Thu 24 Jm2 1435 - 24 April 2014
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नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नमाज़ का तरीक़ा

मैं आप से आशा करता हूँ कि आप हमारे लिए नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के नमाज़ पढ़ने का तरीक़ा बिंदुओं के रूप में उल्लेख करें।

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

पहलाः काबा की ओर मुँह करना 

1-  ऐ मुसलमान भाई, जब आप नमाज़ के लिए खड़े हों, तो आप चाहे जहाँ भी हों, फर्ज़ एवं नफ़्ल दोनों नमाजों में अपना चेहरा काबा (मक्का मुकर्रमा) की तरफ कर लें, क्योंकि यह नमाज़ के अरकान में से एक रुक्न है, जिस के बिना नमाज़ शुद्ध (सही) नहीं होती हैं।

2- सलातुल खौफ (डर की नमाज़) और घमासान की लड़ाई में जंगजू से काबा की ओर चेहरा करने का हुक्म समाप्त हो जाता है।

- तथा उस आदमी से भी काबा की ओर चेहरा करने का हुक्म समाप्त हो जाता है जो काबा की ओर अपना चेहरा करने में असक्षम हो जैसे बीमार आदमी, या जो व्यक्ति नाव (कश्ती) में, या मोटर गाड़ी, या हवाई जहाज़ पर सवार हो जबकि उसे नमाज़ के समय के निकल जाने का खौफ हो।

- इसी प्रकार उस आदमी से भी यह हुक्म समाप्त हो जाता है जो किसी चौपाये या अन्य वाहन पर सवारी की हालत में नफ्ल या वित्र नमाज़ पढ़ रहा हो, जबकि ऐसे आदमी के लिए मुसतहब (बेहतर) यह है कि यदि संभव हो तो तकबीरतुल एहराम कहते समय अपना चेहरा क़िब्ला (काबा) की ओर करे, फिर उस सवारी के साथ मुड़ता रहे चाहे जिधर भी उस का रुख हो जाये।

2- काबा को अपनी नज़र से देखने वाले हर व्यक्ति के लिए ज़रूरी है कि वह स्वयं काब़ा की ओर अपना मुँह कर के खड़ा हो, किन्तु जो आदमी काब़ा को अपनी नज़र से नहीं देख रहा है वह मात्र काब़ा की दिशा की ओर मुंह कर के खड़ा होगा।

गलती से काबा के अलावा किसी और तरफ नमाज़ पढ़ने का हुक्मः

4- अगर कोई आदमी काफी प्रयास और तलाश के बाद बदली या किसी अन्य कारण काबा के अलावा किसी और तरफ मुँह कर के नमाज़ पढ़ ले तो उसकी नमाज़ सही (मान्य) है, और उसे नमाज़ लौटानी नहीं पड़ेगी।

5- और अगर कोई आदमी काबा के अलावा किसी अन्य दिशा की तरफ नमाज़ पढ़ रहा है, और उसी हालत में कोई भरोसेमंद आदमी आ कर उसे किब्ला के दिशा की सूचना दे, तो उसे जल्दी से काब़ा की दिशा में मुड़ जाना चाहिये, और उसकी नमाज़ सही (शुद्ध) है।

दूसराः क़ियाम (खड़ा होना)

6- नमाज़ी के लिए खड़े हो कर नमाज़ पढ़ना ज़रुरी है, और यह नमाज़ का एक रुक्न है, मगर कुछ लोगों पर इस हुक्म का पालन करना अनिवार्य नहीं है, और वे कुछ इस प्रकार हैं :

- खौफ (भय और डर) की नमाज़ तथा घमासान जंग के समय नमाज़ पढ़ने वाला आदमी, चुनांचि उस के लिये सवारी पर बैठे बैठे नमाज़ पढ़ना जाइज़ है।

- ऐसा बीमार व्यक्ति जो खड़े हो कर नमाज़ पढ़ने से असमर्थ हो, चुनांचि ऐसा आदमी अगर बैठ कर नमाज़ पढ़ सकता है तो बैठ कर नमाज़ पढ़े, नहीं तो पहलू के बल हो कर नमाज़ पढ़े। 

- तथा नफ्ल नमाज़ पढ़ने वाला आदमी, चुनांचि उस के लिए बैठ कर, या सवारी पर सवार होने की हालत में नमाज़ पढ़ने की रुख्सत (छूट) है, और वह रुकू और सज्दा अपने सिर के इशारे से करेगा, तथा बीमार आदमी भी इसी प्रकार अपनी नमाज़ को अदा करेगा, मगर अपने सज्दा में अपने (सिर को) रुकू से कुछ अधिक झुकाए गा।

7-  बैठ कर नमाज़ पढ़ने वाले नमाजी के लिए जाइज़ नहीं है कि वह ज़मीन पर कोई ऊँची चीज़ रख कर उस पर सज्दा करे, बल्कि अगर वह अपने माथे को सीधे ज़मीन पर रखने में सक्षम नहीं है तो वह अपने सज्दा को अपने रुक़ू से अधिक नीचे करेगा, जैसा कि हम अभी इस का उल्लेख कर चुके हैं।

कश्ती (नाव) और हवाई जहाज़ में नमाज़ पढ़ने का बयानः

8- नाव (या पानी के जहाज़) और हवाई जहाज़ में फर्ज़ नमाज़ पढ़ना जाइज़ है।

9- तथा उन दोनों में सवार आदमी को अगर गिरने का डर हो, तो उस के लिए बैठ कर नमाज़ पढ़ना जाइज़ है।

10- इसी प्रकार बुढ़ापे या शरीर की कमज़ोरी की बिना पर अपने क़ियाम (खड़े होने) की हालत में किसी खम्भा या लाठी का सहारा लेना जाइज़ है।

नमाज़ का कुछ भाग खड़े हो कर पढ़ना और कुछ बैठ करः

11- रात की नमाज़ (तहज्जुद की नमाज़) को बिना किसी कारण के खड़े हो कर या बैठ कर पढ़ना जाइज़ है, तथा उन दोनों को एकत्रित करना भी जाइज है, चुनाँचि बैठ कर नमाज़ पढ़ने की शुरूआत करे और क़िराअत करे, और रुकू करने से थोड़ी देर पहले खड़ा हो जाए, और जो आयतें बाकी रह गई हैं उन्हें खड़े हो कर पढ़े, फिर रुकू और सजदह करे, फिर इसी प्रकार दूसरी रक़अत में भी करे।

12- और जब वह बैठ कर नमाज पढ़े तो चार ज़ानू हो कर (आल्ती पाल्ती मार कर) बैठे, या कोई अन्य बैठक (आसन) जिस में उसे आराम मिलता हो।

जूता पहन कर नमाज़ पढ़नाः

13- जिस प्रकार आदमी के लिए नंगे पैर नमाज़ पढ़ना जाइज़ है, उसी तरह उस के लिए जूता पहन कर भी नमाज़ पढ़ना जाइज़ है।

14- लेकिन अफज़ल (बेहतर) यह है कि कभी नंगे पैर नमाज़ पढ़े और कभी जूता पहन कर, जैसा कि उस के लिए आसान हो। अतः नमाज़ पढ़ने के लिए उन दोनों को पहनने का कष्ट न करे और न ही (यदि उन्हें पहने हुए है तो) उन दोनों को निकालने का कष्ट करे, बल्कि अगर नंगे पैर है तो नंगे पैर ही नमाज़ पढ़ ले, और अगर जूता पहने हुए है तो जूता पहने हुए नमाज़ पढ़े, सिवाय इस के कि कोई मामला पेश आ जाये।

15- और जब उन दोनों (जूतों) को निकाले तो उनको अपने दाहिने तरफ न रखे, बल्कि उसे अपने बायीं तरफ रखे जबकि उस के बायें तरफ कोई आदमी नमाज़ न पढ़ रहा हो, नहीं तो उन दोनों को अपने दोनों पैरों को बीच में रखे, (मैं कहता हूँ किः इस में हल्का सा इशारा है की आदमी जूतों को अपने सामने नहीं रखेगा, और यह एक शिष्टाचार है जिस की नमाजियों की बहुमत उपेक्षा करती है, अतः आप उन्हें  अपने जूतों की ओर नमाज पढ़ते हुए देखेंगे), अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से इस का आदेश साबित है।

मिम्बर पर नमाज़ पढ़नाः

16- लोगों को सिखाने के लिए इमाम का किसी ऊंची जगह जैसे कि मिम्बर पर नमाज़ पढ़ना जाइज़ है, अतः वह उस पर खड़े हो कर तकबीर कहे, क़िराअत करे और रुकू करे, फिर उलटे पैर मिम्बर से नीचे उतरे यहाँ तक कि मिम्बर के किनारे जमीन पर सजदह करे, फिर मिम्बर पर वापस लौट जाये और दूसरी रकअत में भी वैसा ही करे जैसा कि पहली रकअत में किया था।

नमाज़ी का अपने सामने सुत्रा रख कर और उस के क़रीब हो कर नमाज पढ़ना वाजिब हैः

17- नमाज़ी का अपने सामने सुत्रा रख कर नमाज़ पढ़ना वाजिब है, और इस बारे में मस्जिद और मस्जिद के अलावा के बीच, तथा छोटी और बड़ी मस्जिद के बीच कोई अंतर नहीं है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह कथन सामान्य हैः "तुम बिना सुत्रा के नमाज़ न पढ़ो, और तुम किसी आदमी को अपने सामने से  हरगिज़ गुज़रने न दो, अगर वह नहीं मानता है तो उस से झगड़ा करो, क्योंकि उस के साथ एक मित्र (अर्थात शैतान) होता है।"

18- तथा उस से क़रीब रहना ज़रूरी है ; क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस बात का ह़ुक्म दिया है।

19- तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सजदह करने की जगह और उस दीवार के बीच जिस की तरफ आप नमाज पढ़ते थे तक़रीबन एक बकरी के गुज़रने के बराबर फासिला होता था, इसलिए जिस ने ऐसा किया उस ने जितना निकट रहना वाजिब है उस को अंजाम दे दिया। ( मैं कहता हूँ किः इस से हमें पता चलता है कि लोग जो चीज़ उन सभी मस्जिदों में करते हैं जिन्हें मैं ने सीरिया वगैरह में देखा है कि वे लोग मस्जिद के बीच में दीवार या खम्भे से दूर हो कर नमाज पढ़ते हैं, यह कार्रवाई (कृत्य) अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हुक्म और आप के कर्म (अमल) से ग़फ़लत और लापरवाही का नतीजा है)

सुत्रा की ऊंचाई की मात्राः

20- सुत्रा का ज़मीन से लगभग एक बित्ता (9 इंच) या दो बित्ता ऊंचा रखना वाजिब है। क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है किः "जब तुम में से कोई आदमी अपने सामने कजावे के अंतिम भाग की लकड़ी की तरह (कोई चीज़) रख ले तो उसे चाहिए कि वह नमाज़ पढ़े, और उस काजावे के बाद से गुज़रने वाले की वह कोई परवाह न करे। ( कजावे के अंत में जो खम्भा होता है उसे अरबी भाषा में "अल-मुअख्खरह" कहते हैं, और ऊँट के लिए कजावा ऐसे ही होता है जिस प्रकार कि घोड़े के लिए काठी होती है। तथा हदीस से इंगित होता है की धरती पर लकीर खींचना (सुत्रा के लिए) पर्याप्त नहीं है, और इस बारे में जो हदीस वर्णित है वह ज़ईफ (कमज़ोर) है )।

21- और नमाज़ी सीधे सुत्रा की ओर चेहरा करेगा, क्योंकि सुत्रे की ओर नमाज़ पढ़ने के हुक्म से यही अर्थ ज़ाहिर होता है, और जहाँ तक उस से दायें या बायें तरफ हट कर इस तरह खड़े होने का संबंध है कि ठीक उसी की ओर मुँह न हो, तो यह साबित (प्रमाणित) नहीं है।

22- तथा जमीन में गड़ी हुई लकड़ी वगैरह की तरफ नमाज़ पढ़ना जाइज़ है, इसी प्रकार किसी पेड़ की तरफ, या किसी खम्भे की तरफ, या चारपाई पर लेटी हुई अपनी पत्नी की ओर इस हाल में कि व अपनी रज़ाई (कम्बल) के नीचे हो, तथा चौपाये की ओर, भले ही वह ऊँट ही क्यों न हो, इन सब की तरफ (यानी इन्हें सुत्रा मान कर) नमाज़ पढ़ना जाइज़ है।

क़ब्र की ओर मुँह कर के नमाज़ पढ़ना हराम हैः

23- किसी भी हालत में क़ब्र की ओर नमाज़ पढ़ना जाइज़ नहीं है, चाहे वे नबियों की क़ब्रें हों या उन के अलावा अन्य लोगों की।

नमाजी के सामने से गुज़रना हराम है, चाहे वह मस्जिदे हराम के अंदर ही क्यों न होः

24- नमाजी के सामने से गुज़ना जाइज़ नहीं है जब कि उस के सामने सुत्रा हो, और इस बारे में मस्जिदे हराम और उस के अलावा दूसरी मस्जिदों के बीच कोई अंतर नहीं है, अतः सभी मस्जिदें जाइज़ न होने में बराबर और समान हैं, क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह फरमान आम (सामान्य) है किः "अगर नमाजी के सामने से गुज़रने वाले को यह पता चल जाए कि उस पर कितना गुनाह है, तो उस के लिए चालीस (साल, या महीना, या दिन तक) खड़ा रहना इस बात से अच्छा होता कि वह नमाज़ी के सामने से गुज़रे।" अर्थातः नमाज़ी और उस के सजदह की जगह के बीच से गुज़रना। ( और जहाँ तक उस हदीस का संबंध है जिस में यह वर्णन है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बिना सुत्रा के ‘मताफ’ के किनारे नमाज़ पढ़ी और लोग आप के सामने से गुज़र रहे थे, तो यह सही नहीं है। जब कि इस हदीस में इस चीज़ का वर्णन नहीं है कि लोग आप के और आप के सजदह करने की जगह के बीच से गुज़र रहे थे। )

नमाज़ी का अपने सामने से गुज़रने वाले को रोकना वाजिब है, चाहे वह मस्जिदे हराम ही में क्यों न होः

25- सुत्रा रख कर नमाज़ पढ़ने वाले आदमी के लिए जाइज़ नहीं है कि वह अपने सामने से किसी को गुज़रने दे, जैसा कि पिछली हदीस में है किः “तुम किसी को अपने सामने से मत गुज़रने दो...’’, तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान हैः "जब तुम में से कोई आदमी किसी चीज़ की ओर नमाज़ पढ़ रहा हो जो उस के लिए लोगों से आड़ हो, फिर कोई आदमी उस के सामने गुज़रना चाहे तो वह उसके सीने पर मार कर उसे ढकेल दे और जहाँ तक हो सके उसे रोके।" और एक दूसरी रिवायत में है किः "तो उसे -दो मर्तबा- रोके, अगर इस के बाद भी वह न रुके तो फिर उस से भिड़ जाए क्योंकि वह शैतान है।"

गुज़रने वाले को रोकने के लिए आगे चल कर जानाः

26- नमाज़ी के लिए किसी गैर मुकल्लफ (जो शरीअत के आदेशों का बाध्य नहीं है) जैसे किसी चौपाये या बच्चे को अपने सामने से गुजरने से रोकने के लिए एक कदम या उससे अधिक आगे बढ़ना जाइज़ है ताकि वह उस के पीछे से गुज़र जाए।

नमाज़ को काट देने वाली चीज़ों का बयानः

27- नमाज में सुत्रे का महत्व यह है कि वह उस की तरफ नमाज़ पढ़ने वाले आदमी और उस के सामने से गुज़र कर उस की नमाज़ को खराब करने के बीच रुकावट बन जाता है। इस के विपरीत जो आदमी सुत्रा नहीं रखता है तो ऐसे आदमी के सामने से जब कोई व्यस्क औरत, या इसी प्रकार गधा या काला कुत्ता गुज़रता है, तो उस की नमाज़ को काट देता है। (अर्थात खराब कर देता है).

तीसराः नीयत

28- नमाज़ी के लिए ज़रूरी है कि जिस नमाज़ के लिये खड़ा हुआ है उस की नीयत करे और अपने दिल में उस को निर्धारित करे जैसे उदाहरण के तौर पर ज़ुहर या अस्र की फर्ज़, या उन दोनों की सुन्नत, और यह नमाज़ की शर्त या रुक्न है, किन्तु जहाँ तक नीयत को अपनी ज़ुबान से कहने का संबंध है तो यह बिद्अत और सुन्नत के खिलाफ़ है, और मुक़ल्लिदीन जिन इमामों की पैरवी करते है उन में से किसी एक ने भी यह बात नहीं कही है।

चौथाः तकबीर

29- फिर "अल्लाहु अकबर" कह कर नमाज़ का आरंभ करे, और यह नमाज़ का रुक्न है, क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान हैः "नमाज़ की कुंजी पवित्रता (वुज़ू) है, और उस की तहरीम (यानी नमाज़ से असंबंधित बातों को हराम करने वाली चीज़) तकबीर है और उस की तहलील (हलाल करने वाली चीज़) सलाम फेरना है।" अर्थातः अल्लाह के हराम किये हुये कामों को हराम ठहराना और इसी प्रकार जिन चीजों को अल्लाह ने नमाज़ के बाहर हलाल किया है उन को हलाल ठहराना, और तहलील और तहरीम से मुरादः हराम करने वाली चीजे और हलाल करने वाली चीजे है।

30- इमाम के सिवाय अन्य नमाजि़यों के लिए सभी नमाज़ों में तकबीर के साथ अपनी आवाज़ को बुलंद करना जाइज नहीं है।

31- ज़रूरत पड़ने पर मुअज्जि़न का इमाम की तकबीर को लोगों तक पहुँचाना जाइज़ है, जैसे कि इमाम का बीमार होना और उस की आवाज का कमज़ोर होना या इमाम के पीछे नमाजियों की संख्या का बाहुल्य होना।

32- मुक्तदी, इमाम की तकबीर के समाप्त होने के बाद ही तकबीर (अल्लाहु अकबर) कहेगा।

दोनों हाथों को उठाना और उस का तरीक़ाः

33- नमाज़ी तकबीर कहने के साथ ही, या उस से पहले, या उसके बाद अपने दोनों हाथों को उठाये, ये सभी विधियाँ सुन्नत से साबित हैं।

34- वह अपने दोनों हाथों को इस तरह उठाये कि उन की अंगुलियाँ फैली हुई हों।

35- और अपनी दोनों हथेलियों को अपने दोनों मोंढों के बराबर तक ले जाये, और कभी कभी उन दोनों को उठाने में मुबालगा करे यहाँ तक कि उन्हें दोनों कानों के किनारों के बराबर तक ले जाये। (मैं कहता हूँ किः जहाँ तक अपने दोनों अंगूठों से अपने दोनों कानों की लौ को छूने का संबंध है तो सुन्नत में इस का कोई आधार नहीं है, बल्कि वह मेरे नज़दीक वस्वसे के कारणों में से है)।

दोनों हाथों को रखने का बयान और उस का तरीक़ाः

36- फिर तकबीर कहने के बाद ही (नमाज़ी) अपने दाहिनें हाथ को बायें हाथ पर रख ले, और यह पैगंबरों (उन पर अल्लाह की दया औऱ शांति अवतरित हो) की सुन्नत है और अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम को इस का आदेश दिया है, अतः दोनों हाथों को लटकाये रखना जाइज़ नहीं है।

37- और वह दायें हाथ को अपने बायें हाथ की हथेली की पीठ पर, और कलाई और बाज़ू पर रखे।

38- और कभी कभी अपने दायें हाथ से बायें हाथ को पकड़ ले। किन्तु जहाँ तक इस बात का संबंध है कि बाद के कुछ उलमा (विद्वानों) ने एक ही समय में एक साथ हाथ को रखने और मुट्ठी से पकड़ने को श्रेष्ठ कहा है, तो इस का कोई आधार नहीं है।

हाथ रखने की जगहः

39- और वह अपने दोनों हाथों को केवल अपने सीने पर रखेगा और इस बारे में मर्द और औरत सब बराबर हैं। (मैं कहता हूँ किः जहाँ तक दोनों हाथों को सीने के अलावा पर रखने का प्रश्न है, तो यह या तो ज़ईफ है या निराधार है।).

40- और उस के लिए अपने दाहिने हाथ को अपनी कमर पर रखना जाइज़ नहीं है।

खुशू व ख़ुज़ू और सजदह की जगह पर देखनाः

41- नमाज़ी के लिए ज़रूरी है कि अपनी नमाज़ को खुशू (नम्रता और विनय) के साथ अदा करे और उस से ग़ाफिल कर देने वाली सभी चीजों जैसे श्रृंगार और बेल बूटे से दूर रहे, अतः ऐसे खाने की मौजूदगी में नमाज़ न पढ़े जिसे खाने की वह खाहिश रखता है, और न ही ऐसी अवस्था में नमाज़ पढ़े कि उसे पेशाब या पाखाना की सख्त हाजत हो।

42- और अपने क़ियाम (खड़े होने) की हालत में अपने सजदह करने की जगह पर निगाह रखे।

43- और वह नमाज़ मे इधर उधर (दायें और बायें) न मुड़े, क्योंकि इधर उधर मुड़ना एक प्रकार का झपटना है जिसे शैतान बन्दे की नमाज़ से झपट लेता है।

44- और नमाज़ी के लिए अपनी निगाह को आसमान की तरफ उठाना जाइज़ नहीं है।

दुआउल इस्तिफ्ताह (नमाज़ को आरंभ करने की दुआः)

45- फिर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित दुआओं में से किसी दुआ से नमाज़ का आरंभ करे, और ये बहुत अधिक हैं और उन में से सब से मशहूर यह दुआ हैः "सुब्हानकल्लाहु व बि-हमदिका, व तबारकस्मुका व तआला जद्दुका" (अल्लाह, तू पाक है और हम तेरी प्रशंसा करते हैं, तेरा नाम बड़ी बर्कत वाला (बहुत शुभ) औ तेरी महिमा (शान) सर्वोच्च है, तथा तेरे अलावा कोई सच्चा पूज्य नहीं). इस दुआ को पढ़ने का (नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से) हुक्म साबित है, अतः इस की पाबंदी करना उचित है। (और जो आदमी शेष दुआओं की जानकारी चाहता है तो वह किताब "सिफतुस्सलात" पेज न0 91-95, मुद्रण मकतबतुल मआरिफ रियाज़, का अध्ययन करे)।

पाँचवां : क़िराअत

46- फिर अल्लाह तआला से पनाह मांगे।

47- और सुन्नत (मसनून तरीक़ा) यह है कि वह कभी यह दुआ पढ़ेः "अऊज़ो बिल्लाहि मिनश्शैतानिर्रजीम ; मिन हम्ज़िही, व नफ्ख़िही, व नफ्सिही" (मैं अल्लाह के शरण में आता हूँ शापित शैतान ; उस के वस्वसे़, उस की घमण्ड, और उस के जादू से)  यहाँ पर नफ्स से मुराद निंदित पद्य (काव्य) है।

48- और कभी कभार यह दुआ पढ़ेः "अऊज़ो बिल्लाहिस् समीइल अलीमि मिनश्शैतानिर्रजीम... "

49- फिर जहरी (ज़ोर से पढ़ी जाने वाली) और सिर्री (आहिस्ता से पढ़ी जाने वाली) दोनों नमाज़ो में आहिस्ता से "बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम" पढ़े।

सूरतुल फातिह़ा पढ़ने का बयानः

50- फिर मुकम्मल सूरतुल फातिह़ा पढ़े, - और बिस्मिल्लाह भी उसी में शामिल है -, और यह नमाज़ का एक रुक्न है, जिस के बिना नमाज़ सही (शुद्ध) नहीं होती है, अतः गैर अरबी लोगों के लिये इसे याद करना अनिवार्य है।

51- जो आदमी इस को याद करने की ताक़त नहीं रखता है तो उस के लिए यह पढ़ना काफी हैः "सुब्हानल्लाह, अल्हम्दुलिल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह, अल्लाहु अकबर, ला हौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह"

52- और सुन्नत का तरीक़ा यह है कि सूरतुल फातिह़ा को एक एक आयत अलग अलग कर के पढ़े और हर आयत के अंत में ठहरे, चुनांचि "बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम" पढ़े, फिर ठहर जाये, फिर "अल्हम्दुलिल्लाहि रब्बिल आलमीन" पढ़े, फिर रुक जाये फिर "अर्रहमानिर्रहीम" पढ़े, फिर रुक जाये ... और इसी तरह सूरत के अन्त तक पढ़े।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पूरी क़िराअत इसी तरह हुआ करती थी, आप हर आयत के आखिर में ठहरते थे और उसे बाद वाली आयत से नहीं मिलाते थे, भले ही उस का अर्थ उस से संबंधित होता था।

53- तथा "मालिक" और "मलिक" दोनों पढ़ना जायज़ है।

 मुक़तदी का सूरतुल फातिह़ा पढ़नाः

54- मुक़तदी पर अनिवार्य है कि सिर्री और जहरी दोनों नमाज़ो में इमाम के पीछे सूरतुल फातिह़ा पढ़े, अगर उस ने इमाम की क़िराअत नहीं सुनी है, या इमाम सूरतुल फातिहा पढ़ने के बाद इतनी देर खामोश रहा जितने समय में मुक़तदी सूरतुल फातिह़ा पढ़ने पर सक्षम हो, अगरचे हमारा विचार यह है कि यह खामोशी सुन्नत से साबित नहीं है। (मैं कहता हूँ किः मैं ने इस विचार -मत- की ओर जाने वालों के प्रमाण और उस पर होने वाली आपत्ति का उल्लेख सिलसिलतुल अहादीस अज़्ज़ईफा में हदीस संख्याः 546 और 547 के अंतर्गत पृ0 2/24, 26, मुद्रण दारुल मआरिफ में किया है)।

सूरतुल फातिहा के बाद की क़िराअतः

55- सूरतुल फातिह़ा के बाद पहली दोनों रकअतों में कोई दूसरी सूरत या कुछ आयतें पढ़ना मसनून है, यहाँ तक कि जनाज़ा की नमाज़ में भी।

56- और कभी कभी सूरतुल फातिह़ा के बाद क़िराअत लम्बी करेंगे और कभी कभी किसी कारणवश जैसे सफर, या खांसी, या बीमारी, या छोटे बच्चे के रोने के कारण क़िराअत को छोटी करेंगे।

57- और नमाज़ों के विभिन्न होने के साथ क़िराअत भी भिन्न होती है, चुनांचि फज्र नमाज़ की क़िराअत सारी नमाज़ों की क़िराअतों से अधिक लम्बी होती है, फिर आम तौर पर ज़ुहर, फिर अस्र और इशा और फिर मग़रिब की क़िराअत होती है।

58- और रात की नमाज़ की क़िराअत इन सभी नमाज़ों से लम्बी होती है।

59- और सुन्नत का तरीक़ा यह है कि पहली रक़अत की क़िराअत दूसरी रक़अत से लम्बी करनी चाहिये।

60- और दोनों अंतिम रकअतों की क़िराअत पहले की दोनों रकअतों से आधी मात्रा में छोटी करनी चाहिए। (इस अध्याय के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए यदि चाहें तो "सिफतुस्सलात" नामी किताब का पेज न0 102 देखें)।

हर रक़अत में सूरतुल फातिह़ा पढ़नाः

61- हर रक़अत में सूरतुल फातिह़ा पढ़ना वाजिब है।

62- कभी कभी आखिर की दोनों रकअतों में भी सूरतुल फातिह़ा के अतिरिक्त (कोई सूरत या कुछ आयतें) पढ़ना मसनून है।

63- इमाम का क़िराअत को सुन्नत में वर्णित मात्रा से अधिक लम्बी करना जाइज़ नहीं है, क्योंकि इस के कारण उस के पीछे नमाज़ पढ़ने वाले किसी बूढ़े आदमी, या बीमार, या दूध पीते बच्चे वाली महिला, या किसी ज़रूरतमंद को कष्ट पहुँच सकता है।

क़िराअत को बुलन्द और धीमी आवाज़ में करने का बयानः

64- सुबह (फज्र) की नमाज़, तथा जुमुआ, ईदैन (ईदुल फित्र और ईदुल अज़्हा) और सलातुल इस्तिस्क़ा (बारिश मांगने की नमाज़), कुसूफ (सूर्य या चाँद ग्रहण) की नमाज़ और इसी प्रकार मग़रिब और इशा की पहली दो रकअतों में किराअत बुलन्द आवाज़ से करेंगे।

तथा जुहर और अस्र की नमाज़ में, और इसी प्रकार मग़रिब की तीसरी रकअत में तथा इशा की अंतिम दोनों रकअतों में क़िराअत धीमी आवाज़ से करेंगे।

65- इमाम के लिए कभी कभार सिर्री नमाज़ में मुक़तदियों को आयत सुनाना जाइज़ है।

66- जहाँ तक वित्र और रात की नमाज़ (तहज्जुद) का संबंध है, तो उन में कभी धीमी आवाज़ से क़िराअत करेंगे और कभी तेज़ आवाज़ से और आवाज़ को ऊँची करने में बीच का रास्ता अपनायें गे।

कुर्आन को तर्तील से (अर्थात ठहर ठहर कर) पढ़नाः 

67- सुन्नत का तरीक़ा यह है कि कुर्आन को तर्तील के साथ (ठहर ठहर कर) पढ़े, बहुत तेज़ी और जल्दी से न पढ़े, बल्कि एक एक अक्षर को स्पष्ट कर के पढ़े, और कुर्आन को अपनी आवाज़ से खूबसूरत बनाये और तज्वीद के उलमा के नज़दीक ज्ञात नियमों की सीमा में रह कर उसे राग से पढ़े, किन्तु आज कल के नवीन अविष्कारित (गढ़े हुये) सुरों (स्वरों) और संगीत के नियमों के अनुसार लय के साथ नहीं गायें गे।

इमाम को ग़लती पर सावधान करना (लुक़्मा देना)

68- अगर इमाम कुरआन की क़िराअत करते हुए अटक जाये तो मुक़तदी के लिए उसको लुक़्मा देना (सुझाव देना) मसनून है।

छठाः रुकूअ़ का बयानः

69- जब नमाज़ी क़िराअत से फारिग़ हो जाये, तो सांस लेने भर की मात्रा में एक सक्ता करे (अर्थात खामोश रहे)।

70- फिर तकबीरतुल एहराम में वर्णित तरीक़ों के अनुसार अपने दोनों हाथों को उठाये।

71- और अल्लाहु अकबर कहे, और यह वाजिब है।

72- फिर इस मात्रा में रुकू करे कि उस के जोड़ अपनी जगह पर ठहर जायें और हर अंग अपनी जगह पर पहुँच जाये, और यह नमाज़ का एक रुक्न है।

रुकू का तरीक़ाः

73- अपने दोनों हाथों को अपने दोनों घुटनों पर रखे, और उन दोनों को अपने दोनों घुटनों पर जमा दे, और अपनी अंगुलियों के बीच में कुशादगी रखे जैसे कि वह अपने दोनों घुटनों को पकड़े हुए हो, और ये सभी चीजें वाजिब हैं।

74- और अपनी पीठ को फैला ले और उस को बिल्कुल बराबर रखे यहाँ तक कि अगर उस पर पानी डाला जाये तो वह ठहर जाये, और यह वाजिब है।

75- और अपने सिर को न तो झुकाये और न ही ऊपर उठाये, बल्कि उसे बिल्कुल अपनी पीठ की बराबरी में रखे।

76- और अपनी दोनों कुहनियों को अपने दोनों पहलुओं से दूर रखे।

77- और अपने रुकू के अन्दर तीन मर्तबा या उस से अधिक बार "सुब्ह़ाना रब्बियल अज़ीम" कहे। (और इस के अलावा अन्य अज़कार भी हैं जिन्हें इस रुक्न के अन्दर पढ़ा जाता है, उन में से कोई ज़िक्र लम्बी, कोई औसत और कोई छोटी है, जिन्हें किताब "सिफतो सलातिन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्ल" के पेज न0 132, मुद्रण मकतबतुल मआरिफ में देखा जा सकता है)।

अरकान को बराबर करने का बयानः

78- सुन्नत का तरीक़ा यह है कि नमाज़ी सभी अरकान के बीच लम्बाई में बराबरी करे, चुनाँचे अपने रुकू, रुकू के बाद अपने क़ियाम, तथा अपने सज्दे और दोनों सज्दों के बीच बैठक को तक़रीबन बराबर रखे।

79- तथा रुकू और सज्दा में कुर्आन की तिलावत करना जाइज़ नहीं है।

रुकू से सीधा होनाः

80- फिर रुकू से अपनी पीठ को ऊपर उठाये, और यह नमाज़ का एक रुक्न है।

81- और रुकू से सीधा खड़ा होने के दौरान "समिअल्लाहु लिमन हमिदह" कहे, और यह वाजिब है।

82- और रुकू से सीधा होते समय पीछे वर्णित तरीक़ों के अनुसार अपने दोनों हाथों को उठाये।

83- फिर बिल्कुल सीधा इतमिनान के साथ खड़ा हो जाये यहाँ तक कि हर हड्डी अपनी जगह पर पहुँच जाये, और यह नमाज़ का एक रुक्न है।

84- और इस क़ियाम में "रब्बना व लकल हम्द" कहे। (और इस के अलावा अन्य अज़कार भी हैं जिन्हें इस रुक्न में पढ़ा जाता है, अतः "सिफतुस्सलात" नामी किताब के पेज न0 135 का अध्ययन करें)। और यह सभी नमाज़ियों पर वाजिब है, चाहे वह मुक़तदी ही क्यों न हो, क्योंकि यह क़ियाम (रुकू के बाद खड़े होने) का विर्द (जप) है, और "समिअल्लाहु लिमन हमिदह" रुकू से सीधा होने का विर्द (जप) है, और इस क़ियाम में दोनों हाथों को एक दूसरे पर रखना धर्म संगत नहीं है क्योंकि यह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित नहीं है, यदि आप इस संबंध में विस्तृत जानकरी चाहते हैं तो असल किताब "सिफतो सलातिन्नबी 1- क़िब्ला की ओर मुँह करना" देखिये)।

85- और इस क़ियाम और रुकू के बीच लम्बाई में बराबरी करे, जैसा कि पहले गुज़र चुका है।

सातवाँ : सज्दे का बयानः

86- फिर अनिवार्य रूप से "अल्लाहु अकबर" कहे।

87- और कभी कभार अपने दोनों हाथों को उठाये।

अपने दोनों हाथों के सहारे सज्दे में गिरनाः

88- फिर अपने दोनों हाथों के सहारे सज्दे में गिर जाये, अपने दोनों हाथों को दोनों घुटनों से पहले (ज़मीन पर) रखे, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इसी का हुक्म दिया है, और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की करनी से ऐसा ही साबित है, और आप ने ऊंट के बैठने की तरह बैठने से मना फरमाया है।

और ऊंट की बैठक यह है कि वह अपने दोनों घुटनों के सहारे बैठता है जो कि उस के दोनों अगले कदमों में होता हैं।

89- और जब सज्दा करे (और यह नमाज़ का एक रुक्न है) तो अपनी दोनों हथेलियों का सहारा ले और उन दोनों को जमीन पर बिछा दे (फैला कर रखे)।

90- और दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में मिला कर रखे।

91- और उन को क़िब्ला की ओर रखे।

92- और अपनी दोनों हथेलियों को अपने दोनों मोंढों के बराबर में रखे।

93- और कभी कभार उन दोनों (हथेलियों) को अपने दोनों कानों के बराबर में रखे।

94- और लाज़मी (अनिवार्य) तौर पर अपने दोनों बाज़ुओं को ज़मीन से ऊपर उठाये रखे और उन दोनों को कुत्ते की तरह न फैलाये (बिछाये)।

95- और अपनी नाक एवं पेशानी को ज़मीन पर टिका दे, और यह नमाज़ का एक रुक्न है।

96- और अपने दोनों घुटनों को भी ज़मीन पर टेक दे।

97- और इसी प्रकार अपने दोनों कदमों के किनारों को भी।

98- और उन दोनों (क़दमों) को खड़ा रखे, और ये सभी चीजें वाजिब हैं।

99- और अपने दोनों पैरों की अंगुलियों के किनारों को क़िब्ला की ओर रखे।

100- और अपनी दोनों एड़ियों को मिलाकर रखे।

सज्दे में इतमिनानः

101- नमाज़ी पर अनिवार्य है कि अपने सज्दे को इतमिनान और सुकून से करे, और वह इस प्रकार कि सज्दे में अपने सज्दे के सभी अंगों पर बिल्कुल बराबर आश्रय करे, और सज्दे के अंग इस प्रकार हैं - पेशानी नाक समेत, दोनों हथेलियाँ, दोनों घुटने और दोनों पैरों के किनारे।

102- और जिस ने अपने सज्दे में इस प्रकार संतुलन से काम लिया, तो निश्चित रूप से उसे इतमिनान प्राप्त हो गया, और सज्दे में इतमिनान से काम लेना (इतमिनान से सज्दे करना) भी नमाज़ का एक रुक्न है।

103- और सज्दे के अन्दर तीन या उस से अधिक बार "सुब्हाना रब्बियल आ'ला" पढ़े। (और सज्दे में इस के अलावा दूसरे अज़कार भी हैं जिन्हें आप "सिफतो सलातिन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम" के पेज न0 145 में देख सकते हैं)।

104- सज्दे के अन्दर अधिक से अधिक दुआ करना मुसतहब (पसंदीदा) है ; क्योंकि यह क़ुबूल होने के अधिक योग्य है।

105- और अपने सज्दे को लम्बाई में तक़रीबन अपने रुकू के बराबर रखे, जैसा कि पहले गुज़र चुका है।

106- ज़मीन पर, या उन दोनों के बीच और पेशानी के बीच किसी हाइल (रुकावट) जैसे कपड़ा, कम्बल, चटाई वगैरह पर सज्दा करना जाइज़ है ।

107- तथा सज्दे की हालत में कुर्आन पढ़ना जाइज़ नहीं है।

दोनों सज्दों के बीच बैठने का तरीक़ा एंव इक़आ का बयानः

108- फिर "अल्लाहु अकबर" कहते हुए अपना सर उठाये, और यह नमाज़ का एक वाजिब है।

109- और कभी कभार अपने दोनों हाथों को उठाये।

110- फिर इतमिनान के साथ बैठ जाये यहाँ तक कि हर हड्डी अपनी जगह पर पहुंच जाये, और यह नमाज़ का एक रुक्न है।

111- और अपने बायें पैर को बिछाकर कर उस पर बैठे जाये, और यह नमाज़ का एक वाजिब है।

112- और अपने दायें पैर को खड़ा रखे।

113- और उस की अंगुलियों को क़िब्ला की ओर रखे।

114- और कभी कभार इक़आ की बैठक जाइज़ है और उस का तरीक़ा यह है कि अपने दोनों पैरों को खड़ा रखे और उन के किनारों को ज़मीन पर रखे और अपनी दोनों ऐड़ियों पर बैठ जाये।

115- और इस बैठक में यह दुआ पढ़ेः "अल्लाहुम्मग़ फ़िर-ली, वर्हम्नी, वज्बुर्नी, वर्फा'नी, व आफिनी, वर्ज़ुक़्नी"।

116- और अगर चाहे तो यह दुआ पढ़ेः "रब्बिग़ फ़िर-ली, रब्बिग़ फिर-ली"।

117- और इस बैठक को लम्बी करे यहाँ तक कि उस के सज्दा के क़रीब हो जाये।

दूसरा सज्दाः

118- फिर वजूबी (अनिवार्य) तौर पर अल्लाहु अकबर कहे।

119- और कभी कभार इस तकबीर के साथ अपने दोनों हाथों को उठाये।

120- और दूसरा सज्दा करे, और यह भी नमाज़ का एक रुक्न है।

121- और जो कुछ पहले सज्दे में किया था इस में भी करे।

जल्सा-ए- इस्तिराह़त का बयानः

122- जब दूसरे सज्दे से अपना सर उठाये और दूसरी रक़अत के लिये खड़ा होना चाहे तो वजूबी (अनिवार्य) तौर पर अल्लाहु अकबर कहे।

123-और कभी कभार अपने दोनों हाथों को उठाये।

124- और उठने से पहले अपने बायें पैर पर पूरी तरह इतमिनान और सुकून के साथ बैठ जाये, यहाँ तक कि हर हड्डी अपनी जगह पर वापस लौट आये।

दूसरी रकअत का बयानः

125- फिर अपने दोनों हाथों को ज़मीन पर टेकते हुए दूसरी रक़अत के लिये खड़ा हो, जिस प्रकार कि आटा गूंधने वाला उन दोंनों को मुठ्ठी बांधे होता है, और यह एक रुक्न है।

126- और इस में भी वही सब करे जो पहली रक़अत में किया था।

127- मगर इस में दुआ-ए इस्तिफ्ताह़ (प्रारंभिक दुआ) नहीं पढ़ेंगे।

128- और इस रकअत को पहली रकअत से छोटी करेंगे।

तशह्हुद के लिये बैठनाः

129- जब दूसरी रकअत से फारिग़ हो जाये तो तशह्हुद के लिये बैठ जाये, और यह वाजिब है।

130- और बायाँ पैर बिछाकर बैठ जाये जैसाकि दोनों सज्दों के बीच बैठने के तरीक़े के वर्णन में गुज़र चुका है।

131- किन्तु यहाँ पर इक़आ वाली बैठक जाइज़ नहीं है।

132- और अपनी दायीं हथेली को अपने दायें घुटने और रान पर रखे, और अपनी दायीं कुहनी के सिरे को अपनी रान पर रखे, उस को उस से दूर न करे।

133- और अपनी बायीं हथेली को अपने बायें घुटने और रान पर फैला (बिछा) ले।

134- और उस के लिए अपने हाथ पर टेक लगा कर बैठना जाइज़ नहीं है, खास तौर से बायें हाथ पर।

अंगुली को हिलाना और उस की तरफ देखनाः

135- अपनी दायीं हथेली की सभी अंगुलियों को समेट ले (मुट्ठी बना ले), और कभी कभार अपने अंगूठे को अपनी बीच वाली अंगुली पर रखे।

136- और कभी कभार उन दोनों (बीच वाली अंगुली और अंगूठे) का एक दायरा बना ले।

137- और अपनी शहादत वाली अंगुली से क़िब्ला की तरफ इशारा करे।

138- और अपनी नज़र को उस की तरफ गड़ाए रखे।

139- और तशह्हुद के शुरू से अंत तक उसे हिलाता रहे उस के साथ दुआ करता रहे।

140- और अपने बायें हाथ की अंगुली से इशारा न करे।

141- और यह सब चीजें हर तशह्हुद में करे।

तशह्हुद के शब्द और उस के बाद की दुआः

142- तशह्हुद नमाज़ का एक वाजिब है, अगर कोई उसे भूल जाये तो सह्व के दो सज्दे करेगा।

143- और तशह्हुद को आहिस्ता से पढ़ेगा।

144- उस के शब्द इस प्रकार हैं-

"अत्तहिय्यातो लिल्लाहि, वस्सला-वातो, वत्तैइबातो, अस्सलामो अलैका अय्योहन्नबिय्यो व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू, अस्सलामो अलैना व अला इबादिल्लाहिस्सालिहीन, अश्हदो अन् ला इलाहा इल्लल्लाह, व अश्हदो अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुह"

(और मेरी वर्णित किताब में इस के अलावा ज़िक्र के दूसरे प्रमाणित शब्द भी हैं और जिस को मैंने यहाँ उल्लेख किया है वे सब से शुद्ध शब्द हैं।)

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर सलामः नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के स्वर्गवास के बाद आप पर सलाम पढ़ने के लिए यही शब्द मसनून हैं और यही इब्ने मसऊद, आइशा और इब्ने ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हुम के तशह्हुद से साबित है, और जो अतिरिक्त विस्तार चाहता है वह मेरी किताब "सिफतो सलातिन्नबी", पेज न0 161, मुद्रण मकतबतुल मआरिफ रियाज़, का अध्ययन करे।

145- और इस के बाद अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद भेजे, जिसके शब्द इस प्रकार हैं - "अल्लाहुम्मा सल्ले अला मुहम्मद, व अला आले मुहम्मद, कमा सल्लैता अला इब्राहीमा व अला आले इब्राहीम, इन्नका हमीदुन मजीद, अल्लाहुम्मा बारिक अला मुहम्मद, व अला आले मुहम्मद, कमा बारक्ता अला इब्राहीमा व अला आले इब्राहीम, इन्नका हमीदुन मजीद"

146- और अगर आप संक्षेप में चाहते हैं तो यह दुरूद पढ़ें - "अल्लाहुम्मा सल्ले अला मुहम्मद, व अला आले मुहम्मद, व बारिक अला मुहम्मद, व अला आले मुहम्मद, कमा सल्लैता व बारक्ता अला इब्राहीम, व अला आले इब्राहीम, इन्नका हमीदुन मजीद"

147- फिर इस तशह्हुद में, वर्णित दुआओं में से जो दुआ उसे सब से अच्छी लगे उसे चयन करके उस के द्वारा अल्लाह तआला से दुआ करे।

तीसरी और चौथी रक्अत का बयानः

148- फिर अनिवार्य तौर पर अल्लाहु अकबर कहे, और सुन्नत का तरीक़ा यह है कि तकबीर बैठे हुए कहे।

149- और कभी कभार अपने दोनों हाथों को उठाये।

150- फिर तीसरी रक्अत के लिए उठे, और यह रुक्न है जैसे कि जो इस के बाद है।

151- और इसी प्रकार उस समय भी करे जब चौथी रकअत के लिये खड़ा होना चाहे।

152- लेकिन उठने से पहले अपने बायें पैर पर बिल्कुल इतमिनान और सुकून के साथ बराबर बैठ जाये यहाँ तक कि हर हड्डी अपनी जगह पर पहुँच जाये।

153- फिर अपने दोनों हाथों का सहारा लेते हुए खड़ा हो जाये, जिस तरह कि दूसरी रक्अत के लिए खड़ा होते समय किया था।

154- फिर तीसरी और चौथी हर रकअत में अनिवार्य रूप से सूरतुल फातिहा पढ़े।

155- और कभी कभार सूरतुल फातिहा के साथ एक या उस से अधिक आयतों की वृद्धि करना जाइज़ है।

क़ुनूते नाज़िला और उस के पढ़ने की जगह का बयानः

156- नमाज़ी के लिए मसनून है कि मुसलमानों पर किसी बिपदा (आपत्ति) के उतरने पर क़ुनूत पढ़े और मुसलमानों के लिए दुआ करे। 

157- और उस के पढ़ने का स्थान रुकू के बाद "रब्बना व लकल हम्द" कहने पर है।

158- और उस के लिए कोई निर्धारित (नियमित) दुआ नहीं है बल्कि उस के अन्दर ऐसी दुआ करे जो आपत्ति और बिपदा के अनुकूल हो।

159- और इस दुआ के अन्दर अपने दोनों हाथों को उठायेगा।

160- और अगर वह इमाम है तो बुलन्द आवाज़ से दुआ करेगा।

161- और जो उस के पीछे (मुक़तदी लोग) हैं उस पर आमीन कहेंगे।

162- जब उस से फारिग़ हो जाये तो अल्लाहु अकबर कहे और सज्दा करे।

वित्र का क़ुनूत, उस की जगह और उस के शब्दः

163- जहाँ तक वित्र के अन्दर क़ुनूत पढ़ने का संबंध है तो यह कभी कभार मसनून है।

164- और इस के पढ़ने की जगह, क़ुनूते नाज़िला के विपरीत, रुकू से पहले है।

165- और इस के अन्दर निम्नलिकित दुआ पढ़ेः

"अल्लाहुम्मह-दिनी फी मन् हदैत, व आफिनी फी मन आफैत, व त-वल्लनी फी मन तवल्लैत, व बारिक ली फी मा आ'तैत, व क़िनी शर्रा मा क़ज़ैत, फ-इन्नका तक़्ज़ी वला युक़्ज़ा अलैक, व-इन्नहू ला यज़िल्लो मन वालैत, वला य-इज़्ज़ो मन आदैत, तबारक्ता रब्बना व-तआलैत, वला मन्जा मिन्का इल्ला इलैक"

166- यह दुआ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सिखाई हुई है, अतः जाइज़ है ; क्योंकि सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम से साबित है।

167- फिर रुकू करे और दो सज्दे करे, जैसा कि पहले गुज़र चुका है।

आखिरी तशह्हुद और तवर्रुक़ का बयानः

168- फिर आखिरी तशह्हुद के लिए बैठ जाये।

169- और इस में भी वही सब करे जो पहली तशह्हुद में किया था।

170- लेकिन इस तशह्हुद में तवर्रुक के आसन पर बैठे, अपने बायें कूल्हे को ज़मीन पर रखे और बायें पैर को दाहिनी पिंडली के नीचे कर ले।

171- और अपने दायें पैर को खड़ा रखे।

172- और कभी कभार उस को फैलाना (बिछाना) भी जाइज़ है।

173- और अपने घुटने को बायीं हथेली का लुक्मा बना कर अपना बोझ उस पर रखे।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद पढ़ना और चार चीज़ों से पनाह मांगना वाजिब हैः

174- नमाज़ी पर अनिवार्य (वाजिब) है कि इस तशह्हुद में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद भेजे, और हम ने पहले तशह्हुद में इस के कुछ शब्दों का वर्णन किया है।

175- तथा नमाज़ी के लिए अनिवार्य है कि चार चीज़ो से अल्लाह तआला की पनाह मांगे, वह इस प्रकार कहेः "अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ो बिका मिन अज़ाबि जहन्नम, व-मिन अज़ाबिल क़ब्र, व-मिन फित्नतिल मह्या वल ममात, व-मिन शर्रे फित्नतिल मसीहिद्दज्जाल" (ऐ अल्लाह, मैं तेरी पनाह में आता हूँ नरक की यातना से, और क़ब्र की यातना से, और जीवन तथा मृत्यु के फित्ना (परीक्षा) से, और मसीह दज्जाल के फित्ना की बुराई से)।

जीवन के फित्नाः से अभिप्राय वह आज़माइश और परीक्षा है जो इन्सान को उस की ज़िन्दगी में दुनिया और उस की ख्वाहिशात में से पेश आती है। और मृत्यु के फित्ना से अभिप्रायः क़ब्र की परीक्षा और दोनों फरिश्तों का प्रश्न है, और मसीह दज्जाल के फित्ना से अभिप्रायः वो असाधारण और चमत्कारयुक्त चीजें हैं जो दज्जाल के हाथों पर ज़ाहिर होंगी जिस के कारण बहुत सारे लोग गुमराह हो जायेंगे और उस की उलूहियत (ईश्वर होने) के दावे को सच मान कर उस की पैरवी करेंगे।

सलाम फेरने से पहले दुआ करनाः

176- फिर वह, कुर्आन व हदीस से साबित दुआओं में से जो जी में आये, अपने लिए दुआ करे, और वे बहुत ज़ियादह और अच्छी दुआयें हैं, अगर उसे उन में से कुछ भी याद न हो, तो जो भी उस के लिए संभव हो अपने दीन या दुनिया के हित के लिए दुआ करे।

सलाम फेरनाः

177- फिर अपने दायें जानिब सलाम फेरे, और यह नमाज़ का एक रुक्न है, यहाँ तक कि उस के दायें गाल की सफेदी दिखाई देने लगे।

178- और इसी प्रकार अपने बायें जानिब सलाम फेरे, यहाँ तक कि उस के बायें गाल की सफेदी दिखाई देने लगे।

179- और इमाम खूब बुलंद आवाज़ से सलाम फेरे।

180- और सलाम के कई प्रकार हैं -

प्रथमः अपने दायें जानिब "अस्सलामो अलैकुम व रहमतुल्लाहे व बरकातुह" कहे, और अपने बायें तरफ "अस्सलामो अलैकुम व रहमतुल्लाह" कहे।

दूसराः पहले ही की तरह सिवाये "व बरकातुह" के।

तीसराः अपने दायें तरफ "अस्सलामो अलैकुम व रहमतुल्लाह", और अपने बायें तरफ "अस्सलामो अलैकुम" कहे।

चौथाः अपने चेहरे के सम्मुख, अपने दायें तरफ थोड़ा सा मुड़ते हुए एक मर्तबा सलाम फेरे।

मेरे मुस्लिम भाइयो,  यह "सिफतो सलातिन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम" (नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नमाज़ का तरीक़ा) नामी किताब का सारांश है, जिस के द्वारा मेरा यह प्रयास है कि मैं (नमाज़े नबवी) के तरीक़े को इस प्रकार आप के निकट कर दूँ कि वह आप के लिए बिल्कुल स्पष्ट हो जाए और आप के ज़ेहन में समा जाये, मानो कि आप उसे अपनी आँख से देख रहे हैं। जब आप उस तरीक़े के अनुसार नमाज़ अदा करेंगे जो मैं ने आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नमाज़ का आप के सामने बयान किया है, तो मुझे अल्लाह तआला से उम्मीद है कि वह उसे आप की तरफ से क़ुबूल फरमायेगा ; क्योंकि इस प्रकार आप ने वास्तव में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के फरमान किः "तुम उसी तरह नमाज़ पढ़ो जिस तरह मुझे नमाज़ पढ़ते देखा है।" को पूरा कर दिखाया।

फिर इस के बाद आप नमाज़ के अंदर दिल व दिमाग को हाज़िर रखना और उस में खुशू व खुज़ू का ध्यान रखना न भूलें, क्योंकि नमाज़ में बन्दे के अल्लाह के सामने खड़ा होने का यही सब से बड़ा मक़्सद है, और जिस मात्रा में आप अपने दिल मे खुशू व ख़ुज़ू और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के नमाज़ की पैरवी को सच कर दिखायें गे, उतना ही आप को वह प्रतीक्षित लाभ प्राप्त होगा जिस की तरफ अल्लाह तआला ने अपने इस फरमान में संकेत किया हैः "निः सन्देह नमाज़ बेहयाई और बुरी बातों से रोकती है।"

अन्त में, अल्लाह तआला से प्रार्थना है कि वह हम से हमारी नमाज़ों और अन्य सभी आमाल को स्वीकार करे, और उन के सवाब (प्रतिफल) को हमारे लिए उस दिन के लिए संग्रहित कर के रखे जिस दिन हम उस से मुलाक़ात करेंगेः "जिस दिन धन ओर बेटे कुछ लाभ नहीं देंगे सिवाय उस व्यक्ति के जो अल्लाह के पास पवित्र दिल लेकर आये।" (सूरतुश शुअराः 88, 89) और सभी प्रशंसायें सर्व संसार के पालनहार के लिए हैं।

किताब तल्खीस सिफतो सलातिन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मिनत्तकबीर इलत्तस्सलीम क-अन्नका तराहो ("नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नमाज़ तकबीर से ले कर सलाम फेरने तक - मोनो कि आप देख रहे हैं" नामी किताब का सारांश)

लेखः अल्लामा शैख़ मुहम्मद नासिरुद्दीन अल्बानी रहिमहुल्लाह.
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