण देने वाली दुआओं) के अलावा से झाड़-फूँक करना, ताबीज़ लटकाना, पत्नी की योनि से बाहर वीर्य पात करना, बच्चे को खराब करना, लेकिन इसे आप ने नापसंद किया है वर्जित घोषित नहीं किया है।" (नसाई हदीस संख्या : 50880, अबू दाऊद : 4222)

बच्चे को खराब करने का मतलब : दूध पिलाने वाली महिला से संभोग करना है, क्योंकि जब वह गर्भवती हो जायेगी तो उस का दूध खराब हो जायेगा। और इसे आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नापसंद किया है हराम नहीं ठहराया है।

इस हदीस को शैख अल्बानी ने "ज़ईफ सुनन नसाई" (हदीस संख्या : 3075) में ज़ईफ (अप्रमाणित) कहा है।

2- अब्दुल्लाह बिन मसऊद की पत्नी ज़ैनब, अब्दुल्लाह बिन मसऊद से रिवायत करती हैं कि उन्हों ने कहा : मैं ने अल्लाह के पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को फरमाते हुये सुना :"झाड़-फूँक, ताबीज़-गण्डा और प्रेम-मंत्र शिर्क है।" वह कहती हैं : मैं ने कहा कि आप ऐसा क्यों कहते हैं ? अल्लाह की क़सम! मेरी आँख दर्द से भड़कती थी और मैं फलाँ यहूदी के पास जाती थी जो मुझे दम करता था, जब वह मुझे दम करता तो वह शांत हो जाती थी। अब्दुल्लाह बिन मसऊद ने कहा : यह शैतान का काम है, वह उस में अपना हाथ चिभोकर उसे भड़का देता था, फिर जब वह उसे दम करता था तो उस से रूक जाता था। तुम्हारे लिए काफी था कि तुम उसी तरह कहती जिस तरह अल्लाह के पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम कहते थे :

"अज़्हिबिल्बास रब्बन्नास, वश्फ़ि अन्तश्शाफ़ी, ला शिफ़ाआ इल्ला शिफ़ाउक्, शिफ़ाअन् ला युग़ादिरो सक़मा"

"ऐ लोगों के रब! कष्ट को दूर कर दे, और स्वास्थ्य प्रदान कर, तू ही स्वास्थ्य प्रदान करने वाला है, तेरे रोग निवारण के अलावा कोई रोग निवारण नहीं, ऐसा रोग निवारण (स्वास्थ्य) प्रदान कर कि कोई बीमारी बाक़ी न रहे।"

इसे अबू दाऊद (हदीस संख्या : 3883) और इब्ने माजा (हदीस संख्या : 3530) ने रिवायत किया है।

इस हदीस को शैख अल्बानी ने "अस्सिलसिला अस्सहीहा" में (हदीस संख्या : 331, तथा 2792 के अंतरगत) सहीह कहा है।

3- उक़्बा बिन आमिर रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्हों ने कहा : मैं ने अल्लाह के पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को फरमाते हुये सुना कि : "जिस ने ताबीज़ लटकाया तो अल्लाह तआला उस के उद्देश्य को पूरा न करे, और जिस ने कौड़ी या घोंघा लटकाया अल्लाह उसे आराम न पहुँचाये।"

इसे इमाम अहमद ने मुसनद (हदीस संख्या : 16951) में रिवायत किया है।

तथा शैख अल्बानी ने "ज़ईफुल जामिअ़" (हदीस संख्या : 5703) में इसे ज़ईफ घोषित किया है।

4- उक़्बा बिन आमिर अल-जुहनी से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास लोगों का एक समूह आया, तो आप ने नौ लोगों से बैअत किया और एक से रूक गये, तो उन्हों ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! आप ने नौ लोगों से बैअत किया और एक को छोड़ दिया। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: "वह ताबीज़ पहने है।" इस पर उस ने अपना हाथ अंदर डाल कर उसे काट दिया, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उस से बैअत कर लिया और फरमाया : "जिस ने ताबीज़ लटकाया उस ने शिर्क किया।"

इसे अहमद ने रिवायत किया है (हदीस संख्या : 16969)

तथा इस हदीस को शैख अल्बानी ने "अस्सिलसिला अस्सहीहा" (हदीस संख्या : 492) में सहीह कहा है।

दूसराः

"तमाइम" (ताबीज़) बहुवचन है "तमीमा" का, इस से अभिप्राय माला या मोती (घोंघे या सीपियाँ इत्यादि) और हड्डियाँ हैं जो बुराई और हानि -और विशेष कर बुरी नज़र- को दूर करने, या लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से बच्चों या बड़ों की गर्दनों में लटकाई जाती हैं, या घरों या कारों (वाहनों) में रखी जाती हैं।

ताबीज़ के प्रकार और उन में से हर एक के हुक्म के बारे में यहाँ विद्वानों के कथनों का उल्लेख किया जा रहा है, जिस में अन्य चेतावनियाँ और फायदे (उप्युक्त बातें) भी हैं :

1- शैख सुलैमान बिन अब्दुल वह्हाब फरमाते हैं :

यह बात जान लो कि सहाबा, ताबेईन और उन के बाद आने वाले विद्वानों ने क़ुर्आन और अल्लाह तआला के नामों और गुणों पर आधारित ताबीज़ों के लटकाने की वैधता (अनुमति) के विषय में मतभेद किया है :

एक समूह का कहना है कि : यह जाइज़ (स्वीकार्य) है, यह अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन अल-आस वगैरा का कथन है, और यही आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से वर्णित कथन प्रतीक होता है, यही कथन अबू जा'फर अल-बाक़िर का, और एक रिवायत के अनुसार इमाम अहमद का भी कथन है, इन लोगों ने ताबीज़ से मना करने वाली हदीसों का अर्थ यह लिया है कि इस से मुराद वो ताबीज़ें हैं जो शिर्क पर आधारित हों, किन्तु वे ताबीज़ें जिन में क़ुरआन और अल्लाह तआला के नाम और गुण हों तो वे इन के द्वारा दम (झाड़ फूँक) करने के समान ही हैं।

मैं कहता हूँ कि : प्रत्यक्ष रूप से इब्नुल क़ैयिम ने इसी कथन को चयन किया है।

दूसरे समूह का कहना है कि : यह जाइज़ (स्वीकार्य) नहीं है, यही इब्ने मसऊद और इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुम का कथन है, तथा यही हुज़ैफा, उक़्बा बिन आमिर और इब्ने अकीम रज़ियल्लाहु अन्हुम का प्रत्यक्ष कथन है, यही कथन ताबेईन की एक जमाअत का है जिन में इब्ने मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु के शागिर्द भी शामिल हैं और एक रिवायत के अनुसार इमाम इहमद का भी कथन है जिसे उन के मानने वालों में से अधिकांश लोगों ने चयन किया है, और बाद में आने लोगों ने निश्चित रूप से इसी कथन का वर्णन किया है। इन लोगों ने इस हदीस और इस के अर्थ में वर्णित अन्य हदीसों से दलील पकड़ी है, क्योंकि इसका प्रत्यक्ष अर्थ यह है कि यह हदीस सामान्य है इस में उस ताबीज़ के बीच जो क़ुर्आन पर आधारित है और उस ताबीज़ के बीच जो क़ुरआन के अतिरिक्त से है कोई अंतर नहीं किया गया है, जबकि झाड़-फूँक (दम) का मामला इस के विपरीत है उस में दोनों के बीच अंतर किया गया है। इस की पुष्टि इस बात से भी होती है कि वो सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम जिन्हों ने इस हदीस को रिवायत किया है उन्हों ने सामान्य अर्थ ही समझा है जैसा कि इब्ने मसऊद के बारे में पीछे बीत चुका है।

तथा अबू दाऊद ने ईसा बिन हमज़ा से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा : मैं अब्दुल्लाह बिन अकीम के पास आया और उनका चेहरा लाल था तो मैं ने कहा : आप कोई ताबीज़ क्यों नहीं लटका लेते ? तो उन्हों ने कहा : हम इस से अल्लाह के शरण में आते हैं, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "जिस ने कोई चीज़ लटकाई वह उसी के हवाले कर दिया जायेगा।"

विद्वानों का यह मतभेद क़ुरआन और अल्लाह तआला के नामों और गुणों (अस्मा व सिफात) को ताबीज बनाकर लटकाने के बारे में है, तो फिर उनके बाद के ज़माने में उत्पन्न होने वाले शैतानों इत्यादि के नामों के द्वारा झाड़ फूँक करने, उनकी ताबीज़ बनाकर लटकाने, बल्कि उन से संबंध स्थापित करने, उन का शरण ढूंढ़ने, उनके लिए जानवरों का बलिदान भेंट करने, और उन से संकट का मोचन और लाभ की प्राप्ति की मांग करने जो कि मात्र शिर्क हैं और बहुत सारे लोगों में प्रचलित है सिवाय उसके जिसे अल्लाह सुरक्षित रखे, इन चीज़ों के बारे में आप का क्या गुमान (विचार) है ? चुनाँचि आप आप उस चीज़ में विचार कीजिये जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने वर्णन किया है और जिस पर आप के सहाबा और ताबेईन क़ाइम थे, और उन के बाद विद्वानों ने इस अध्याय और इस के अलावा किताब के अन्य अध्यायों में जो कुछ उल्लेख किया है, फिर आप उस चीज़ को देखिये जो बाद के लोगों में पैदा हुई हैं, तो आप को रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के र्धम और आज हर चीज़ में उसकी अजनबीयत का स्पष्ट रूप से पता चल जायेगा। अत: अल्लाह तआला ही से मदद मांगी जा सकती है।

"तैसीरुल अज़ीज़िल हमीद" (पृ0 136-138)

2- शैख हाफिज़ हिकमी फरमाते हैं :

अगर ये ताबीज़ क़ुरआन की स्पष्ट आयतें, इसी तरह यदि सहीह स्पष्ट हदीसों से हों तो सहाबा और ताबेईन में से सलफ सालेहीन (पूर्वजों) और उन के बाद आने वाले लोगों के बीच इनके जाइज़ होने के बारे में मतभेद है:

चुनाँचि कुछ सलफ ने इसे जाइज़ कहा है, यह कथन आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा, अबू जा'फर मुहम्मद बिन अली और इनके अलावा अन्य सलफ से वर्णन किया जाता है।

तथा कुछ सलफ ने इस से मना किया है, इसे नापसंद किया है और इसे जाइज़ नहीं समझा है, उन्ही में से अब्दुल्लाह बिन अकीम, अब्दुल्लाह बिन अम्र, उक़्बा बिन आमिर, अब्दुल्लाह बिन मसऊद और उनके शिष्य अस्वद और अलक़मा, तथा उन के बाद आने वाले लोग जैसे इब्राहीम नख़ई वैग़रा रहिमहुमुल्लाह हैं।

इस में कोई सन्देह नहीं कि इस से रोकना (इसकी अनुमति न देना), गलत धारणा के द्वार को बंद करना है, विशेष रूप से हमारे इस ज़माने में ; क्योंकि जब अधिकांश सहाबा व ताबेईन ने उन पवित्र और श्रेष्ठ युगों में जबकि उन के दिलों में ईमान पहाड़ों से भी अधिक था, इसे नापसंद किया है, तो उस का हमारे इस समय में -जो कि फित्नों (उद्रवों) और परीक्षणों का समय है- उस को नापसंद करना अधिक योग्य और उप्युक्त है। और ऐसा क्यों न हो जबकि वे इन छूटों के द्वारा मात्र हराम चीज़ों तक पहुँच गये हैं और इन्हें उनके लिए हीला-बहाना और साधन बना लिया है ? चुनाँचि उन्ही में से यह है कि वे ताबीज़ों में क़ुरआन की कोई आयत या सूरत या बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम या इसी जैसी कोई चीज़ लिखते हैं, फिर उस के नीचे ऐसे शैतानी मंत्र लिखते हैं जिन्हें उनकी किताबों की बाबत जानकारी रखने वाला ही भाँप सकता है, उन्ही में से एक बुराई यह है कि वे आम लोगों के दिलों को अल्लाह तआला पर तवक्कुल (भरोसा) रखने से फेर देते हैं और उन के दिलों को उन चीज़ों से जोड़ देते हैं जिसे उन्हों ने लिखा है, बल्कि उन में से अधिकांश लोग अटकल से उनके बारे में कोई बात कह देते हैं हालांकि वास्तव में उन्हें कोई चीज़ नहीं लगी होती है, चुनाँचि उन में से कोई आदमी ऐसे व्यक्ति के पास आता है जिस के धन को हड़पने के लिए वह चालबाज़ी करना चाहता है, जबकि उसे पता होता है कि वह उस का श्रृद्धालू है, तो उस से कहता है : तुम्हारे परिवार में, या तुम्हारे धन में या स्वयं तुम्हें इस तरह और इस तरह की मुसीबत पहुँचने वाली है, या उस से कहता है कि: तुम्हारे साथ एक जिन्न लगा हुआ है, या इसी तरह कोई और बात कहता है, और उस के लिए कुछ चीज़ें और शैतानी वस्वसे की प्राथमिक बातों का उल्लेख करता है उसे यह भ्रम दिलाते हुए कि वह उस के बारे में सच्ची फिरासत (निपुणता) रखता है उस पर बहुत भय खात है, उसे लाभ पहुँचाने का बहुत लालायित है। जब उस मूर्ख अनाड़ी का दिल उसके लिए वर्णित बातों के कारण भय और डर से भर जाता है, तो उस समय वह अपने पालनहार से उपेक्षा कर लेता है और अपने शरीर और दिल से उस दज्जाल पर ध्यान आकर्षित कर लेता है, उस का आश्रय ढूंढ़ता है और सर्वशक्तिमान अल्लाह को छोड़ कर उसी पर भरोसा करता है और उस से कहता है : आप ने जो कुछ वर्णन किया है उस से किस तरह छुटकारा मिल सकता है ? उस को हटाने का क्या उपाय है ? मानो कि हानि और लाभ पहुँचाना उसी के हाथ में है। उस समय उसके बारे में उसकी आशा वास्तविकता में बदल जाती है और जो कुछ वह उस के लिए खर्च करेगा उसके प्रति उसकी लालच बढ़ जाती है। वह उस से कहता है : यदि तुम मुझे इतना और इतना दे दो तो मैं उस से तुम्हारे लिए इतना लंबा और इतना चौड़ा हिजाब (ताबीज़) लिख दूँगा, और उस से बढ़ा चढ़ा कर और चिकनी चुपड़ी बातें करता है, इस ताबीज़ को उस ने इन-इन बीरियों के कारण लटकाया था। आप का क्या विचार है कि इस आस्था और विश्वास के बावजूद यह छोटे शिर्क में से है ? नहीं बल्कि वह ग़ैरूल्लाह की पूजा है और अल्लाह को छोड़ कर दूसरे पर भरोसा करना और उस के सिवाय दूसरे का आश्रय ढूंढ़ना, और मनुष्यों के कामों की ओर झुकाव और उन्हें उन के धर्म से छीन लेना है। शैतान इस तरह की चालों को मानवजाति में से अपने शैतानी भाई की मदद से ही अंजाम दे सका है। "कह दीजिये कि कौन है जो रात दिन तुम्हारी रक्षा करता है, बल्कि वे अपने पालनहार के स्मरण से मुँह फेरने वाले हैं।" (सूरतुल अंबिया : 42) फिर वह उस में शैतानी मंत्रों के साथ कुछ क़ुर्आन से भी लिखता है और बिना पवित्रता के उसे लटकाता है, उसे छोटी और बड़ी नापाकी लगती है, और वह ताबीज़ सदा उस के साथ होती है, वह किसी भी चीज़ से उसे पवित्र नहीं रखता है। अल्लाह की क़सम! अल्लाह के किताब की उस के दुश्मनों में से किसी ने इतना अपमान नहीं किया जितना अपमान इस्लाम का दावा करने वाले इन ज़िनदीक़ों ने किया है। अल्लाह की क़सम! क़ुरआन केवल उसका पाठ करने, उस के अनुसार अमल करने, उसके आदेशों का पालन करने, उसके प्रतिषेधों और निषेद्धों से बचाव करने, उसके संदेश की पुष्टि करने, उसकी सीमाओं पर रूक जाने, उसके उदाहरणों से इब्रत पकड़ने, उस की कहानियों से पाठ सीखने और उस पर ईमान (विश्वास) रखने के लिये उतरा है। "सब के सब हमारे पालनहार की तरफ से है।" और इनका हाल यह है कि इन्हों ने इन सभी चीज़ों को स्थगित कर दिया है और उसे अपनी पीठ के पीछे फेंक दिया है, उन्हों ने केवल उसके रस्म (शब्द) की रक्षा की है ताकि उस के द्वारा उसी तरह खायें और कमायें जिस तरह कि अन्य साधनों के द्वारा हलाल के बजाय हराम तक पहुँचते हैं। यदि कोई राजा या अमीर अपने अधीनस्थ लोगों के पास पत्र लिखे कि ऐसा करो, और इसे छोड़ दो, और तुम्हारी ओर जो भी हों उन्हें भी इसका आदेश दो और उन्हें इस से रोक दो, इत्यादि। तो वह आदमी उस पत्र को ले ले और न तो उसे पढ़े, न उस के आदेश और निषेद्ध में मनन चिंतन करे, और न ही उसे अपने अलावा उन लोगों तक पहुँचाये जिन तक उसे पहुँचाने का हुक्म दिया गया है, बल्कि उसे लेकर अपने गर्दन या बाज़ू में लटका ले और उस में जो कुछ (आदेश और निषेद्ध) है उसकी ओर बिल्कुल भी ध्यान न दे, तो राजा इस पर उसे बहुत कड़ी सज़ा देगा और बुरी यातना का मज़ा चखायेगा, तो फिर आसमान व धरती के जब्बार के अवतरित किये हुये कलाम (क़ुरआन) के साथ ऐसा रवैया अपनाने वाले आदमी का अंजाम क्या होगा जिस के लिए आसमान व धरती में सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है, और उसी के लिए शुरूआत और अन्त में सर्वप्रशंसा और स्तुति है, और सभी मामले उसी की ओर पलटते हैं, अत: उसकी इबादत करो और उसी पर भरोसा करो, वह मेरे लिए काफी है, उसके सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं, उसी पर मैं ने भरोसा किया है और वह महान सिंहासन का रब (स्वामी) है। और यदि वह ताबीज़ दोनो वह्यों (क़ुर्आन व हदीस) के अलावा से है तो बिना किसी सन्देह के वह शिर्क है, बल्कि वह मुसलमानों की पहचान और उनकी निशानियों से दूर होने में फाल निकालने के तीर के समान है।

और यदि ताबीज़-गण्डे दोनों वह्यों (अर्थात् क़ुर्आन व हदीस) के अलावा से हैं बल्कि यहूदियों, हैकलों, सितारों और फरिश्तों के पुजारियों और जिन्नों की सेवा लेने वालों के मंत्रों से हैं, मोतियों (मालाओं) तांत के तार या लोहे के छल्लों वगैरा से हैं, तो यह  -यानी इन का पहनना- बिना किसी सन्देह के शिर्क है, क्योंकि ये वैध कारणों और परिचित औषधियों में से नहीं हैं, बल्कि उन्हों ने उन के बारे में मात्र आस्था रख लिया है कि वे ऐसे और ऐसे दर्द और तकलीफ को स्वयं दूर कर देते हैं किसी विशेषता के कारण जिसे उन्हों ने उस में गुमान कर लिया है, जैसे कि मूर्तियों के पूजक अपनी मूर्तियों के बारे में आस्था रखते हैं, बल्कि ये फाल निकालने के तीरों के समान हैं जिन्हें जाहिलियत के लोग अपनी जाहिलियत के समय में अपने साथ रखते थे, और जब किसी काम का इरादा करते तो उनके द्वारा भाग्य मालूम करते थे, वे तीन तीर होते थे, जिन में से एक पर लिख होता था कि "करो", दूसरे पर लिखा होता था कि "न करो" और तीसरे पर कुछ भी नहीं होता था, अगर उस के हाथ में वह तीर निकलता जिस पर "करो" लिखा होता था तो वह अपने काम पर रवाना हो जाता, और अगर वह तीर निकलता जिस पर "न करो" लिखा होता तो वह उस काम को छोड़ देता था, या बिना चिन्ह वाला तीर निकलता तो वह दुबारा पांसे निकालता था, और अल्लाह तआला ने हमें इस के बदले में इस से बेहतर चीज़ इस्तिखारा की नमाज़ और उस की दुआ प्रदान की है, और उसी के लिए सर्व प्रशंसा है।

कहने का उद्देश्य यह है कि : ये ताबीज़ और गण्डे जो क़ुरआन व हदीस के अलावा से हैं, गलत धारणा और इस्लाम वालों की पहचान से दूर होने में शरीअत के विरूद्ध होने के पाहलू से फाल निकालने के तीरों के समान हैं, क्योंकि सच्ची और शुद्ध तौहीद वाले लोग इस से बहुत ही दूर होत हैं, और उनके दिलों में ईमान इतना महान होता है कि इस तरह की चीज़ें उस में घुस नहीं सकतीं, और वे अल्लाह के अलावा किसी दूसरे पर भरोसा करने या उस के अलावा किसी दूसरे पर एतिमाद करने से कहीं भढ़कर, वे महान वैभव वाले और सुदृढ़ विश्वास वाले हैं, और अल्लाह तआला ही शक्ति का स्रोत है।" (मआरिजुल क़बूल 2/510-512)

तथा ताबीज़, चाहे वह क़ुरआन ही से क्यों न हो, उस की अनुमति न देने के कथन को हमारे मशाइख ने भी अपनाया है :

3- स्थायी समिति के विद्वानों का कहना है :

जब ताबीज़ क़ुर्आन के अलावा से हो, तो उनका पहनना हराम होने पर बीच मतभेद है, कुछ लोगों ने उस का पहनना जाइज़ कहा है और कुछ लोगों ने इस से विद्वानों की सर्व सहमति है, और जब वे क़ुर्आन से हों तो इस के बारे में विद्वानों के रोका है, और हदीस के सामान्य अर्थ को ध्यान में रखते हुये और बुराई का द्वार बंद करने के उद्देश्य से निषेद्ध का कथन ही उत्तम है।

शैख अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़, शैख अब्दुल्लाह बिन ग़ुदैयान, शैख अब्दुल्लाह बिन क़ऊद।

"फतावा अल्लज्ना अद्दाइमा" (1/212)

4- शैख अल्बानी रहिमहुल्लाह फरमाते हैं :

दीहातियों, किसानों और कुछ नगर के वासियों में यह गुम्राही निरंतर फैली हुई है, इसी के समान वे माले और मोतियाँ भी हैं जिन्हें कुछ डराईवर (गाड़ी वाहक) लोग गाड़ी में अपने सामने रखते हैं या शीशे (ग्लास) पर लटका देते हैं, और कुछ लोग गाड़ी के सामने या उस के पिछले भाग में पुराने जूते लटकाते हैं, और इनके अलावा दूसरे लोग घर या दुकान के सामने घोड़े का नाल लटकाते हैं, ये सब अपने भ्रम के अनुसार बुरी नज़र को दूर करने के लिए करते हैं, और इसके अलावा अन्य चीज़ें जो तौहीद और उसके विपरीत शिर्क और मूर्ति पूजा से अज्ञानता के कारण प्रचलित और फैली हुई हैं, जबकि इन का उन्मूलन और निवारण करने के लिए ही रसूल भेजे गये और किताबें उतारी गईं, अत: आज मुसलमानों की अज्ञानता और धर्म से उनकी दूरी का शिक्वा (शिकायत) अल्लाह तआला ही से है।

"सिलसिला अल-अहादीस अस्सहीहा" (1/890 हदीस संख्या : 492)

और अल्लाह ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखने वाला है।

शैख मुहम्मद सालेह अल-मुनज्जिद
Create Comments