1319: मधुमेह के रोगी के लिए रोज़ा रखने का हुक्म और उसके लिए रोज़ा तोड़ना कब जाइज़ है


मैं 14 महीने से द्वितीय श्रेणी के मधुमेह के रोग से पीड़ित हूँ और वह ऐसी शुगर की बामीरी से परिचित है जिसमें इंसुलिन लेने की आवश्यकता नहीं होती है। मैं कोई भी दवा नहीं ले रहा हूँ, किंतु मैं आहार के परहेज़ का पालन करता हूँ और कुछ व्यायाम करता हूँ ताकि शुगर के स्तर को उचित सीमां में रख सकूँ।
मैं ने पिछले रमज़ान में कुछ दिनों का रोज़ा रखा था किंतु शुगर के दर (स्तर) के कम होने के कारण मैं रोज़े को पूरा करने में सक्षम नहीं था। अब मैं (अल्लाह का शुक्र है कि) पहले से अच्छा महसूस करता हूँ किंतु रोज़ा रखने के समय सिर में दर्द महसूस करता हूँ।
तो क्या मेरे लिए ज़रूरी है कि अपनी बीमारी की परवाह किए बिना रोज़ा रखूँ ॽ
क्या मैं रोज़ा रखते हुए खून में शकर की दर की जाँच करा सकता हूँ (क्योंकि इसके लिए अंगुली से खून लेने की ज़रूरत पड़ती है) ॽ

तो क्या मेरे लिए ज़रूरी है कि अपनी बीमारी की परवाह किए बिना रोज़ा रखूँ ॽ

क्या मैं रोज़ा रखते हुए खून में शकर की दर की जाँच करा सकता हूँ (क्योंकि इसके लिए अंगुली से खून लेने की ज़रूरत पड़ती है) ॽ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

बीमार व्यक्ति के लिए रमज़ान के महीने में रोज़ा तोड़ना धर्मसंगत है यदि रोज़ा उसे नुक़सान पहुँचाता है या उसके लिए रोज़ा रखना कष्ट और कठिनाई का कारण है, या वह दिन में उसे विभिन्न प्रकार की गोलियाँ या पीने की चीज़ों का उपचार लेने की ज़रूरत होती है, क्योंकि अल्लाह सर्वशक्तिमान का फरमान है :

﴿وَمَنْ كَانَ مَرِيضاً أَوْ عَلَى سَفَرٍ فَعِدَّةٌ مِنْ أَيَّامٍ أُخَر﴾ [سورة البقرة : 185]

“और जो बीमार हो या यात्रा पर हो तो वह दूसरे दिनों में उसकी गिन्ती पूरी करे।“ (सूरतुल बकराः 185)

तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : “अल्लाह तआला इस बात को पसंद करता है कि उसकी प्रदान की हुई रूख्सतों को अपनाया जाये जिस तरह कि वह इस बात को नापंसद करता है कि उसकी अवज्ञा के कामों को किया जाये।” तथा एक दूसरी रिवायत के शब्द यह हैं कि : “जिस तरह  कि वह इस बात को पसंद करता है कि उसके निश्चित और अनिवार्य आदेशों का पालन किया जाये।”

जहाँ तक नसों से जाँच आदि के लिए खून लेने का प्रश्न है तो सही बात यह है कि यह रोज़ा नहीं तोड़ता है, किंतु यदि वह अधिक मात्रा में हो तो उसे रात तक विलंब करना बेहतर है। यदि वह दिन ही में ऐसा करता है तो सावधानी का पक्ष, उसे सिंघी के समान ठहराते हुए, उस दिन के रोज़े की क़ज़ा करना है।” शैख इब्ने बाज़ रहिमहुल्लाह का फत्वा, किताब फतावा इस्लामिय्या 2/139 से।

“बीमार व्यक्ति की कई स्थितियाँ हैं :

प्रथम : वह जो रोज़े से प्रभावित नहीं होता है, उदाहरण के तौर पर साधारण ज़ुकाम, या साधारण सिर दर्द, दाँत का दर्द और इसके समान अन्य बीमारियाँ, तो ऐसे व्यक्ति के लिए रोज़ा तोड़ना जाइज़ नहीं है। यद्यपि कुछ विद्वानों का कहना है कि क़ुर्आन की आयत : ﴿وَمَنْ كَانَ مَرِيضاً﴾ [البقرة : 185] “और जो बीमार हो।” (सूरतुल बक़रा : 185) के आधार पर उसके लिए रोज़ा तोड़ना जाइज़ है। किंतु हम कहेंगे कि : यह आदेश एक कारण के साथ संबंधित है और वह यह कि रोज़ा तोड़ देना उसके लिए अधिक आसानी का पात्र हो, परंतु अगर वह रोज़ा से प्रभावित नहीं होता है तो उसके लिए रोज़ा तोड़ना जाइज़ नहीं है, बल्कि उसके ऊपर रोज़ा रखना अनिवार्य है।

दूसरी स्थिति : जब उसके लिए रोज़ा रखना कठिन और मुश्किल हो, लेकिन उसके लिए नुकसान का कारण न हो, तो ऐसी हालत में उसके लिए रोज़ा रखना मक्रूह है, और रोज़ा तोड़ देना मस्नून है।

तीसरी स्थिति : जब उसके लिए रोज़ा रखना कष्ट और कठिनाई का करण हो और उसे नुकसान पहुँचाता हो, जैसे गुर्दे की बीमारी या मधुमेह की बीमारी और इसके समान अन्य बीमारियों से पीड़ित आदमी, तथा रोज़ा उसे नुक़सान पहुँचाता हो तो उसके ऊपर रोज़ा रखना हराम है। इसी से हमें उन मुजतहिदीन और बीमारों की त्रुटि का पता चलता है जिनके ऊपर रोज़ा कठिन होता है और कभी कभार उन्हें नुक़सान पहुँचाता है, किंतु वे रोज़ा तोड़ना स्वीकार नहीं करते हैं, तो हम ऐसे लोगों से कहेंगे कि : इन लोगों ने गलत किया है कि इन्हों ने अल्लाह सर्वशक्तिमान की दानशीलता को स्वीकार नहीं किया और उसकी रूख्सत (छूट) को क़बूल नहीं किया और अपने आप को नुक़सान पहुँचाया, जबकि अल्लाह सर्वशक्तिमान का फरमान है :

﴿ ولا تقتلوا انفسكم ﴾ [النساء : 29]

“और अपने आपको क़त्ल न करो।” (सूरतुन निसा : 29)

शैख इब्ने उसैमीन की किताब अश्शर्हुल मुमते (6 / 352 – 354).

इस्लाम प्रश्न और उत्तर

शैख मुहम्मद सालेह अल-मुनज्जिद
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