13693: गुनाहों को मिटाने वाले कारण


मैं एक विवाहिता मुस्लिम महिला हूँ। मेरा जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ। किन्तु मैं इस्लाम के नियमों और अहकाम के बारे में कुछ अधिक नहीं जानती। मैं बहुत से बड़े-बड़े पाप कर चुकी हूँ जिसके कारण मैं ऐसा महसूस करती हूँ कि गोया मैं इस संसार में सबसे दुष्ट मानव हूँ। अब मैं इस महान धर्म से संबंधित ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास कर रही हूँ। किन्तु मैं अपने हृदय में शांति और उसके आदेशों का पालन करने पर सुकून नहीं महसूस करती हूँ। मैं सदा यह प्रश्न करती हूँ: मैं इस बात को कैसे जान सकती हूँ कि अल्लाह रब्बुल आलमीन ने मुझे क्षमा कर दिया या नहीं ? वे कौन से अच्छे काम हैं जो मैं करूँ कि वे मेरे उन बड़े-बड़े गुनाहों को साफ कर दें जन्हें मैं पहले कर चुकी हूँ ? मैं अपने पालनहार के कैसे क़रीब हो सकती हूँ ? हे अल्लाह ! तू मुझे वह चीज़ दिखा दे जिस से यह पता चले कि तू ने मुझ पर दया किया है।
मैं अच्छी तरह से सो भी नहीं सकती। मुझे किसी चीज़ से सुकून नहीं मिलती और न मैं किसी चीज़ से लुत्फ उठा पाती हूँ। मैं हमेशा ऐसा अनुभव करती हूँ कि मैं किसी भी समय मर जाऊँगी और अल्लाह तआला मुझसे पूछताछ करेगा। मैं उस पवित्र अस्तित्व को कैसे जवाब दूँगी। क्योंकि मेरे पास कुछ भी कहने के लिए नहीं है। मैं अपने अंदर से हमेशा रोती रहती हूँ। हे अल्लाह! मुझे बता दे कि मैं अपने सभी गुनाहों से कैसे मोक्ष प्राप्त करूँ।
मैं आपको इस लिए पत्र लिख रही हूँ क्योंकि मैं आपकी पुस्तक "मैं तौबा करना चाहता हूँ लेकिन" कई बार पढ़ चुकी हूँ। और उसे पढ़ने के बाद मैं कुछ राहत महसूस करती हूँ। जब मैं सूरत ज़ुमर (आयत: 53) में अल्लाह तआला का यह फरमान पढ़ती हूँ कि: "अल्लाह की दया से निराश न हो।" मेरे जीवन में मात्र यही एक आशा है।
क्या आप यह समझते हैं कि अल्लाह मुझे क्षमा कर देगा जबकि मैं वह औरत हूँ जिसने हर पाप किया है ? मैं ने तौबा की नमाज़ पढ़ी है और मैं कोशिश कर रही हूँ कि सभी पहलुओं से अपनी जीवन शैली बदल दूँ। ताकि मेरा परमेश्वर (पालनहार) मुझसे राज़ी हो जाये। मैं यह प्रतिज्ञा करती हूँ कि अपनी बाक़ी (शेष) ज़िंदगी में इस्लाम के आदेशों का पालन करूँगी।

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

सब से पहले:

हर प्रकार की प्रशंसा अल्लाह के लिए है जिसने आपको तौबा की तौफीक़ दी, गुमराही के बाद आपको मार्गदर्शन प्रदान किया, आपके लिए रास्ता को रोशन कर दिया, और आपके निकट ईमान को पसंदीदा बना दिया और उसे आपके दिल में संवार दिया। अतः शुरू और अंत में उसी की प्रशंसा है।

फिर ऐ प्रश्नकर्ता ! आपको तौबा की तौफीक़ शुभ हो। और यह एक नेमत है जिस पर आभार (शुक्र) प्रकट करने की ज़रूरत है। अल्लाह तआला तौबा करने वाले की तौबा को स्वीकार करता है। तथा प्रश्न संख्या (14289) देखिये।

दूसरा:

आपका यह कहना कि "मैं कैसे जान सकती हूँ कि अल्लाह तआला ने मुझे क्षमा कर दिया है या नहीं" तो आपको ज्ञात होना चाहिए कि जो मनुष्य सच्ची तौबा करता है, अल्लाह तआला उसकी तौबा स्वीकार करता है, और अल्लाह तआला बहुत क्षमा करने वाला अतिदयावान है। उसने तौबा करने वाले से वादा किया है कि उसके गुनाहों को क्षमा कर देगा। चुनाँचि फरमाया:

 ﴿ قُلْ يَاعِبَادِي الَّذِينَ أَسْرَفُوا عَلَى أَنْفُسِهِمْ لا تَقْنَطُوا مِنْ رَحْمَةِ اللهِ إِنَّ اللهَ يَغْفِرُ الذُّنُوبَ جَمِيعًا ﴾ [ الزمر :53]

"आप कह दीजिए कि ऐ मेरे बंदो! जिन्हों ने अपनी जानों पर अत्याचार किया है अल्लाह की रहमत से निराश न हो, निःसन्देह अल्लाह तआला सभी गुनाहों को माफ कर देता है।" (सूरत जुमर: 53)

और जब अल्लाह ने वादा किया है तो वह वादे के खि़लाफ नहीं करेगा।

तथा अल्लाह तआला ने फरमाया:

﴿إِلا مَنْ تَابَ وَآمَنَ وَعَمِلَ عَمَلًا صَالِحًا فَأُوْلَئِكَ يُبَدِّلُ اللهٍ سَيِّئَاتِهِمْ حَسَنَاتٍ وَكَانَ اللهُ غَفُورًا رَحِيمًا  وَمَنْ تَابَ وَعَمِلَ صَالِحًا فَإِنَّهُ يَتُوبُ إِلَى اللهِ مَتَابًا ﴾  [الفرقان : 70 -71 ]

"सिवाय उन लोगों के जो तौबा करें और ईमान लायें और नेक कार्य करें, ऐसे लोगों के गुनाहों को अल्लाह तआला नेकियों से बदल देता है, अल्लाह बख्शने वाला दया करने वाला है। और जो व्यक्ति तौबा करे और नेक कार्य करे वह तो (वास्तव में) अल्लाह की तरफ सच्चा पलटने वाला है।" (सूरत फुरक़ान: 70-71)

इस आयत में अल्लाह तआला ने हमारे लिए यह स्पष्ट कर दिया है कि वह तौबा करने वालों के गुनाहों (बुराईयों) को नेकियों में परिवर्तित कर देता है। और यह तौबा की फज़ीलतों (गुणों) में से है।

तीसरा:

आपका यह कहना कि: "मैं अपने गुनाहों से मोक्ष कैसे प्राप्त करूँ ?"

यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है और यह वे कारण हैं जो गुनाहों को मिटा देते हैं। शैख़ुल इस्लाम इब्ने तैमिय्या रहिमहुल्लाह ने फरमाया: "गुनाहों की सज़ा लगभग 10 कारणों के द्वारा समाप्त हो जाती है:

प्रथम: तौबा करना: इस पर मुसलमानों के बीच इत्तिफाक़ (सर्वसहमति) है। अल्लाह तआला का फरमान है:

﴿ قُلْ يَاعِبَادِي الَّذِينَ أَسْرَفُوا عَلَى أَنْفُسِهِمْ لا تَقْنَطُوا مِنْ رَحْمَةِ اللهِ إِنَّ اللهَ يَغْفِرُ الذُّنُوبَ جَمِيعًا ﴾ [ الزمر :53]

"आप कह दीजिए कि ऐ मेरे बंदो! जिन्हों ने अपनी जानों पर अत्याचार किया है अल्लाह की रहमत से निराश न हो, निःसन्देह अल्लाह तआला सभी गुनाहों को माफ कर देता है।" (सूरत जुमर : 53)

तथा फरमाया:

﴿ أَلَمْ يَعْلَمُوا أَنَّ اللهَ هُوَ يَقْبَلُ التَّوْبَةَ عَنْ عِبَادِهِ وَيَأْخُذُ الصَّدَقَاتِ وَأَنَّ اللهَ هُوَ التَّوَّابُ الرَّحِيمُ﴾ (سورة التوبة : 104)

"क्या उनको यह पता नहीं कि अल्लाह ही अपने बंदों की तौबा स्वीकार करता है और वही सदक़ात को क़बूल फरमाता है और यह कि अल्लाह ही बहुत तौबा क़बूल करने वाला और दया करने वाला है।" (सूरतुत्तौबा: 104)

तथा फरमाया:

﴿ وَهُوَ الَّذِي يَقْبَلُ التَّوْبَةَ عَنْ عِبَادِهِ وَيَعْفُو عَنِ السَّيِّئَاتِ وَيَعْلَمُ مَا تَفْعَلُونَ ﴾ [سورة الشورى : 25]

वही (अल्लाह) है जो अपने बंदो की तौबा कबूल फरमाता है और गुनाहों को क्षमा कर देता है और जो कुछ तुम कर रहे हो (सब) जानता है।" (सूरतुश्शूरा: 25)

तथा इसी अर्थ की अन्य आयतें भी हैं।

दूसरा कारण : इस्तिग़फार करना (गुनाहों की माफी मांगना)

अल्लाह तआल से गुनाहों की माफी के लिए याचना करना, जैसाकि सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित है कि आप ने फरमाया:  "जब कोई बंदा कोई पाप करता है तो कहता है कि ऐ मेरे पालनहार! मैं ने पाप किया है। अतः तू मुझे माफ कर दे । तो इस पर अल्लाह तआला कहता है: मेरे बंदे को पता है कि उसका एक रब (पालनहार) है जो गुनाह को क्षमा कर देता और उस पर पकड़ करता है। अतः मैं ने अपने बंदे को क्षमा कर दिया ... (सहीह बुखारी हदीस संख्या: 6953, सहीह मुस्लिम हदीस संख्या: 4953)

तथा सहीह मुस्लिम में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत है कि आपने फरमाया: "यदि तुम गुनाह न करोगे तो अल्लाह तुम्हें खत्म कर देगा और ऐसी क़ौम को लेकर आयेगा जो लोग गुनाह करेंगे। फिर बख्शिश मांगें गे तो उन्हें बख्श दिया जायेगा।" (तौबा / 4936)

तीसरा कारण:

गुनाहों को मिटाने वाली नेकियां, जैसाकि अल्लाह तआला का फरमान है:

﴿ وَأَقِمِ الصَّلاةَ طَرَفَيِ النَّهَارِ وَزُلَفًا مِنَ اللَّيْلِ إِنَّ الْحَسَنَاتِ يُذْهِبْنَ السَّيِّئَاتِ﴾ [هود:114]

"तथा -ऐ पैगंबर- आप दिन के दोनों छोर में (अर्थात सुब्ह व शाम) और रात के कुछ घंटों में नमाज़ स्थापित करें, निःसंदेह अच्छे कर्म बुरे कर्मों को मिटा देते हैं, यह नसीहत (सदुपदेश) है नसीहत पकड़ने वालों के लिए।" (सूरत हूद : 114)

तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: "पाँच समय की नमाज़ें, एक जुमा से दूसरा जुमा और एक रमज़ान से दूसरा रमज़ान, उनके बीच होने वाले गुनाहों के लिए कफ्फारा हैं यदि बड़े गुनाहों से बचा जाये।" (सहीह मुस्लिम हदीस संख्या : 344)

तथा फरमाया: "जिस व्यक्ति ने ईमान के साथ और अज्र व सवाब की नीयत से रमज़ान का रोज़ा रखा उसके पिछले पाप क्षमा कर दिए जायेंगे।" (सहीह बुखारी हदीस संख्या: 37, सहीह मुस्लिम हदीस संख्या: 1268)

तथा फरमाया: "जिस व्यक्ति ने ईमान के साथ और अज्र व सवाब की आशा रखते हुए लैलतुल क़द्र को क़ियाम किया (अर्थात् अल्लाह की इबादत में बिताया) तो उसके पिछले गुनाह क्षमा कर दिए जायेंगे।" (सहीह बुखारी हदीस संख्या: 1768)

तथा फरमाया: "जिस व्यक्ति ने इस घर का हज्ज किया और (उसके दौरान) संभोग (और कामुक वार्तालाप) तथा गुनाह और नाफरमानी (पाप एंव अवज्ञा) नहीं किया तो वह उस दिन के समान अपने गुनाहों से पवित्र होकर लौटता है जिस दिन उसकी माँ ने उसे जना था।" (सहीह बुखारी हदीस संख्या: 1690)

तथा फरमाया: "आदमी के अपने परिवार, धन और संतान के बारे में फित्ने (अर्थात् परीक्षा व आज़माइश) के लिए, नमाज़, रोज़ा, सद़क़ा, भलाई का आदेश करना और बुराई से रोकना कफ्फारा (परायश्चित) बन जाते हैं।" (सहीह बुखारी हदीस संख्या: 494, सहीह मुस्लिम हदीस संख्या: 5150)

(उपर्युक्त लोगों के फित्ने से अभिप्राय उनसे अति महब्बत करना, उनके कारण भलाई और नेकी के कामों से गाफिल हो जाना, उनके अनिवार्य हुक़ूक़ की अदायगी में लापरवाही करना इत्यादि है।)

"जिस आदमी ने किसी मुसलमान गर्दन (गुलाम) को आज़ाद कर दिया तो अल्लाह तआला उसके हर अंग के बदले उसके एक अंग को जहन्नम से मुक्त कर देगा यहाँ तक कि उसकी शरमगाह के बदले उसकी शरमगाह को आज़ाद कर देगा।" (सहीह मुस्लिम हदीस संख्या: 2777)

ये और इनके समान अन्य हदीसें, सहीह अहादीस की पुस्तकों में वर्णित हैं।

तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: "सद्क़ा, गुनाह को ऐसे ही मिटा देती है जिस तरह कि पानी आग को बुझा देती है। तथा हसद (द्वेष, डाह) नेकियों को ऐसे ही खा जाता है जिस तरह कि आग लकड़ी को खा जाती है।"

चौथा कारण:

सज़ा को दूर करने वाला चौथा कारण: मोमिनों का किसी मोमिन के लिए दुआ करना है, उदाहरण के तौर पर उनका उसके जनाज़ा की नमाज़ पढ़ना। चुनाँचि आइशा और अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है, वे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत करते हैं कि आप ने फरमाया: "जिस मैयित (मृतक) पर मुसलमानों का एक समूह नमाज़ (जनाज़ा) पढ़ता है जिनकी संख्या सौ तक पहुँचती है वे सब के सब सिफारिश करते हैं, तो उसके बारे में उनकी शफाअत स्वीकार की जायेगी।" (सहीह मुस्लिम हदीस संख्या: 1576)

इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है, वह कहते हैं: मैं ने अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को फरमाते हुए सुना: "जो भी मुसलमान व्यक्ति मर जाता है, फिर उसकी जनाज़ा पर चालीस ऐसे लोग खड़े होते हैं जो अल्लाह के साथ शिर्क नहीं करते, तो अल्लाह तआला उसके बारे में उनकी शफाअत (सिफारिश) को स्वीकार करेगा।" (सहीह मुस्लिम हदीस संख्या: 1577)

यह उसके लिए मरने के बाद दुआ करना है।

पाँचवां कारण:

मैयित (मृतक) के लिए जो नेकी के कार्य जैसे कि सदक़ा इत्यादि किए जाते हैं, तो स्पष्ट और शुद्ध हदीस तथा अइम्मा किराम की सहमति के साथ वह मैयित इस से लाभ उठाता है। इसी प्रकार मैयित की तरफ से गुलाम आज़ाद करना और हज्ज करना भी है। बल्कि सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम में प्रमाणित है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: "जो व्यक्ति मर गया और उसके ऊपर रोज़ा अनिवार्य है तो उसका वली (उत्तराधिकारी) उसकी ओर से रोज़ा रखे।" इसे बुखारी (हदीस संख्या: 5210) और मुस्लिम (हदीस संख्या: 4670) ने रिवायत किया है।

छठा कारण:

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके अलावा का क़ियामत के दिन पापियों के बारे में शफाअत (अनुशंसा) करना, जैसाकि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से तवातुर (निरंतरता) के साथ शफाअत की हदीसें वर्णित हैं। उदाहरण के तौर पर सहीह हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है: "मेरी उम्मत के कबीरा गुनाह करने वालों के लिए मेरी शफाअत।" (इसे अल्बानी ने सहीह अबू दाऊद हदीस संख्या: 3965 के अंतर्गत सहीह कहा है)

तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है: "मुझे शफाअत और मेरी उम्मत के आधे लोगों के स्वर्ग में प्रवेश करने के बीच चयन करने का विकल्प दिया गया, तो मैं ने शफाअत का चयन किया . . ." (देखिये: सहीहहुल जामिअ् : 3335)

सातवाँ कारण:

मुसीबतें और परेशानियाँ जिनके द्वारा अल्लाह तआला दुनिया में गुनाहों को मिटा देता है, जैसाकि सहीह बुखारी व सहीह मुस्लिम में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित है कि आप ने फरमाया: "मुसलमान को जो भी कष्ट, थकावट, शोक, पीड़ा और परेशानी पहुँचती है यहाँ तक कि उसे काँटा चुभ जाता है, तो अल्लाह तआला उनके कारण उसके गुनाहों को मिटा देता है।" (सहीह बुखारी हदीस संख्या: 5210, सहीह मुस्लिम हदीस संख्या: 4670)

आठवाँ कारण:

क़ब्र में होने वाली परीक्षा, दबाव, भयभीत किया जाना, इनके द्वारा गुनाहों को मिटा दिया जाता है।

नवाँ कारण:

क़ियामत के दिन की घबराहटें, कष्ट और कठिनाईयाँ।

दसवाँ कारण:

बंदों की तरफ से बिना किसी कारण के, मात्र अल्लाह की दया, करूणा, क्षमा और बख़्शिश। देखिये: "मजमूओ फतावा इब्ने तैमिय्या" (7/487 - 501)

चौथा:

आपका यह कहना कि "क्या आप यह समझते हैं कि अल्लाह तआला मुझे बख्श देगा ?!! . . ."

जी हाँ, यदि आप ने सच्ची तौबा की है। क्योंकि अल्लाह तआला ने तौबा करने वाले के लिए तौबा स्वीकार करने का वादा किया है। इस बात का प्रमाण पीछे गुज़र चुका है। इसलिए, ऐ बहन! आप अल्लाह की रहमत से निराश न हों, और उस आदमी की कहानी याद करें जिसने सौ क़त्ल किया था, फिर उसने तौबा किया, तो अल्लाह तआला ने उसकी तौबा को स्वीकार कर लिया। आपके लिए वह कहानी उल्लेख की जा रही है: इमाम मुस्लिम ने अपनी "सहीह" के अंदर किताबुत्तौबा (हदीस संख्या: 2766) में रिवायत किया है: "अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: "तुम से पहले लोगों में एक आदमी था जिसने 99 लोगों को क़त्ल किया था। उसने धरती पर सबसे अधिक जानकार आदमी के बारे में पूछा, तो उसे एक राहिब (इबादत गुज़ार) की ओर मार्गदर्शन किया गया। चुनाँचि वह उसके पास आया और कहा कि वह 99 लोगों को क़त्ल कर चुका है, तो क्या उसके लिए तौबा की कोई गुंजाइश है ? उसने कहा: नहीं। चुनाँचि उसने उसे भी क़त्ल करके 100 की संख्या पूरी कर दी। फिर उसने धरती पर सबसे बड़े जानकार के बारे में पूछा, तो उसे एक विद्वान (ज्ञानी) का पता बताया गया। उसने उसके पास जाकर कहा कि उसने 100 लोगों की हत्या की है, तो क्या अब उसके लिए तौबा की कोई सूरत बाक़ी है ? उस विद्वान (आलिम) ने कहा: हाँ, उसके और उसकी तौबा के बीच कौन सी चीज़ रूकावट है ? तुम फलाँ धरती में चले जाओ। क्योंकि वहाँ ऐसे लोग हैं जो अल्लाह की इबादत करते हैं। अतः तुम उनके साथ अल्लाह की इबादत करो और अपनी धरती की तरफ वापस न लौटना। क्योंकि वह एक बुरी धरती (स्थान) है। चुनाँचि वह चल पड़ा यहाँ तक कि जब वह आधे रास्ते में पहुँचा तो उसकी मृत्यु आगई। तो रहमत के फरिश्ते और अज़ाब के फरिश्ते उसके बारे में झगड़ पड़े। रहमत के फरिश्तों ने कहा: वह तौबा करके अपने दिल के साथ अल्लाह की ओर मुतवज्जेह होकर आया था। तथा अज़ाब के फरिश्तों ने कहा कि इसने कभी कोई भलाई (नेकी) नहीं की। इसी दौरान उनके पास मानव के रूप में एक फरिश्ता आया तो उन्हों ने उसे अपने बीच निर्णायक बना लिया। उसने कहा: दोनों ज़मीनों के बीच माप करो और वह दोनों में से जिस धरती के अधिक क़रीब हो वह उसी के लिए है। चुनाँचि उन्हों ने उसका माप किया तो उसे उस धरती के अधिक क़रीब पाया जिसकी ओर वह जा रहा था। तो रहमत के फरिश्तों ने उसकी जान क़ब्ज़ कर ली।

इस हदीस से कई फायदे निकलते हैं:

1.      अल्लाह तआला तौबा करने वाले के सभी गुनाहों को क्षमा कर देता है, चाहे वे कितने भी अधिक हों। इसका प्रमाण अल्लाह तआला का फरमान है:

﴿ قُلْ يَاعِبَادِي الَّذِينَ أَسْرَفُوا عَلَى أَنْفُسِهِمْ لا تَقْنَطُوا مِنْ رَحْمَةِ اللهِ إِنَّ اللهَ يَغْفِرُ الذُّنُوبَ جَمِيعًا إِنَّهُ هُوَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ ﴾ [ الزمر :53]

"आप कह दीजिए कि ऐ मेरे बंदो! जिन्हों ने अपनी जानों पर अत्याचार किया है अल्लाह की रहमत से निराश न हो, निःसन्देह अल्लाह तआला सभी गुनाहों को माफ कर देता है।" (सूरतुज़्ज़ुमर: 53)

2.      तौबा करने वाले के लिए ज़रूरी है कि वह उन बुरे साथियों से दूर रहे जो उसके साथ गुनाह पर थे और उसे चाहिए कि वह अच्छे लोगों की संगत अपनाये जो भलाई पर उसकी मदद करें और उसकी तरफ उसका मार्गदर्शन करें।

3.      मुसलमान को चाहिए कि वह अपने जीवन में भय और आशा के बीच जीवन बिताये। वह अपने गुनाहों से डरता और उनके प्रति भय महसूस करता रहे और अल्लाह की चाल से निश्चिंत न रहे और अपने लिए जन्नत में दाखिल होने को क़तई न समझे। क्योंकि सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम का उनकी परहेज़गारी और पवित्रता के बावजूद यह हाल नहीं था। बल्कि वे अपने रब (पालनहार) से डरते थे और चाहत और भय, लालच और डर के साथ इबादत करते थे। अतः जब मुसलमान नेकियाँ करता है, तौबा करता और अल्लाह तआला की दया की आशा रखता है, और जानता है कि अल्लाह तआला तौबा करने वाले को क्षमा कर देता है और उसकी तौबा को स्वीकार करता है, तो उसे यह उम्मीद रखना चाहिए कि अल्लाह तआला उसे वख्श देगा। तथा उसे इस बात से अवगत होना चाहिए कि अल्लाह तआला अपने बंदों से नेक अमल को क़बूल करता और उन से यह पसंद करता है। अतः उसे क़बूलियत की आशा रखते हुए नेक अमल के लिए भरपूर संघर्ष और प्रयास करना चाहिए। जब वह इस हालत में जीवन यापन करेगा: अपने गुनाहों से डरते हुए, अपने पालनहार की रहमत की आशा रखते हुए, तो वह नेकी के अंदर भरपूर संघर्ष करने वाला, गुनाहों से दूर रहने वाला हो जायेगा, अल्लाह तआला से यह प्रश्न करेगा कि उसे नेकियों पर सुदृढ़ रखे यहाँ तक कि वह अल्लाह से इस हाल में मिले कि वह उस से प्रसन्न हो। तथा अल्लाह तआला से इस बात से पनाह मांगेगा कि उसके दिल को पलट दे या उसके दिल को बदल दे। जैसाकि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दुआ किया करते थे: "ऐ दिलों को बदलने वाले मेरे दिल को अपने दीन पर जमा दे।"

हम अल्लाह तआला से प्रश्न करते हैं कि वह हमें और आपको अपने धर्म पर साबित रखे और अपनी अतिरिक्त अनुकम्पा प्रदान करे। वह सुनने वाला और क़बूल करने वाला है।

शैख मुहम्मद बिन सालेह अल मुनज्जिद
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