10590: इस्लाम की सहिष्णुता


ग़ैर-मुस्लिमों के लिए हम इस्लाम की सहिष्णुता को कैसे प्रमाणित करें और यह कि वह एक आसान धर्म है ॽ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए येग्य है।

इस्लाम दया व करूणा का धर्म तथा सहिष्णुता और असानी का धर्म है। अल्लाह तआला ने इस उम्मत (समुदाय) पर केवल उसी चीज़ का भार डाला है जो वह कर सकती है, और वह जो भलाई और अच्छाई करेगी उसको उसका पुण्य और बदला मिलेगा और जो कुछ बुराई करेगी उसके ऊपर उसका बोझ होगा, अल्लाह सर्वशक्तिमान ने फरमाया :

﴿لا يُكَلِّفُ اللَّهُ نَفْساً إِلاَّ وُسْعَهَا ﴾   [البقرة : 286]

“अल्लाह तआला किसी प्राणी पर उसकी शक्ति से अधिक भार नहीं डालता।” (सूरतुल बक़रा : 286)

तथा अल्लाह तआला ने सभी धार्मिक कर्तव्यों में मुसलमानों से कष्ट और हर्ज (तंगी) को उठा दिया है, अल्लाह तआला ने फरमाया:

﴿هو اجتباكم وما جعل عليكم في الدين من حرج ﴾ [الحج : 78]

“उसने तुम्हें चुन लिया है और तुम्हारे ऊपर दीन के बारे में कोई तंगी नहीं डाली है।” (सूरतुल हज्ज : 78)

और हर गुनाह जिसमें मुसलमान गलती के कारण, या भूलकर या मजबूर (विवश) किए जाने पर कर बैठता है तो अल्लाह की ओर से क्षम्य है, जैसाकि अल्लाह सर्वशक्तिमान ने फरमाया :

﴿رَبَّنَا لا تُؤَاخِذْنَا إِنْ نَسِينَا أَوْ أَخْطَأْنَا﴾  [البقرة : 286]

“ऐ हमारे पालनहार, यदि हम भूल गए हों या हमसे गलती हो गई हो तो हमारी पकड़ न करना।” (सूरतुल बक़रा : 286)

तो अल्लाह तआला ने फरमाया : मैं ने कर दिया।

और अल्लाह तआला का यह फरमान हैः

﴿وَلَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ فِيمَا أَخْطَأْتُمْ بِهِ وَلَكِنْ مَا تَعَمَّدَتْ قُلُوبُكُمْ ﴾ [الأحزاب :5]

“तुम से भूल चूक में जो कुछ हो जाए उसमें तुम्हारे ऊपर कोई पाप नहीं, किन्तु पाप वह है जिसका तुम हृदय से इरादा करो।” (सूरतुल अहज़ाब : 5)

अल्लाह तआला माफ करने वाला और दयालु है, उसने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को आसानी, सहिष्णुता वाले हनीफियत (सभी चीज़ों से कटकर मात्र अल्लाह की ओर एकागर होने के धर्म) के साथ भेजा है :

﴿يُرِيدُ اللَّهُ بِكُمُ الْيُسْرَ وَلا يُرِيدُ بِكُمُ الْعُسْرَ﴾  [البقرة : 185]

“अल्लाह तआला तुम्हारे साथ आसानी चाहता है, तुम्हारे साथ सख्ती नहीं चाहता है।” (सूरतुल बक़रा : 185)

तथा पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : ‘‘दीन (इस्लाम) आसान है और कोई व्यक्ति दीन में कोई सख्ती और अति नहीं करेगा मगर दीन उस पर गालिब आ जायेगा, अतः तुम (बिना अति और कोताही के) दुरूसतगी (शुद्धता) के अपनाओ, (या नहीं हो सके तो कम से कम) उसके क़रीब रहो, और (अल्लाह के अज्र व सवाब पर) खुश हो जाओ।”  इसे बुखारी /39 ने रिवायत किया है।

शैतान मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है, उसे उसके रब का स्मरण और ज़िक्र भुला देता है और उसके लिए अल्लाह की नाफर्मानी को संवार कर पेश करता है। जैसाकि अल्लाह सर्वशक्तिमान ने फरमाया :

﴿استحوذ عليهم الشيطان فأنساهم ذكر الله أولئك حزب الشيطان ألا إن حزب الشيطان هم الخاسرون ﴾ [المجادلة : 19]

“उन पर शैतान ने प्रभुत्व (गलबा) हासिल कर लिया है और उन्हें अल्लाह की याद से भुला दिया है, ये शैतान की सेना है। सुनो! शैतान की सेना ही घाटा उठाने वाली है।” (सूरतुल मुजादिलह : 19)

दिल की बात (यानी दिल में पैदा होने वाली बात, ख्याल) को अल्लाह तआला ने क्षमा कर दिया है, जैसाकि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :

“अल्लाह तआला ने मेरी उम्मत के हृदयों में जो कल्पनाएं पैदा होती हैं उन्हें क्षमा कर दिया है जब तक कि वे उसके बारे में बात न करें या उस पर अमल न करें। इसे मुस्लिम /127 ने रिवायत किया है।

और जिस व्यक्ति ने कोई नाफर्मानी की, फिर उसे अल्लाह ने उसके ऊपर गुप्त रखा तो उसके लिए उसको बयान करना (उसके बारे में बात-चीत करना) जायज़ नहीं है।

“मेरी उम्मत का हर आदमी आफियत में रहता है सिवाय खुलेआम बुराई करने वालों के।” इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 2990) ने रिवायत किया है।

जब इंसान गुनाह करे फिर तौबा करे तो अल्लाह तआला उसकी तौबा को स्वीकार कर लेता है :

﴿ كتب ربكم على نفسه الرحمة أنه من عمل منكم سوءاً بجهالة ثم تاب من بعده وأصلح فأنه غفور رحيم ﴾ [الأنعام : 54]

“तुम्हारे पालनहार ने अपने ऊपर दया व करूणा को अनिवार्य कर लिया है कि तुम में से जिस ने मूर्खता व अज्ञानता में बुरा काम कर लिया फिर उसके बाद तौबा और सुधार कर लियम तो वह (अल्लाह) बख्शने वाला और दया करने वाला है।” (सूरतुल अंआम : 54).

तथा अल्लाह तआला दानशील और उदार है नेकियों को कई गुना कर देता है और बुराई को क्षमा कर देता है, जैसाकि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने सर्वशक्तिमान पालनहार से रिवायत करते हुए फरमाया : “अल्लाह ने नेकियों और बुराईयों को लिख दिया है, फिर आप ने उसे बयान किया, चुनाँचि जिसने नेकी करने की इच्छा की और उसे नहीं कर सका तो अल्लाह तआला उसे अपने पास एक पूरी नेकी लिख देता है, और यदि वह उसकी इच्छा करता है और उसे करता है तो उसे अल्लाह तआला अपने पास दस नेकियों से लेकर सात सौ गुना तक, (बल्कि) उससे अधिक गुना तक लिख देता है, और जो व्यक्ति बुराई की इच्छा करता है और उसे नहीं करता है तो अल्लाह तआला उसे अपने पास एक संपूर्ण नेकी लिख देता है, और यदि उसने उसकी इच्छी की और उसे कर लिया तो अल्लाह तआला उसे उसके हक़ में एक (ही) बुराई लिखता है।” (बुखारी व मुस्लिम)  बुखारी ने इसे किताबुर्रक़ाइक़ /81 में रिवायत किया है।

शैख मुहम्मद बिन इब्राहीम अत्तुवैजरी की किताब उसूलुद्दीनिल इस्लामी से उद्धृत।
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