Thu 17 Jm2 1435 - 17 April 2014
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क्या चाँद के निकलने के समयों में भिन्नता के मुद्दे का ऐतिबार है

हम मुसलमान छात्रों को संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में हर रमज़ान महीने की शुरूआत में एक समस्या का सामना होता है जिसके कारण मुसलमान तीन समूहों में विभाजित हो जाते हैं :
1- एक समूह उस शहर में चाँद देखकर रोज़ा रखता है जिसमें वह रहता है।
2- एक समूह सऊदिया में रोज़े की शुरूआत के साथ रोज़ा रखता है।
3- एक समूह अमेरिका और कनाडा में मुस्लिम छात्रों के संघ की सूचना मिलने पर रोज़ा रखता है जो अमेरिका में विभिन्न स्थानों पर चंद्रमा देखने का प्रयास करता है, और किसी एक शहर में चाँद दिखाई पड़ते ही विभिन्न केन्द्रों पर उसके देखे जाने की सूचना परिचालित कर दी जाती है। चुनाँचे अमेरिका के सभी मुसलमान एक ही दिन रोज़ा रखते हैं बावजूद इसके कि विभिन्न शहरों के बीच विस्तृत दूरी पाई जाती है।
तो प्रश्न यह है कि इनमें से कौन सा दल (समूह) अनुसरण और उसके चाँद देखने और उसकी सूचना पर रोज़ा रखने के अधिक योग्य है ॽ अज्र की आशा रखते हुए हमें फत्वा दीजिए, अल्लाह तआला आपको बदला दे।
हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

सबसे पहले : चाँद के निकलने के समय का भिन्न होना उन चीज़ों में से है जो आवश्यक रूप से इन्द्रिय और बु़द्धि के द्वारा सर्वज्ञात है, और इसके बारे में किसी विद्वान ने मतभेद नहीं किया है, मुसलमान विद्वानों के बीच मतभेद चाँद के निकलने के समयों की भिन्नता का एतिबार करने और न करने के बारे में हुआ है।

दूसरा : चाँद के मताले के भिन्न होने का मुद्दा और उसका एतिबार न करना विचार और मननचिंतन करने से संबंधित मुद्दों में से है जिसमें इज्तिहाद (विचार विमर्श करने) की गुंजाइश है, और उसके बारे में मतभेद ऐसे लोगों की तरफ से हुआ है जिनका ज्ञान और धर्म में एक पद है और वह ऐसा मतभेद है जो वैध है जिसके अंदर शुद्ध विचार तक पहुँचने वाले के लिए दोहरा अज्र व सवाब है, एक अज्र इजतिहाद करने का और दूसरा अज्र शुद्ध विचार तक पहुँचने का है। तथा उसमें गलती करने वाले के लिए इजतिहाद करने का अज्र है।

विद्वानों ने इस मसअला में दो विचारों पर मतभेद किया है : उनमें से कुछ ने मताले के भिन्न-भिन्न होने का एतिबार किया है, जबकि कुछ लोगों ने इसका एतिबार नहीं किया है, और उनमें से प्रत्येक पक्ष ने क़ुरआन व हदीस के प्रमाणों से दलील पकड़ी है, और कभी कभार दोनों पक्षों ने एक ही नस से दलील पकड़ी है, जैसेकि वे दोनों अल्लाह तआला के इस फरमान से दलील पकड़ने में संयुक्त हैः

﴿يسألونك عن الأهلة قل هي مواقيت للناس والحج ﴾ [سورة البقرة : 189]

“वे लोग आप से नये चाँद के बारे में प्रश्न करते हैं, आप कह दीजिए कि यह लोगों (की इबादत) के वक़्त और हज के मौसम के लिए है।” (सूरतुल बक़रा : 189)

तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस फरमान से दलील पकड़ी है : “उसे (अर्थात् चाँद) देखकर रोज़ा रखो और चाँद देखकर रोज़ा रखना बंद करो।’’

और इसका कारण यह है कि उन्हों ने नस को समझने में मतभेद किया है, तथा उनमें से हर एक ने उस से दलील पकड़ने में अलग-अलग तरीक़ा अपनाया है . . .

दूसरा :

बोर्ड परिषद ने हिसाब (गणना) के द्वारा चाँद के प्रमाणित होने के मुद्दे और इस विषय में वर्णित क़ुरआन व हदीस के प्रमाणों में मननचिंतन किया और इसके बारे में विद्वानों की बातों से अवगत होकर सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया कि : शरई मसाइल (धार्मिक मुद्दों) में नये चाँद की पुष्टि के लिए सितारों के हिसाब का एतिबार नहीं किया जायेगा, क्योंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : “चाँद देखकर रोज़ा रखो और चाँद देखकर रोज़ा रखना बंद करो।” तथा एक दूसरी हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : “तुम रोज़ा न रखो यहाँ तक कि उसे (चाँद को) देख लो, और रोज़ा न तोड़ों यहाँ तक कि उसे देख लो।” तथा इस अर्थ की अन्य हदीसें भी हैं।

तथा इफ्ता और वैज्ञानिक अनुसंधान की स्थायी समिति का विचार है कि मुस्लिम छात्रों का संघ (या इस्लामी समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली अन्य संस्था) उन देशों में जिनकी सरकारें ग़ैर इस्लामी हैं उन देशों में रहने बसने वाले मुसलमानों के लिए चाँद के प्रमाणित करने के मुद्दे में इस्लामी सरकार के स्थान में होगी।

उपर्युक्त बातों के आधार पर इस संघ को दो विचारों में से किसी एक को चयन करने का अधिकार होगा: या तो वह मताले के इख्लिताफ (अर्थात् चाँद निकले के समयों की भिन्नता) का एतिबार करे, और या तो उसका एतिबार न करे, फिर उसने जो विचार किया है उसे उस देश के मुसलमानों पर परिचालित कर दे जिसमें वह रहता है, और उन लोगों पर अनिवार्य है कि उस चीज़ का पालन करें जो उसने विचार किया है और उन पर परिचालित किया है, ताकि उनके बीच सहमति बनी रहे और एक ही समय पर रोज़े की शुरूआत हो सके, तथा मतभेद और अस्थिरता की स्थिति से बचाव किया जा सके। उन देशों में रहने वाले लोगों को चाहिए कि उने देशों में जिसमें वे रहते हैं चाँद देखें, जब उनमें से कोई एक विश्वसनीय व्यक्ति या अधिक उसे देख लें तो वे लोग उसके आधार पर रोज़ा रखें और संघ को सूचित कर दें ताकि वह इस बात का सामान्यीकरण कर दे। और यह महीने के दाखिल (शुरू) होने के विषय में है, जहाँ तक उस से बाहर निकलने (रोज़ा तोड़ने अर्थात ईद का चाँद देखने) का संबंध है तो दो विश्वसनीय व्यक्तियों के शव्वाल के महीने का चाँद देखने की गवाही का होना अनिवार्य है या फिर रमज़ान के तीस दिन पूरे किये जायें, क्योंकि अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : “चाँद देखकर रोज़ा रखो और चाँद देखकर रोज़ा रखना बंद करो। यदि तुम्हारे ऊपर बदली हो जाये (और चाँद देखना संभव न हो) तो तीस दिन पूरे करो।’’

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।

फतावा स्थायी समिति 10/109
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