Mon 21 Jm2 1435 - 21 April 2014
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 तरावीह की नमाज़ दो दो रकअत है

कुछ इमाम तरावीह़ की नमाज़ में चार रकअतें या उस से अधिक एक ही सलाम में एकत्रित कर देते हैं, दो रकअतों के बीच नहीं बैठते हैं, और यह दावा करते हैं कि यह सुन्नत का काम है। तो क्या इस काम का हमारी पवित्र शरीअत में कोई आधार (असल) है ॽ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

“ यह काम धर्म संगत नहीं है, बल्कि मक्रूह (घृणित) या अधिकांश अहले इल्म के निकट हराम (निषिद्ध) है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : “रात की नमाज़ दो दो रकअत है।” इसकी प्रामाणिकता पर इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा की हदीस से बुखारी व मुस्लिम की सहमति है। तथा इसलिए कि आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से साबित है कि उन्हों ने कहा : “ नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रात को ग्यारह रक्अत नमाज़ पढ़ते थे, प्रति दो रक्अत से सलाम फेरत थे, और एक रक्अत वित्र पढ़ते थे।” इस हदीस की प्रामाणिकता पर बुखारी व मुस्लिम की सहमति है और इस अर्थ की हदीसें बहुत हैं।

जहाँ तक आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की इस सुप्रसिद्ध हदीस का संबंध है कि : “ नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रात को चार रक्अत नमाज़ पढ़ते थे, तो आप उनकी खूबसूरती और लंबाई के बारे में मत पूछिए, फिर आप चार रकअत नमाज़ पढ़ते थे, तो आप उनकी सुंदरता और लंबाई के बारे में मत पूछिए।” (इस हदीस की प्रामाणिकता पर बुखारी व मुस्लिम की सहमति है), तो इसका मतलब यह है कि : आप प्रति दो रकअत से सलाम फेरते थे, उसका मतलब यह नहीं है कि आप चार रक्अतों को एक ही साथ एक सलाम के साथ पढ़ते थे, जैसाकि आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की पिछली हदीस में है, और इसलिए कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से आप का यह फरमान साबित है कि : “ रात की नमाज़ दो दो रकअत है।”, जैसाकि पीछे गुज़र चुका, और हदीसें एक दूसरे की पुष्टि और समर्थन करती हैं, अतः मुसलमान पर अनिवार्य है कि वह सभी हदीसों पर अमल करे, और मुजमल हदीसों की व्याख्या स्पष्ट हदीसों से करे। और अल्लाह तआला ही तौफीक़ प्रदान करने वाला है।” (समाप्त हुआ).

फज़ीलतुश्शैख अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ रहिमहुल्लाह।

“फतावा इस्लामिय्या” (2/156).
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