Thu 17 Jm2 1435 - 17 April 2014
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किसी भी ईश्दूत (संदेष्टा) को गाली देना कुफ्र और स्वधर्म त्याग है

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यदि किसी मुसलमान ने हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बुराई और गाली गलूज पर आधारित काफिरों द्वारा प्रकाशित किए हुए प्रकाशनों को पढ़ा तो उसे इस से गुस्सा आ गया, और उसकी प्रतिक्रिया में - ईसाईयों को गुस्सा दिलाने के लिए - उसने हमारे सरदार मूसा अलैहिस्सलाम के बारे में कुछ अनुप्युक्त बातें कह दीं, तो इसका क्या हुक्म है, और वह कैसे तौबा करे, और क्या उसके ऊपर कोई प्रायश्चित अनिवार्य है ॽ

हर प्रकार की प्रशंसा और स्तुति केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

मुसलमान का अक़ीदा केवल उसके ऊपर सभी संदेष्टाओं पर ईमान लाना ही नहीं अनिवार्य करता है, बल्कि उसके ऊपर उनका इस प्रकार आदर वह सम्मान करना अनिवार्य है जो उनकी महिमा के योग्य है, क्योंकि वे सर्वश्रेष्ठ मानव, अल्लाह के उसकी सृष्टि में से चयनित लोग हैं, तथा वे मार्गदर्शन के प्रकाश हैं जिस ने धरती को उसके अंधकार से निकाल कर जगमगा दिया, और दिलों को उनके वीराने व घृणा से निकाल कर प्यार व लगाव पैदा कर दिया, सौभाग्य व खुशी और सफलता का कोई रास्ता नहीं है मगर उन्हीं के द्वारा और उन्हीं के कारण।

इसीलिए सभी विद्वानों ने ईश्दूतों (पैगंबरों) को गाली देने और उनका उपहास करने के निषेद्ध पर सर्वसहमति व्यक्त ही है, और यह कि जो भी व्यकित इस महान मामले में पड़ गया तो वह इस्लाम धर्म से पलट गया (निष्कासित हो गया), जिस तरह कि जिस व्यक्ति ने हमारे ईश्दूत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को गाली दिया वह इस्लाम धर्म से मुर्तद (निष्कासित) हो गया। अतः मुसलमान अल्लाह के ईश्दूतों और संदेष्टाओं के बीच अंतर नहीं करता है, जैसाकि अल्लाह सर्वशक्तिमान का फरमान है :

﴿ قُلْ آمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنْزِلَ عَلَيْنَا وَمَا أُنْزِلَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ وَالْأَسْبَاطِ وَمَا أُوتِيَ مُوسَى وَعِيسَى وَالنَّبِيُّونَ مِنْ رَبِّهِمْ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍ مِنْهُمْ وَنَحْنُ لَهُ مُسْلِمُونَ ﴾ [آل عمران : 84].

“आप कह दीजिए कि हम अल्लाह पर और जो कुछ हम पर उतारा गया है और इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) और इसमाईल (अलैहिस्सलाम) और याक़ूब (अलैहिस्सलाम) और उनकी संतान पर उतारा गया, और जो कुछ मूसा (अलैहिस्सलाम) और ईसा (अलैहिस्सलाम) और दूसरे नबियों को उनके पालनहार की ओर से दिया गया, उन सब पर ईमान लाए। हम उन में से किसी के बीच अंतर नहीं करते और हम उसी के आज्ञाकारी है।” (सूरत आल इम्रान : 84).

तथा अल्लाह तआला ने हमें हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का आदर व सम्मान करने का आदेश दिया है, तो यही आदेश सभी ईश्दूतों और पैगंबरों के लिए (भी) है, अल्लाह सर्वशक्तिमान फरमाता है :

﴿ إِنَّا أَرْسَلْنَاكَ شَاهِدًا وَمُبَشِّرًا وَنَذِيرًا  لِتُؤْمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَتُعَزِّرُوهُ وَتُوَقِّرُوهُ وَتُسَبِّحُوهُ بُكْرَةً وَأَصِيلًا ﴾ [الفتح :8-9]

“निःसन्देह हम ने आप को गवाही देने वाला और शुभ सूचना देने वाला तथा डराने वाला बनाकर भेजा है। ताकि (हे मुसलमानो!) तुम अल्लाह और उसके पैगंबर पर ईामन लाओ और उसकी मदद करो, और उसका आदर करो, और अल्लाह की पवित्रता को सुबह शाम बयान करो।” (सूरतुल फत्ह : 8-9)

यहाँ हम किसी भी नबी (ईश्दूत) की बुराई या निंदा करने वाले को काफिर (नास्तिक) ठहराने के बारे में विद्वानों के कथनों का उल्लेख कर रहे हैं :

इब्ने नुजैम हनफी रहिमहुल्लाह कहते हैं:

“वह किसी भी नबी की कुछ भी बुराई करने से काफिर हो जायेगा।”

“अल-बह्र अर-राइक़” (5/130)

तथा क़ाज़ी अयाज़ रहिमहुल्लाह ने फरमाया :

“जिस ने उनका - अर्थात हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का - या किसी भी पैगंबर का अपमान किया, या उन्हें दोषी ठहराया, या उन्हें कष्ट पहुँचाया, या किसी नबी की हत्या कर दी या उन से लड़ाई किया : तो वह सर्वसहमति के साथ काफिर है।” “अश-शिफा बि-तारीफि हुक़ूक़िल-मुस्तफा” (2/284) से समाप्त हुआ।

तथा दरदीर मालिकी फरमाते हैं :

“जिसने किसी नबी को जिसके नबी होने पर सर्वसमति है, गाली दिया, या किसी नबी को व्यंगात्मक रूप से गाली दिया तो उसने कुफ्र किया।” “हाशियतुद्दसूक़ी अला शरहिल कबीर” (4/309) से समाप्त हुआ।

तथा शरबीनी रहिमहुल्लाह ने फरमाया :

“जिस व्यक्ति ने किसी पैगंबर या नबी को झुठलाया, या उसे गाली दी, या उसका या उसके नाम का अपमान किया . . . तो वह काफिर हो गया।” “मुगनिल मुहताज” (5/429) से अंत हुआ।

तथा शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिय्या रहिमहुल्लाह ने फरमाया :

“नबियों (पैगंबरों, ईश्दूतों) की विशेषताओं में से है कि जिसने किसी नबी को गाली दिया तो इमामों की सर्वसहमति के साथ उसे क़त्ल कर दिया जायेगा और वह मुर्तद्द (स्वधर्म त्यागी) है, जिस तरह कि जिसने नबी का और जो वह लेकर आए हैं उसका इनकार किया तो वह मुर्तद्द (स्वधर्म त्यागी) हो जाता है, क्योंकि ईमान (विश्वास) अल्लाह तआला, उसके फरश्तिों, उसकी किताबों और उसके पैगंबरों पर ईमान लाये बिना संपूर्ण नहीं होता है।”  “अस-सफदीयह” (1/262) से समाप्त हुआ।

अतः जो व्यक्ति इस महान पाप में पड़ गया उसे चाहिए कि सच्ची तौबा, शहादतैन (ला-इलाहा इल्लल्लाह और मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह की गवाही) के इक़रार (उच्चारण) और सभी ईश्दूतों का सम्मान करके इस्लाम की ओर पुनः लौटने में जल्दी करे। फिर इस बात पर संपूर्ण विश्वास होना चाहिए कि हम ईश्दूतों और संदेष्टाओं के उन सभी समुदायों के अपेक्षाकृत अधिक योग्य हैं जो उनकी ओर संबंध रखती हैं, और यह कि हमारे ऊपर अनिवार्य है कि हम सभी ईश्दूतों का यदि कोई उन्हें गाली देता या कष्ट पहुँचाता है तो रक्षा और बचाव करें, हमारे ईश्दूत नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का बचाव और रक्षा सभी ईश्दूतों के सम्मान, सभी लोगों पर उनकी प्रतिष्ठा के प्रदर्शन और उनके ईश्दूतत्व के एक दूसरे से संबंध को स्पष्ट करने द्वारा होगी, और वे लोग ऐसे ही थे जैसाकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फरमाया है :  

“मेरा और मुझ से पहले के पैग़म्बरों का उदाहरण उस व्यक्ति के समान है जिसने एक घर बनाया, उसे संवारा और सजाया किन्तु उसके एक कोने में केवल एक ईंट की जगह ऐसे ही छोड़ दिया। लोग उसकी परिक्रमा करने लगे और उस पर आश्चर्य प्रकट करने लगे और कहने लगेः यह एक ईंट क्यों नहीं रखी गई, पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः “तो मैं ही वह ईंट हूँ और मैं सारे नबियों का समाप्त कर्ता हूँ।” (सहीह बुखारी व सहीह मुस्लिम)

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।

इस्लाम प्रश्न और उत्तर
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