Thu 24 Jm2 1435 - 24 April 2014
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क्या पत्नी पर पति की माँ की सेवा करना अनिवार्य है ॽ

क्या पत्नी पर उसके पति की माँ की सेवा करना अनिवार्य है या नहीं ? और इस विषय में क्या प्रावधान है ; क्योंकि यह हमारे घर में समस्या का कारण बना हुआ है, और यह मुझे कभी कभी तलाक़ के बारे में सोचने पर मजबूर कर देता है। मैं ने एक विद्वान (धर्मज्ञानी) से इस बारे में पूछा तो उन्हों ने मुझसे कहा : अपनी माँ और अपनी पत्नी के बीच सामंजस्य पैदा करने की कोशिश करो। जबकि ज्ञात रहे कि मेरी पत्नी अनाथ है और मेरा अलावा उसका कोई नहीं है, और उसे से मेरे बच्चे भी हैं, जबकि अल्लाह की स्तुति है कि मेरी माँ बड़ी आयु की (वयोवृद्धि) नहीं है, और उनके पास घर में लड़कियाँ भी हैं, और उन दोनों के बीच सामंजस्य और मेल-मिलाप बनाना अस्ंभव हो गया है, तो क्या मेरे लिए जायज़ है कि अपने लिए और अपनी पत्नी के लिए एक अलग घर बना लूँ और अपनी माँ और भाइयों को छोड़ दूँ, इस बारे में शरीअत का क्या प्रावधान है ?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

‘‘औरत के अपने पती और उसके घर वालों की सेवा करने का मामला देश के रिवाज (रीति) के अनुसार अलग अलग होता है, जबकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पत्नियाँ अपने घरों की सेवा किया करती थीं, तथा (पैगंबर की बेटी) फातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा चक्की पीसने, आटा सानने और रोटी बनाने वगैरह में अपने घर की सेवा किया करती थीं।

अतः उचित यही है कि औरत अपने पति की और उसके घर की सेवा करे, और अगर उसके घर में उसकी माँ या उसकी बहन या उसकी लड़कियाँ हैं तो उसके लिए धर्मसंगत यह है कि उनकी सेवा करे यदि उसके देश में सेवा करने का रिवाज है, लेकिन अगर उस परिवार या देश या क़बीला (गोत्र) में जिसमें वह है, यह रिवाज है कि उसकी सेवा की जाती है और वह स्वयं सेवा नहीं करती है, बल्कि उसके लिए नौकरानी लाई जाती है तो ऐसी अवस्था में उसके लिए सेवा करना आवश्यक नहीं है, और पति को चाहिए कि यदि हो सके तो वह नौकरानी लाए, सिवाय इसके कि वह सेवा करने पर सहमत हो जाए और बिना किसी बाध्यता के स्वयं सेवा करने लगे, तो उसने यह बहुत अच्छा किया।

सारांश यह कि : यह मामला देश के रिवाज और प्रचलन के अनुसार बदलता रहता और भिन्न भिन्न होता है, अगर आपस में मतभेद और आपत्ति पैदा हो, जबकि पति के लिए बेहतर यह है कि वह इस बारे में अच्छी विधि अपनाये, और विवाद पैदा होने के समय वह जितना हो सके औरत को पैसा देता रहे ताकि वह खुशी खुशी सेवा करे, और ताकि वह उसकी माँ की सेवा करे, और उसकी बेटियों और छोटे भाइयों आदि की सेवा करे, तथा जब समस्याएं पैदा हों और उसके लिए वह रिवाज व प्रचलन स्पष्ट न हो जो उसे अपने घर की सेवा करने पर संतुष्ट कर सके तो अच्छे ढंग, अच्छी बात और वित्तीय सहायता से काम लेना चाहिए, और अल्लाह तआला ही तौफीक़ प्रदान करनेवाला है।

अगर वह अपनी माँ को छोड़कर एक अलग घर में स्थानांतरित होने पर सक्षम है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है सिवाय इसके कि उसकी माँ इससे मना कर दे, अगर माँ उसे बाहर निकलने से रोकती है, क्योंकि वह उसकी ज़रूरतमंद है या इसके कुछ अन्य कारण हैं, तो उसके लिए बाहर निकलना उचित नहीं है, क्योंकि उस (माँ) की प्रसन्नता और सहमति अनिवार्य है और उसकी आज्ञाकारिता महत्वपूर्ण है। हो सकता है कि उसके वे भाई जो घर में हैं उसकी जगह न ले सकते हों और उसके समान उसकी ज़रूरत पूरी न कर सकते हों। निष्कर्ष यह कि वह अपनी माँ का ध्यान रखेगा और उससे परामर्श लेगा। यदि वह अनुमति प्रदान कर देती है तो उसके लिए वहाँ से निकल कर एक अलग घर में जाने में कोई रूकावट और आपत्ति नहीं है।

किंतु अगर वह उसकी ज़रूरतमंद है, या कुछ अन्य कारण है जो उसे बाहर निकलने की अनुमति देने से रोकते हैं तो वह बाहर नहीं निकलेगा, बल्कि धैर्य करेगा और अपनी माँ और अपनी पत्नी के बीच सामंजस्य पैदा करने की कोशिश करेगा, और जितना हो सकता है पत्नी को पैसे या उपहार प्रदान करेगा, ताकि मामलात वांछित ढंग से चलते रहें, और ताकि वह अपनी माँ को उसके ऊपर गुस्सा होने की वजह से खो न दे, और अल्लाह ही सहायक व मददगार है।’’ अंत हुआ।

समाहतुश्शैख़ अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ रहिमहुल्लाह

‘‘फतावा नूरून अलद्-दर्ब’’ (3/1608).
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