Thu 24 Jm2 1435 - 24 April 2014
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मोज़े का चमड़े का होना शर्त नहीं है

जिस मोज़े पर मसह किया जाता है उसे किस तरह का होना चाहिए ? क्या किसी भी तरह के मोज़े पर मसह करना जाइज़ (धर्मसंगत) है, या उसे चमड़े का होना अनिवार्य है ? आशा है कि आप क़ुरआन व हदीस की रोशनी में उत्तर देंगे।

हर प्रकार की स्तुति और प्रशंसा केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

मुग़ीरा बिन शो'बा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्हों ने कहा: "नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने वुज़ू किया और मोज़े और जूते पर मसह किया।" इसे तिर्मिज़ी (हदीस संख्या : 92) ने रिवायत किया है, और अल्बानी ने "सहीह सुनन तिर्मिज़ी" हदीस संख्या (86) के तहत सहीह कहा है।

"अल-क़ामूस" (नामक शब्दकोश) के लेखक ने कहा : जुर्राब: पैर के लिफाफा को कहते हैं।

अबू बक्र इब्नुल अरबी ने कहा : जुर्राब ऊन से बने हुए पैर के ढक्कन को कहते हैं जो (पैर को) गरम रखने के लिए तैयार किया जाता है।

तथा यह्या बिन बक्का से वर्णित है कि उन्हों ने कहा : मैं ने इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा को कहते हुए सुना : जुर्राबों पर मसह करना चमड़े के मोज़ों पर मसह करने के समान ही है।

इब्ने अबी शैबा की पुस्तक "अल-मुसन्नफ" (1/173)

इब्ने हज़्म कहते हैं : जो भी पैरों में पहना जाता है -जिनका पहना जाइज़ है जो दोनों टखनों से ऊपर तक हों- उन पर मसह करना सुन्नत है, चाहे वे चमड़े या लबूद या लकड़ी या हलफा (एक घास का नाम है) के मोज़े हों अथवा सन या ऊन या कपास (सूती) या रोआं या बाल -उन पर त्वचा हो या न हो- के जुर्राब हों, या मोज़ों के ऊपर मोज़े या जुर्राबों के ऊपर जुर्राब हों . . . . "अल-मुहल्ला" (1/321)

मोज़ों पर मसह करने के जाइज़ होने के बारे में कुछ विद्वानों ने मतभेद किया है, किंतु शुद्ध बात जो दलीलों से प्रमाणित होती है जैसाकि पीछ गुज़र चुका वह उसकी वैधता है। और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।

तथा प्रश्न संख्या (8186) और (9640) का उत्तर भी देखें।

इस्लाम प्रश्न और उत्तर

शैख मुहम्मद सालेह अल-मुनज्जिद
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