Wed 16 Jm2 1435 - 16 April 2014
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क्या उसे ग़ैर मुस्लिम को इस्लाम के सभी विवरण बताना चाहिए?

क्या मुसलमान युवा के लिए ग़ैर मुस्लिमों में से किसी व्यक्ति को इस्लाम के बारे में सभी चीज़ें बताना ठीक है?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

जी हाँ, उसे इस्लाम का अर्थ बताना ठीक है, परंतु एक ही बार में उसे इस्लाम के सभी विवरण बताना बुद्धिबमानी नहीं है। इसलिए धर्म प्रचारक के लिए ज़रूरी है कि वह बुद्धिमान हो और सबसे महत्वपूर्ण चीज़ के द्वारा शुरूआत करे। तथा धर्म की ओर आमंत्रण देने के बारे में प्राथमिकतओं के शास्त्र के अनुसार कार्य करे, जैसाकि इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा की हदीस में है कि जब अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुआज़ रज़ियल्लाहु अन्हु को यमन का राज्यपाल बनाकर भेजा तो फरमाया : तुम एक ऐसी क़ौम के पास जा रहे हो जो अह्ले किताब (किताब वाले) हैं। अतः तुम उन्हें सबसे पहले अल्लाह की इबादत करने की दावत देना। जब वे अल्लाह को पहचान ले, तो उन्हें बताना कि अल्लाह ने उनके ऊपर उनके दिन और रात में पाँच नमाज़ें अनिवार्य की हैं। अगर वे इसे कर लें तो उन्हें बताना कि अल्लाह तआला ने उनके ऊपर उनके धन में ज़कात (दान) अनिवार्य किया है जो उनके धनवानों से लिया जायेगा और उनके गरीबों पर लौटा दिया जायेगा। अगर वे इस बात को मान लें तो यह उनसे ले लो, और लागों का अच्छा धन लेने से बचो।'' इसे बुखारी (हदीस संख्या : 1458) और मुस्लि (हदीस संख्या : 19)

मुसलमान को चाहिए कि वह इस्लाम का निमंत्रण इस शर्त के साथ दे कि वह उस चीज़ को जानता हो जिसकी वह निमंत्रण दे रहा है, ताकि वह निमंत्रण देने के दौरान गलती में न पड़े। जैसाकि अल्लाह का फरमान है :

﴿ قُلْ هَذِهِ سَبِيلِي أَدْعُو إِلَى اللَّهِ عَلَى بَصِيرَةٍ أَنَا وَمَنْ اتَّبَعَنِي وَسُبْحَانَ اللَّهِ وَمَا أَنَا مِنْ الْمُشْرِكِينَ﴾ [سورة يوسف : 108]

''आप कह दीजिए मेरा मार्ग यही है, मैं और मेरे मानने वाले पूरे विश्वास और भरोसे के साथ अल्लाह की ओर बुला रहे हैं, और अल्लाह पाक है और मैं अनेकेश्वरवादियों में नहीं।'' (सूरत युसूफ : 108)

इस आयत में 'बसीरत' का मतलब: ''वह जानकारी है जिससे सत्य और असत्य के बीच अंतर हो सके।'' बगवी रहिमहुल्लाह की बात उनकी तफ्सीर (4/284) से समाप्त हुई।

तथा इब्ने कसीर रहिमहुल्लाह ने अपनी तफ्सीर में इस आयत की व्याख्या करते हुए फरमाया : ''अल्लाह तआला अपने बंदे और इन्सान व जिन्नात की ओर भेजे गए अपने सन्देष्टा से, उन्हें यह आदेश देते हुए कह रहा है कि आप लोगों को बता दें कि: यही उसका रासता, अर्थात उसका मार्ग, तरीक़ा और पद्वति है, और वह इस बात की गवाही देने की दावत है कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं, वह अकेला है उसका कोई साझी नहीं। वह इसके साथ अल्लाह की ओर जानकारी, विश्वास और धार्मिक और विवके के प्रमाण के साथ दावत देता है।'' अंत हुआ।

इस बात को जान लो कि इस्लाम की ओर दावत देना अनिवार्य है। हमारे विद्वानों का कहना है कि : ''हर मुसलमान पुरूष व महिला पर चार मसायल का सीखना और उनपर अमल करना अनिवार्य है :

पहला : ज्ञान, और वह बंदे का अपने रब (पालनहार), अपने संदेष्टा और इस्लाम धर्म का प्रमाण सहित ज्ञान प्राप्त करना है।

दूसरा : उस पर अमल करना, अर्थात इस ज्ञान की अपेक्षा के अनुसार अमल करना।

तीसरा : उसकी ओर दावत देना। अर्थात उसने जो कुछ सीखा है उसकी ओर दावत देना।

चौथा : उसमें पहुँचने वाले कष्ट पर धैर्य करना। अर्थात ज्ञान, अमल और जो कुछ सीखा है उसकी ओर दावत देने के रास्ते में आने वाली कठिनाइयों पर धैर्य से काम लेना।

इन चार मसायल का प्रमाण अल्लाह का यह फरमान है :

﴿وَالْعَصْرِ ، إِنَّ الإِنسَانَ لَفِي خُسْرٍ ، إِلا الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَتَوَاصَوْا بِالْحَقِّ وَتَوَاصَوْا بِالصَّبْرِ ﴾ [سورة العصر]

''क़सम है अस्र की, निःसन्देह इन्सान घाटे में है, सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाए और नेक अमल किए, और उन्हों ने एक दूसरे को हक़ की वसीयत की और एक दूसरे को सब्र की वसीयत की।'' (सूरतुल अस्र)

तो अल्लाह तआला का फरमान (सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाए) पहले मसअला का प्रमाण है; क्योंकि बिना ज्ञान के ईमान नहीं है। तथा अल्लाह का फरमानः (और नेक अमल किए) दूसरे मसअले का प्रमाण है। तथा अल्लाह का फरमानः (और एक दूसरे को हक़ की वसीयत की) तीसरे मसअला की दलील है और वह दावत है। तथा अल्लाह का फरमानः (और एक दूसरे को सब्र की वसीयत की) चौथे मसअला का प्रमाण है।

अतः वह ग़ैर मुस्लिम को इस्लाम धर्म की वह बातें बतायेगा जो उसके मतलब की हैं जैसे कि अल्लाह के लिए समर्पित होना, उसके आदेश को स्वीकारना, उसके नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर ईमान लाना। तथा उसके लिए इस्लाम धर्म की अच्छाइयों को उल्लेख करे। (देखिए प्रश्न संख्या : 219) ताकि वह इस्लाम से संतुष्ट हो जाए और उसे मान ले। जब वह इस्लाम स्वीकार कर ले तो उस समय उसके लिए धीरे-धीरे विस्तार पूर्वक इस्लाम के अहकाम बयान करे। तथा संबोधित व्यक्ति की बुद्धि के स्तर को ध्यान में रखे। उसके सामने ऐसी बातें न बयान करे जो उसके अंदर संदेहों और आशंकाओं को जन्म दें या जानकारी की अधिकता के कारण उसे भटके हुए व्यक्ति की तरह बना दें। बल्कि वह रब्बानी विद्वानों का तरीक़ा अपनाए जिनके बारे में अल्लाह तआला का फरमान है :

﴿ولكن كونوا ربانيين بما كنتم تعلّمون الكتاب وبما كنتم تدرسون ﴾ [آل عمران: 79]

''लेकिन तुम रब्बानी (रब वाले) हो जाओ इस कारण कि तुम किताब की शिक्षा देते थे और इस वजह से कि तुम (स्वयं) पाठ करते थे।'' (सूरत आल इम्रान : 79)

रब्बानियों की व्याख्या में कहा गया है कि : वे लोगों का ज्ञान की बड़ी बातों के द्वारा प्रशिक्षण करने से पहले छोटी बातों के द्वारा प्रशिक्षण करते हैं। (तफसीर बगवी 2/60)

अर्थात सूक्ष्म और बारीक मुद्दों से पहले,  सिद्धांतों और मोटी-मोटी बातों की शिक्षा देते हैं। और अल्लाह तआला ही सीधा मार्ग दर्शाने वाला है।

शैख मुहम्मद बिन सालेह अल-मुनज्जिद
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