Fri 25 Jm2 1435 - 25 April 2014
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हिंदू धर्म का संछिप्त परिचय

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क्या आप मुझे हिंदू धर्म के बारे में कुछ तथ्यों का खुलासा कर सकते हैं ?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

सर्व प्रथम : परिभाषा

हिंदू धर्म (हिंदुत्व) : जिसे ब्रह्मवाद भी कहते हैं, एक बुतपरस्त (मूर्तिपूजक) धर्म है, जिसका भारत के अधिकांश लोग पालन करते हैं, यह आस्थाओं, परंपराओं और रीतियों का एक समूह है जो पंद्रहवीं शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर हमारे वर्तमान समय तक एक लंबे काल के दौरान गठित हुआ है, जहाँ - पंद्रहवीं शताब्दी ईसा पूर्व में - हिंदुस्तान के मूल वासी (आदिवासी) निवास करते थे जिनकी कुछ आदिम आस्थाएं और विचारधाराएं थीं, फिर अपने रास्ते में ईरानियों के पास से गुज़रते हुए आर्य योद्धा आए, तो उनकी मान्यतायें और विचार उन देशों से प्रभावित हुए जिनसे उनका गुज़र हुआ, और जब वे हिंदुस्तान में स्थायी रूप से बस गए तो मान्यताओं और आस्थाओं के बीच सम्मिश्रण हुआ, जिससे हिंदू धर्म की एक ऐसे धर्म के रूप में उत्पत्ति हुई जिसके अंदर आदिम विचार जैसे प्रकृति, पूर्वजों और विशेष रूप से गाय की पूजा थी, तथा आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व में हिंदू धर्म विकसित हुआ जब ब्रह्मवाद के सिद्धांत का गठन हुआ, और उन्हों ने ब्रह्मा की पूजा करने की बात कही।

हिंदू धर्म का कोई निर्धारित संस्थापक नहीं है, तथा उसकी अधिकांश पुस्तकों के निर्धारित लेखकों की जानकारी नहीं है, क्योंकि हिंदू धर्म और इसी तरह उसकी पुस्तकें लंबी अवधियों के दौरान अस्तित्व में आई हैं।

दूसरा : विचारधाराएं और आस्थाएं

हम हिंदू धर्म को उसकी पुस्तकों, पूज्य के प्रति उसके दृष्टिकोण, उसकी आस्थाओं, उसके वर्गों के माध्यम के साथ साथ, कुछ वैचारिक मुद्दों और अन्य आस्थाओं से समझ सकते हैं।

क - उसकी पुस्तकें :

हिंदू धर्म की एक बड़ी संख्या में किताबें हैं जिनका समझना कठिन है और उनकी भाषाएं विचित्र हैं, तथा बहुत सी पुस्तकें उनकी व्याख्या करने, और कुछ अन्य पुस्तकें उन व्याख्याओं का संक्षेप करने के लिए लिखी गई हैं, और वे सभी उनके निकट पवित्र हैं, उनमें से महत्वपूर्ण निम्नलिखित हैं :

1- वेद (veda) : यह संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है हिकमत, बुद्धि और ज्ञान। यह आर्यों के जीवन तथा मानसिक जीवन के सादगी (अनुभवहीनता) से दार्शिनक सूझबूझ तक विकसित होने की सीढ़ियों को चित्रित करता है, तथा इसमें कुछ प्रार्थनाएं हैं जो संदेह और आशंका पर निष्कर्षित होती हैं, तथा इसमें ऐसा देवत्वारोपण पाया जाता है जो वहदतुल वजूद (सभी अस्तित्व के एक होने या सर्वेश्वरवाद) तक पहुँचता है, यह चार पुस्तकों से मिलकर बना है।

2- महाभारत : यह ग्रीस (यूनानियों) के यहाँ ओडिसी और इलियड की तरह एक भारतीय महाकाव्य है, जिसके लेखक ऋषि पराशर के पुत्र “व्यास” हैं, जिन्हों ने उसे 950 ई. पू. में संकलित किया था, जो शाही परिवारों के प्रधानों के बीच युद्ध का वर्णन करता है, इस युद्ध में देवता भी सम्मिलित थे।

ख- हिंदू धर्म का देवताओं के प्रति दृष्टिकोण :

- एकीकरण (एकेश्वरवाद) : सूक्ष्म अर्थों में एकेश्वरवाद (तौहीद) नहीं पाया जाता है, किन्तु जब वे किसी एक देवता की ओर ध्यानमग्न होते हैं तो अपने पूर्ण हृदय के साथ ध्यानमग्न होते हैं, यहाँ तक कि अन्य सभी देवता उनकी आँखों से ओझल हो जाते हैं, उस समय वे उसे देवताओं का देवता या परम परमेश्वर के नाम से संबोधित करते हैं।

- विविधता (बहुदेववाद) : ये लोग कहते हैं कि हर उपयोगी या हानिकारक प्रकृति का एक देवता है जिसकी पूजा की जाती है : जैसे – पानी, हवा, नदियाँ, पहाड़ . . . और वे बहुत सारे देवता हैं जिनकी वे पूजा और प्रसाद के द्वारा निकटता प्राप्त करते हैं।

- ट्रिनिटी (त्रिदेव, त्रिमूर्ति): नौवीं शताब्दी ई. पू. में याजकों ने सभी देवताओं को एक देवता में एकत्रित कर दिया जिसने अपने अस्तित्व से संसार को निकाला है, उसी का नाम उन्हों ने रखा है:

1- ब्रह्मा : इस एतिबार से कि वह ईश्वर है।

2- विष्णु : इस एतिबार से कि वह संरक्षक है।

3- शिव : इस एतिबार से कि वह सर्वनाशक है। अतः जिस व्याक्ति ने तीनों देवताओं में से किसी एक की पूजा की, तो वास्तव में उसने सब की पूजा की या एक सर्वोच्च की पूजा की, और उनके बीच कोई अंतर नहीं है, इस तरह उन्हों ने ईसाइयों के सामने त्रिकोण की आस्था का द्वार खोल दिया।

- हिंदू लोग गाय और कई प्रकार के सर्पणशील जंतुओं जैसे नाग, और कई प्रकार के पशुओं जैसे कि बंदर को पवित्र समझते हैं, किंतु उन सब के बीच गाय को वह पवित्रता प्राप्त है जिसके ऊपर कोई और पवित्रता नहीं है, तथा मंदिरों, घरों और मैदानों में उसकी मूर्तियाँ लगी होती हैं, तथा उसे किसी भी जगह स्थानांतरित होने का अधिकार होता है, किसी हिंदू के लिए उसे कष्ट पहुँचाना या बलि करना जाइज़ नहीं है, यदि उसकी मृत्यु हो जाय तो धामिर्क संस्कार के साथ उसे दफनाया जाता है।

- हिंदुओं का मानना है कि उनके देवता कृष्णा नामक एक व्यक्ति के अंदर भी हुलूल किए हैं, तथा उसके अंदर परमेश्वर मनुष्य से मिल गया, या लाहूत (परमेश्वर स्वभाव) नासूत (मानव प्रकृति) में समाविष्ट हो गया, और वे कृष्णा के बारे में वैसी ही बातें करते हैं जिस तरह कि ईसाई लोग मसीह (यीशु) के बारे में बात करते हैं। शैख मुहम्मद अबू ज़ोहरा रहिमहुल्लाह ने उन दोनों के बीच तुलना करते हुए आश्चर्यपूर्ण समानता, बल्कि अनुरूपता प्रदर्शित किया है, और तुलना के अंत में यह कहते हुए टिप्पड़ी की है कि : “ईसाइयों को चाहिए कि अपने धर्म के मूल स्रोत का पता लगायें।”

(ग) - हिन्दू समाज में वर्ण व्यवस्था :

- जब से आर्य लोग हिंदुस्तान पहुँचे हैं उन्हों ने वर्णों (वर्गों) का गठन किया है और वे अभी तक मौजूद हैं, उनके उन्मूलन का कोई रास्ता नहीं है ; क्योंकि ये ईश्वर की रचित अनन्त प्रभाग हैं जैसाकि वे लोग आस्था रखते हैं।

- मनु व्यवस्था में ये वर्ण निम्नानुसार आये हैं :

1- ब्राह्मण : ये वे लोग हैं जिन्हें भगवान ब्रह्मा ने अपने मुँह से पैदा किया है : उन्हीं में से शिक्षक, पुजारी और न्यायधीश हैं, तथा विवाह और मृत्यु के मामलों में सब उन्हीं की ओर लौटते है, और उनकी उपस्थिति ही में चढ़ावा चढ़ाना और प्रसाद प्रस्तुत करना जाइज़ है।

2- क्षत्रिय : ये वो लोग हैं जिन्हें भगवान ने अपने दोनों बाहों से पैदा किया है : ये लोग शिक्षा प्राप्त करते हैं, चढ़ावा चढ़ाते हैं और रक्षा के लिए हथियार उठाते हैं।

3- वैश्य : ये वो लोग हैं जिन्हें भगवान ने अपनी जांघ से पैदा किया है : ये लोग खेती और व्यापार करते, धन इकट्ठा करते और धार्मिक संस्थाओं पर खर्च करते हैं।

4- शूद्र : जिन्हें भगवान ने अपने पैर से पैदा किया है, ये लोग मूल काले लोगों के साथ “अछूतों” के वर्ग का गठन करते हैं। उनका काम पिछले तीन शरीफ वर्गों की सेवा करना है, तथा वे तुच्छ (नीच) और गंदे व्यवसाय करते हैं।

- वे सभी लोग धार्मिक भावना से इस वर्ण (जाति) व्यवस्था के अधीन होने पर एकमत हैं।

- पुरूष के लिए अपने से उच्चतर वर्ग से विवाह करने की अनुमति है, तथा वह निम्न वर्ग से भी शादी कर सकता है, परंतु पत्नि को चौथे वर्ग शूद्र से नहीं होना चाहिए, तथा शूद्र वर्ण के पुरूष के लिए किसी भी हालत में अपने से उच्चतर वर्ण से शादी करना जाइज़ नहीं है।

- ब्राह्मण लोग चुनीदा सृष्टि हैं, उन्हें देवताओं से भी संबंधित किया जाता है, और उन्हें अपने दास शूद्र के धनों में से जो कुछ भी वे चाहें लेने का अधिकार है।

- जो ब्राह्मण पवित्र ग्रंथ को लिखता है, वह बख्शा हुआ है यद्यपि उसने तीनों लोकों को अपने गुनाहों से नष्ट कर दिया हो।

- राजा के लिए - चाहे हालात कितने भी कठोर हों - ब्राह्मण से टैक्स या चुँगी लेना जाइज़ नहीं है।

- यदि ब्राह्मण क़त्ल किए जाने का अधिकृत है तो शासक के लिए केवल इतना जाइज़ है कि वह उसके सिर को मुँडा दे, जहाँ तक उसके अलावा का संबंध है तो उसे क़त्ल किया जायेगा।

- वह ब्राहमण जिसकी आयु दस वर्ष है वह उस शूद्र पर प्राथमिकता रखता है जिसकी आयु सौ वर्ष के क़रीब है, जिस प्रकार की पिता अपने बच्चे पर प्राथमिकता रखता है।

- ब्राह्मण के लिए अपने देश में भूख से मरना सही नहीं है।

- मनु के नियमानुसार अछूत लोग पशुओं से अधिक गिरे हुए और कुत्तों से अधिक अपमानित हैं।

- अछूतों के लिए सौभाग्य की बात है कि वे ब्राह्मणों की सेवा करें और उनके लिए कोई पुण्य नहीं है।

- यदि कोई अछूत किसी ब्राह्मण को मारने के लिए उस पर हाथ या लाठी उठाए, तो उसके हाथ काट दिये जायें, और यदि वह उसे लात मारे तो उसके पैर को फाड़ दिया जाए।

- यदि कोई अछूत किसी ब्राह्मण के साथ बैठने का इरादा करे तो राजा को चाहिए कि उस के चूतड़ को दाग दे और उसे देश से निकाल दे।

- यदि कोई अछूत किसी ब्राह्मण को शिक्षा देने का दावा करे तो उसे उबलता हुआ तेल पिलाया जायेगा।

- कुत्ता, बिल्ली, मेंढक, गिर्गिट, कौआ, उल्लू और अछूत वर्ग के किसी आदमी की हत्या करने का परायश्चित बराबर है।

- हाल में अछूतों की स्थिति में मामूली सुधार दिखाई दिया है, इस डर से कि उनकी स्थितियों का लाभ उठाया जाय और वे दूसरे धर्मों में प्रवेश हो जायं, विशेषकर ईसाइ धर्म जो उनसे संघर्ष कर रहा है, या साम्यवाद जो उन्हें वर्गों के संघर्ष के विचार के माध्यम से आमंत्रित करता है, किंतु अधिकांश अछूतों ने इस्लाम धर्म में आदर व सम्मान और समानता पाया, अतः उन्हों ने इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लिया।

(घ) - उनकी मान्यतायें :

उनकी मान्यताएं और आस्थाएं “कर्मा”, पुनर्जन्म (आवागवन), मोक्ष, और अस्तित्व की एकता में प्रकट होती हैं :

1- “कर्मा” : दंड संहिता, अर्थात् ब्रह्मांड की व्यवस्था एक ईश्वरीय व्यवस्था है जो शुद्ध न्याय पर क़ायम है, यह न्याय अनिवार्य रूप से होकर रहेगा, चाहे वर्तमान जीवन में, या आने वाले जीवन में, और एक जीवन का बदला दूसरे जीवन में मिलेगा, तथा पृथ्वी परीक्षण का घर है, जिस तरह कि यह बदले और पुण्य का घर है।

2- पुनर्जन्म (आत्माओं का आवागवन) : जब इंसान मर जाता है तो उसका शरीर नष्ट हो जाता है, और उसकी आत्मा उससे निकल कर, उसने अपने पहले जीवन में जो कर्म किए हैं उसके अनुसार, एक दूसरे शरीर में घुल-मिल जाती और उसका रूप् धारण कर लेती है, और आत्मा उसमें एक नया चक्र शुरू करती है।

3- मोक्ष : अच्छे और बुरे कार्यों से बार-बार एक नया जीवन निष्कर्षित होता है ताकि पिछले सत्र में उसने जो कुछ किया है उस पर आत्म को पुरस्कृत या दंडित किया जाए।

-जिसे किसी चीज़ की इच्छा नहीं है और वह कदापि किसी चीज़ की इच्छा नहीं करेगा, और वह इच्छाओं की गुलामी से मुक्त हो गया, और उसका मन संतुष्ट हो गया, तो उसे हवास (चेतना) में नहीं लौटाया जाता है, बल्कि उसकी आत्मा मोक्ष प्राप्त कर ब्रह्मा से मिल जाती है।

4- सर्व अस्तित्व की एकता : दार्शिनक अमूर्त ने हिंदुओं को इस मान्यता तक पहुँचा दिया कि इंसान विचारों, व्यवस्थाओं और संस्थाओं की रचना कर सकता है, जिस तरह कि वह उनकी रक्षा करने या उनका विनाश करने पर सक्षम है, इस तरह मनुष्य देवताओं के साथ मिल जाता है, और स्वयं आत्मा ही रचना करने वाली शक्ति बन जाती है।

- आत्मा देवताओं के समान अनन्त, सर्वदीय और बाक़ी रहने वाली है, उसकी रचना नहीं की गई है।

- मनुष्य और देवताओं के बीच रिश्ता, आग की चिंगारी और स्वयं आग के बीच रिश्ते के समान, तथा बीज और वृक्ष के बीच रिश्ते के समान है।

- यह पूरा ब्रह्मांड मात्र वास्तविक अस्तित्व का प्रदर्शन और दृश्य है, और मानव आत्मा सुप्रीम आत्मा का एक हिस्सा है।

ङ - अन्य विचार और आस्थायें:

- शरीर को मरने के बाद जला दिया जायेगा, क्योंकि यह आत्मा को ऊपर की ओर, और खड़ी शक्ल में, जाने की अनुमति प्रदान करता है, ताकि वह सर्वोप्परि राज्य तक जल्द से जल्द कम से कम समय में पहुँच जाए, तथा जलना आत्मा को शरीर के ढाँचे से पूरी तरह से छुटकारा दिलाना है।

- जब आत्मा छुटकारा पाकर ऊपर चढ़ती है तो उसके सामने तीन दुनिया होती है :

1- ऊपरी (उच्चतम) दुनिया : फरिश्तों (स्वर्गदूतों) की दुनिया।

2- या लोगों की दुनिया : लोगों के रहने की दुनिया उनके शरीर में हुलूल करके।

3- या नरक की दुनिया : और यह पाप और अपराध करने वालों के लिए है।

- नरक कोई एक नहीं है, बल्कि हर गुनाह वाले के लिए एक विशिष्ट नरक है।

- दूसरी दुनिया में पुनर्जन्म आत्मा के लिए है शरीर के लिए नहीं है।

- जिस महिला का पति मर जाता है वह उसके बाद विवाह नहीं करती है, बल्कि वह नित्य दुर्भाग्य में जीवन यापन करती है, और अपमान और मानहानि का विषय रहती है, और उसका पद नौकर के पद से भी कमतर और नीच होता है, इसीलिए कभी कभार औरत अपने पति की मृत्यु के बाद सती हो जाती है ताकि उस संभावित यातना और प्रकोप से बचाव कर सके जिसमें उसे रहना पड़ेगा। आधुनिक भारत में कानून ने इस प्रक्रिया को निषिद्ध करार दिया है।

तीसरा : उसके फैलाव और प्रभाव का स्थान

हिंदू धर्म भारतीय उपमहाद्वीप में नियंत्रण करता था और उसमें फैला हुआ था। लेकिन मुसलमानों और हिंदुओं के बीच ब्रह्मांड, जीवन और उस गाय के प्रति जिसे हिंदू पूजते, और मुसलमान बलि कर उसका मांस खाते हैं उनके दृष्टिकोण में व्यापक दूरी - विभाजन के पैदा होने का एक कारण थी, चुनाँचि पूर्वी और पश्चिमी भाग समेत पाकिस्तानी राज्य के स्थापना की घोषणा की गई जिसके अधिकांश लोग मुसलमानों में से थे, जबकि भारत राज्य को बाक़ी रखा गया जिसके अधिकांश वासी हिंदू हैं और मुसलमान उसमें एक बड़े अल्पसंख्यक हैं।

यह परिचय कुछ संक्षेप और परिवर्तन के साथ पुस्तक “अल-मौसूअतुल मुयस्सरह फिल अद्यान वल-मज़ाहिब वल-अहज़ाब अल-मुआसिरह” (2/724-731) से लिया गया है।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।
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