Thu 24 Jm2 1435 - 24 April 2014
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एहराम की हालत में निषिद्ध चीज़ें

मोहरिम अर्थात हज्ज या उम्रा का एहराम बांधे हुए व्यक्ति के ऊपर किन चीज़ों से बचना अनिवार्य है ॽ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए है।

एहराम की हालत में निषिद्ध चीज़ें : इस से अभिप्राय वे निषिद्ध और वर्जित चीज़े हैं जिनसे मनुष्य को एहराम बाँधने के कारण रोका जाता है, और वे निम्नलिखित हैं:

1- सिर के बाल मुंडाना, क्योंकि अल्लाह तआला का फरमान है :

﴿ ولا تحلقوا رؤوسكم حتى يبلغ الهدي محلَّه ﴾ [البقرة : 196 ]

“और अपने सिर को न मुंडाओ यहाँ तक कि क़ुर्बानी का जानवर अपने स्थान को पहुँच जाए।” (सूरतुल बक़रा : 196)

तथा विद्वानों ने सिर के मुंडाने से ही पूरे शरीर के बालों के मुंडाने को भी संबंधित किया है, तथा यही हुक्म नाखून के तराशने और काटने पर भी लगाया है।

2- एहराम बाँधने (अर्थात हज्ज या उम्रा की नीयत करने) के बाद अपने कपड़े, या शरीर, या अपने खाने या स्नान करने या किसी भी चीज़ में सुगंध का इस्तेमाल करना। चुनांचे एहराम की हालत में सुगंध का इस्तेमाल करना हराम (निषिद्ध) है, क्योंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उस व्यक्ति के बारे में जिसे उसकी ऊँटनी ने गिराकर मार डाला था, फरमाया : “तुम उसे पानी और बेरी के पत्ते से से स्नान कराओ और दो कपड़ों में कफनाओ, और उसके सिर को न ढांपो, और उसे हनूत नामी सुगंध न लगाओ।” (हनूतः एक प्रकार की मिश्रित सुगंध जो मृतकों के शरीर और कफन पर लगाते हैं )।

3- संभोग करना, क्योंकि अल्लाह तआला का फरमान है :

﴿فمن فرض فيهن الحج فلا رفث ولا فسوق ولا جدال في الحج ﴾ [ البقرة: 197]

“अतः जिस ने इन महीनों में हज्ज को फर्ज़ कर लिया, तो हज्ज में कामुकता की बातें, फिस्क़ व फुजूर (अवहेलना) और लड़ाई-झगड़ा नहीं है।” (सूरतुल बक़रा : 197)

4- कामुकता के साथ आलिंग्न करना, क्योंकि यह अल्लाह तआला के फरमान “फला रफसा” (हज्ज में कामुकता की बातें नहीं हैं) के सामान्य अर्थ के अंतर्गत आता है। और इसलिए कि मोहरिम के लिए विवाह करना तथा मंगनी करना जाइज़ नहीं है, इसलिए आलिंग्न करना और अधिक भी जाइज़ नहीं होना चाहिए।

5- शिकार को मारना, क्योंकि अल्लाह तआला का फरमान है :

﴿ يا أيها الذين آمنوا لا تقتلوا الصيد وأنتم حرم ﴾ [ المائدة : 95 ]

“ऐ ईमान वालों, जब तुम (हज्ज या उम्रा के) एहराम की हालत में रहो तो शिकार न करो।” (सूरतुल माइदा : 95)

जहाँ तक वृक्षों को काटने की बात है तो वह मोहरिम पर हराम नहीं है, सिवाय इसके कि वह हरम की सीमाओं के अंदर हो, चाहे वह मोहरिम हो या मोहरिम न हो, इसीलिए अरफा में वृक्षों को उखाड़ना जाइज़ है भले ही वह मोहरिम हो, क्योंकि वृक्षों का काटना हरम से संबंधित है एहराम से उसका संबंध नहीं है।

6- एहराम की हालत में पुरूषों के लिए विशिष्टता के साथ निषिद्ध चीज़ों में से क़मीज (शर्ट), टोपी, पैजामा, पगड़ी, मोज़े का पहनना है, क्योंकि जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा गया कि मोहरिम क्या पहनेगा तो आप ने फरमाया : “वह नहीं पहने गा क़मीज, टोपी, पैजामा, पगड़ी और मोज़ा।) किंतु आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह मुस्तस्ना (अपवाद) किया है कि जो व्यक्ति तहबंद न पाये तो वह पैजामा पहन ले, और जो व्यक्ति जूते न पाये तो मोज़े पहन ले।

इन पाँचों चीज़ों को विद्वानों ने सिले हुए कपड़े पहनने के शब्द से वर्णन किया है, जबकि कुछ सामान्य लोगों को यह भ्रम हुआ है कि सिले हुए कपड़े पहनने का मतलब है ऐसा कपड़ा पहनना जिसमें धागा (सिलाई) हो, जबकि मामला ऐसा नहीं है, बल्कि विद्वानों का मक़सद यह है कि आदमी कोई ऐसा कपड़ा पहने जो शरीर के नाप का तैयार किया गया हो, या उसके कुछ हिस्से के नाप का सिला हुआ हो जैस- कमीज, पैजामा (पतलून), यही उनका मतलब है, इसीलिए यदि मनुष्य पैवंद लगी हुई चादर या पैवंद लगी हुई तहबंद पहन ले तो कोई बात नहीं है, और यदि वह बिना सिलाई के बुनी हुई क़मीज पहन ले तो हराम है।

7- तथा एहराम की हालत में महिलाओं के साथ विशिष्ट निषिद्ध चीज़ों में से नक़ाब है, और नक़ाब यह है कि वह अपने चेहरे को ढांप ले और अपनी दोनों आँखों के लिए इतना खोल ले जिसके द्वारा वह देख सके, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस से रोका है, और इसी के समान बुरक़ा भी है, अतः जब औरत एहराम बांधेगी तो नक़ाब और बुरक़ा नहीं पहनेगी, और उसके लिए धर्म संगत है कि वह अपने चेहरे को खोले रखे सिवाय इसके कि उसके पास से उसके गैर मह्रम लोग गुज़रें, तो ऐसी स्थिति में उसके ऊपर अनिवार्य है कि अपने चेहरे को ढांप ले, और यदि वह उसके चेहरे से छू जाए तो इस में कोई हानि नहीं है।

जो व्यक्ति भूलकर, या अज्ञानता में, या बाध्य किए जाने पर इन निषिद्ध चीज़ों को कर लेता है तो उसके ऊपर कोई चीज़ नहीं है, क्योंकि अल्लाह तआला का फरमान है:

﴿ وليس عليكم جناح فيما أخطأتم به ولكن ما تعمّدت قلوبكم ﴾ [ الأحزاب : 5 ]

“तुम से भूल चूक से जो कुछ हो जाये उसमें तुम पर कोई पाप नहीं, परन्तु पाप वह है जिसका तुम दिल से निश्चय करो।” (सूरतुल अहज़ाब : 5)

तथा अल्लाह तआला ने शिकार के मारने के बारे में फरमाया और वह एहराम की हालत में निषिद्ध चीज़ों में से है :

﴿ يا أيها الذين آمنوا لا تقتلوا الصيد وأنتم حرم ومن قتله منكم متعمداً فجزاء مثل ما قتل من النعم ﴾ [ المائدة : 95 ]

“ऐ ईमान वालों, जब तुम (हज्ज या उम्रा के) एहराम की हालत में रहो तो शिकार न करो। और तुम में से जो भी जान बूझ-कर उसे मारे तो उसे फिद्या देना है उसी के समान पालतू जानवर से जो उसने मारा है।” (सूरतुल माइदा : 95)

ये नुसूस (क़ुर्आन के मूलशब्द) इस बात पर दलालत करते हैं कि जिसने भूलकर या अनजाने में एहराम की निषिद्ध चीज़ों को कर लिया है तो उसके ऊपर कोई चीज़ नहीं है।

इसी तरह यही हुक्म उस वक़्त भी है जब उसे बाध्य किया गया हो ; क्योंकि अल्लाह तआला का फरमान है :

﴿من كفر بالله من بعد إيمانه إلا من أكره وقلبه مطمئن بالإيمان ولكن من شرح بالكفر صدراً فعليهم غضب من الله ولهم عذاب عظيم ﴾ [ النحل : 106 ]

“जो अपने ईमान के पश्चात अल्लाह से कुफ्र करे सिवाय उसके जिसे बाध्य किया गया है और उसका हृदय ईमान पर सन्तुष्ट हो, परन्तु जो लोग खुले दिल से कुफ्र करें तो उन पर अल्लाह तआला का प्रकोप है और उन्हीं के लिए बड़ी यातना है।” (सूरतुन नह्लः 106)

जब यह कुफ्र पर बाध्य किए जाने का हुक्म है, तो जो चीज़ इस से कमतर है तो उसका प्राथमिकता के तौर पर यही हुक्म होगा।

लेकिन यदि भूले हुए व्यक्ति को याद दिलाया जाये तो उसके लिए निषिद्ध चीज़ से रूक जाना अनिवार्य है, और जब असचेत व्यक्ति को जानकारी करा दी जाय (या उसे जानकारी हो जाए) तो उसके ऊपर उस निषिद्ध चीज़ से रूक जाना अनिवार्य है, और जब मजबूर किए गए व्यक्ति से बाध्यता (मजबूरी) समाप्त हो जाए तो उसके लिए उस निषिद्ध चीज़ से रूकना अनिवार्य है, इसका उदाहरण यह है कि यदि मोहरिम अपने सिर को ढांप ले, फिर उसे याद दिलाया जाए तो वह उस चीज़ को हटा देगा, और यदि वह अपने हाथ को सुगंध से धुल ले फिर उसे याद दिलाया जाये तो उसके ऊपर उसको धुलना अनिवार्य है यहाँ तक कि सुगंध का असर समाप्त हो जाए।

शैख इब्ने उसैमीन की किताब फतावा मनारूल इस्लाम 2/391 - 394 से।
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