Mon 21 Jm2 1435 - 21 April 2014
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उसका पति घर के खर्च में उसे अपनी मदद करने से रोकता है

यद्यपि मैं ने अपनी शिक्षा पूरी नहीं की है किंतु अल्लाह की कृपा से मुझे घर बैठकर अनुवाद करने का काम मिल गया है, सर्व प्रशंसा अल्लाह के लिए है कि मैं एक र्प्याप्त धन कमाती हूँ। मेरा प्रश्न इसी धन से संबंधित है। क्या मेरे पति को इस धन में नियंत्रण करने का अधिकार है ॽ मामला यह नहीं है कि वह मुझसे उस माल को लेते हैं, बल्कि वह इस बात से इनकार करते हैं कि मैं कुछ चीज़ों के खरीदने में उनकी मदद करूँ, वह इस बात पर अटल हैं कि समस्त चीज़ें वह अपने निजी पैसे से ही खरीदेंगे, भले ही वह मेरी निजी ज़रूरत की चीज़ हो, वह कहते हैं: बेहतर यह है कि मैं उस चीज़ के अंदर अपना पैसा खर्च न करूँ जिसे वह स्वयं खरीद सकते हैं, मुझे नहीं मालूम कि मैं इस पैसे को क्या करूँ, वह घर के किराये में भी मदद करने से मुझे रोकते हैं, यह बात सही है कि ज़रूरत की चीज़ें खरीदना मर्द के कर्तव्यों में से है, किंतु इस में कौन सी रूकावट है कि पत्नी अपने पति की मदद करे यदि वह आर्थिक रूप से सक्षम है, मैं उसके कुछ बोझ को उठाना चाहती हूँ पर वह इसकी अनुमति नहीं देते हैं। मैं इस पैसे के प्रति आश्चर्य में हूँ कि इसे कैसे खर्च करूँ, कुछ पैसा दान कर दूँ, किंतु शेष पैसे का क्या करूँ ॽ मैं ने उनकी जानकारी के बिना उनकी मदद करने की एक विधि सोची है परंतु पहले मैं उसके बारे में शरीअत के प्रावधान को जानना चाहती हूँ। क्या इस बात की अनुमति है कि मैं उनके बचत खाते में उनकी जानकारी के बिन कुछ पैसा दान के रूप में डाल दूँ ॽ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

हम आप को - ऐ  हमारी प्रश्नकर्ता बहन - इस प्रतिष्ठावान, शिष्ट और उदार पति की बधाई देते हैं, क्योंकि उसके समान बहुत कम ही लोग ऐसे हैं जो अपनी पत्नियों के निजी धन से दूर रहते हैं और उस से बचने और उसे हाथ न लगाने पर अटल रहते हैं, ताकि उनके अधिकारों को हड़प न करें और संदेह या शंका में न पड़ें, और यह भलाई के साथ रहन सहन में से है जिसका अल्लाह सर्वशक्तिमान ने आदेश दिया है, अल्लाह सुब्हानहु व तआला ने फरमाया:

﴿ وَعَاشِرُوهُنَّ بِالْمَعْرُوفِ﴾  [النساء: 19]

“और उनके साथ भलाई के साथ रहन सहन करो।” (सूरतुन्निसा : 19)

तथा हकीम बिन मुआविया अल क़ुशैरी से वर्णित है उन्हों ने अपने बाप से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा:

“मैं ने कहा: ऐ अल्लाह के पैगंबर! हमारी बीवी का हमारे ऊपर क्या हक़ है ॽ आप ने फरमाया : जब तुम खाओ तो उसे खिलाओ, जब तुम पहनो या कमाई करो तो उसे पहनाओ, और चेहरे पर न मारो, और उसे बदसूरत (कुरूप) न कहो, और घर के अलावा कहीं न छोड़ों।” इसे अबू दाऊद ने सुनन (हदीस संख्या : 2142) में रिवायत किया है। “कुरूप न कहो” का अर्थ यह है कि “क़ब्बहिकल्लाह” (अल्लाह तआला तुझे विरूपित करे) न कहो।

शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह फरमाते हैं :

“इस का अर्थ यह है कि : उसे छोड़कर केवल स्वयं ही कपड़ा न पहनो, और उसे छोड़कर केवल स्वयं ही खाना न खाओ, बल्कि वह तुम्हारी साझी है, तुम्हारे ऊपर अनिवार्य है कि उसके ऊपर भी उसी तरह खर्च करो जिस तरह तुम अपने ऊपर खर्च करते हो।” किताब “रियाज़ुस्सालिहीन की व्याख्या” (3/131) से समाप्त हुआ।

अतः आप का पति आप के ऊपर संपूर्ण रूप से खर्च करने में अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदेश का पालन कर रहा है, बल्कि वह इस एहसान (उपकार) पर वृद्धि करते हुए एक और एहसान कर रहा है कि वह कमालियात (पूरक चीज़ों) पर भी अपने निजी पैसे से खर्च कर रहा है, और आप की तरफ से प्रत्येक आर्थिक सहायता को अस्वीकार कर देता है।

इसलिए हम आप को यह सलाह देते हैं कि आप उस के एहसान का बदला एहसान से दें, और विभिन्न तरीक़ों से उसकी आथिर्क सहायता करने से न उकतायें, चाहे अपने पैसे को उसकी जानकारी के बिना उस के खाते में स्थानांतरण करने के द्वारा ही क्यों न हो, उसे इस की जानकारी होना शर्त नहीं है, या जिस चीज़ की आपके पति या आप के घर को ज़रूरत है उसे उस के जानने से पूर्व ही खरीद करके, या उस के लिए मूल्यवान उपहार खरीद कर, विशेष रूप से वे चीज़ें जो उस के लिए महत्वपूर्ण हैं, या ज़रूरत और तंगी के समय उसे देने के लिए पैसे की बचत करके, तथा इस के अलावा खर्च करने के अन्य लाभदायक और उपयोगी रूप और तरीक़े।

फिर जितना हो सके उस की मदद करने, और यथा शक्ति आप दोनो के बीच संयुक्त खाते में पैसा डालने और दान करने के बाद आप के पास जो पैसा बवता है, उसे आप एक निजी खाते में सुरक्षित कर सकती हैं, हो सकता है आप दोनों को ही इस की आवश्यकता पड़े, या इस से अपने बच्चों को लाभ पहुँचायें।

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।
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