12658: एतिकाफ़ में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का व्यवहार


मैं एतिकाफ में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का व्यवहार और तरीक़ा जानना चाहता हूँ।

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

एतिकाफ में पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का व्यवहार सब से संपूर्ण और सब से अधिक सरल व्यवहार था।

आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक बार रमज़ान के पहले दस दिनों में एतिकाफ किया, फिर बीच वाले दस दिनों में एतिकाफ किया। आप उस में लैलतुल-क़द्र तलाश करते थे। फिर आप को पता चला कि वह अन्तिम दस रातों में है तो आप ने बराबर अंतिम दहे में एतिकाफ किया यहाँ तक कि अपने पालनहार अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल से जा मिले।

एक बार आप ने रमज़ान में अंतिम दहे का एतिकाफ छोड़ दिया तो शव्वाल के महीने में उस की क़ज़ा की और उसके पहले दहे में एतिकाफ किया। इसे बुखारी और मुस्लिम ने रिवायत किया है।

और जिस वर्ष आपका स्वर्गवास हुआ उसमें आप ने बीस दिनों का एतिकाफ किया। इसे बुखारी (हदीस संख्या : 2040) ने रिवायत किया है।

कहा गया है कि : इसका कारण यह था कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को आपकी अवधि पूरी होने का ज्ञान हो गया था, अतः आप ने चाहा कि अधिक से अधिक भलाई के कार्य करें ताकि अपनी उम्मत के लिए इस बात को स्पष्ट कर सकें कि जब वे अमल के अंतिम स्तर तक पहुँच जायें तो कार्य करने में संघर्ष करना चाहिए ताकि वे अल्लाह तआला से अपनी सर्वश्रेष्ठ स्थितियों में मुलाक़ात करें। और यह भी कहा गया है कि : इसका कारण यह था कि जिब्रील अलैहिस्सलाम हर रमज़ान में आप पर दो बार क़ुर्आन को पेश करते थे किन्तु जिस साल आप की मृत्यु हुई उन्हों ने दो बार आप पर क़ुर्आन को पेश किया, इसलिए आप जितना एतिकाफ किया करते थे उसके दो गुना एतिकाफ किया।

और इस से अधिक मज़बूत बात यह है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उस साल बीस दिन  एतिकाफ इसलिए किया कि आप उसके पूर्व वाले वर्ष में यात्रा पर थे, इस पर तर्क वह हदीस है जिसे नसाई (और हदीसे के शब्द नसाई के हैं) और अबू दाऊद ने रिवायत किया है और इब्ने हिब्बान वगैरह ने उबै बिन कअब की हदीस से सहीह कहा है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रमज़ान के अंतिम दस दिनों का एतिकाफ करते थे, तो एक वर्ष आप ने यात्रा किया तो एतिकाफ नहीं कर सके, फिर जब अगला वर्ष आया तो बीस दिन किा एितकाफ किया।” (फत्हुल बारी से समाप्त हुआ).

आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम खेमा लगाने का आदेश देते थे तो आप के लिए मस्जिद में एक खेमा लगा दिया जाता था जिस में आप ठहरते थे और लोगों से एकान्त में हो जाते और अपने पालनहार की ओर ध्यान केंद्रित करते थे यहाँ तक कि आप को वास्तविक रूप से एकांत प्राप्त हो जाता था।

एक बार आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने तुर्की क़ुब्बा (अर्थात एक छोटे तंबू) में एतिकाफ किया और उस के द्वार पर एक चटाई डाल दी। इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 1167) ने रिवायत किया है।

इब्नुल क़ैयिम रहिमहुल्लाह ने ज़ादुल मआद (2/90) में फरमाया :

“ ये सारी चीज़ें इसलिए थीं ताकि एतिकाफ का उद्देश्य और उसका सार प्राप्त हो। ऐसा नहीं जैसाकि जाहिल लोग करते हैं कि वे एतिकाफ गृह को समागम, मुलाकातियों को एकत्र करने और आपस में गप शप करने का स्थान बना लिया है। तो यह एतिकाफ कुछ और ही है और पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का एतिकाफ कुछ और ही तरह का था।” (इब्नुल क़ैयिम की बात समाप्त हुई).

आप हमेशा मस्जिद ही में रहते थे उस से केवल क़ज़ाये हाजत (शौच) के लिए बाहर निकलते थे, आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा फरमाती हैं : (जब आप एतिकाफ की हालत में होते थे तो अपने घर में केवल किसी ज़रूरत के लिए ही प्रवेश करते थे।” इसे बुखारी (हदीस संख्या : 2029) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 297) ने रिवायत किया है। तथा मुस्लिम की एक रिवायत के शब्द यह हैं कि : “केवल मानवीय ज़रूरतों के लिए” (ही निकलते थे). इमाम ज़ोहरी ने इसकी व्याख्या पेशाब और पाखाने से की है।

आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सफाई सुथराई का ध्यान रखते थे, आप अपने सिर को मस्जिद से आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा के कमरे में निकाल लेते थे और वह आप के सिर को घोतीं और उसमें कंघी करती थीं। बुखारी (हदीस संख्या : 2028) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 297) ने आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा : नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने सिर को मेरी तरफ झुकाते थे जबकि आप मस्जिद में एतिकाफ की हालत में होते थे तो मैं माहवारी के दिनों में होने के उपरान्त आप के सिर में कंघी करती थी। तथा बुखारी और मुस्लिम की एक रिवायत में है कि: “तो मैं उसे (सिर को) घोती थी।”

हाफिज़ इब्ने हजर कहते हैं :

इस हदीस के अंदर, बालों में कंघी करने को आधार बनाते हुए सफाई करने, सुगंध लगाने, धुलने, मूँडने और श्रृंगार करने की वैधता है, और विद्वानों की बहुमत का मत यह है कि उसमें वही चीज़ें मक्रूह (नापसंदीदा) हैं जो मस्जिद के अंदर अनेच्छिक हैं। (हाफिज़ की बात समाप्त हुई).

तथा एतिकाफ की हालत में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह तरीक़ा था कि आप किसी बीमार को देखने नहीं जाते थे और न किसी जनाज़ा (अंतिम संस्कार) में उपस्थित होते थे, यह इस कारण ताकि अल्लाह तआला से मुनाजात करने पर संपूर्ण ध्यान केंद्रित कर सकें और एतिकाफ की हिकमत (तत्वदर्शिता) और उद्देश्य को प्राप्त कर सकें और वह लोगों से कट कर (अलग थलग होकर) अल्लाह सर्वशक्तिमान की ओर ध्यान केंद्रित करना है।

आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा फरमाती हैं :

“एतिकाफ करने वाले के लिए सुन्नत यह है कि वह किसी बीमार को देखने के लिए न जाये, किसी जनाज़ा में उपस्थित न हो, किसी औरत को हाथ न लगाए और न उस से आलिंगन करे, तथा किसी आवश्यकता के लिए बाहर न निकले सिवाय इसके की उसके बिना काम न चले।” इसे अबू दाऊद (हदीस संख्या : 2473) ने रिवायत किया है और अल्बानी ने सहीह अबू दाऊद में इसे सहीह कहा है।

शौकानी ने अपनी किताब “नैलुल अवतार” में कहा है कि “किसी औरत को न छुए और उस से आलिंगन न करे” से अभिप्राय संभोग है।

आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की कुछ बीवियाँ आप से मिलने के लिए आती थीं जबकि आप एतिकाफ की हालत में होते थे, फिर जब वह उठ कर जाने लगतीं तो आप भी उन के साथ उठते और उन्हें वापस छोड़ते, और यह रात में हुआ करता था।

चुनाँचे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पत्नी सफिय्या से वर्णित है कि वह रमज़ान के अंतिम दहे में मस्जिद के अंदर पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के एतिकाफ गृह में आप से भेंट करने के लिए आईं, तो आप के पास घंटा भर बात चीत करती रहीं, फिर उठकर वापस जाने लगीं तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम भी उनके साथ उठे ताकि उन्हें वापस छोड़कर आयें।” अर्थात उन्हें उनके घर पहुँचा कर आयें। इसे बुखारी (हदीस संख्या : 2035) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 2175) ने रिवायत किया है।

कहने का सारांश यह है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का एतिकाफ आसानी से विशिष्ट था, और लैलतुल क़द्र की खोज में आपका सारा समय अल्लाह सर्वशक्तिमान के स्मरण, जप और उसकी आज्ञाकारिता पर ध्यानगमन होने में बीतता था।

देखिए: इब्नुल क़ैयिम की किताब “ज़ादुल मआद” (2/90), तथा डा. अब्दुल लतीफ बालतो की किताब “अल-एतिकाफो नज्रतुन तरबविय्यतुन” 

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।
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