Wed 16 Jm2 1435 - 16 April 2014
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क्या पत्नी के माल में पति को तसर्रुफ करने का अधिकार है ?

मेरी एक दोस्त है जिसके पति ने एक दूसरी औरत से शादी कर ली है, नयी पत्नी के पास उसके पिछले पति से एक बेटा है, जबकि मेरी इस दोस्त के उसके वर्तमान पति से दो बच्चे हैं, मेरी यह दोस्त बुनियादी खर्च चलाने के लिए प्रति महीने सरकार से एक धन राशि प्राप्त करती है, तथा दूसरी पत्नी भी सरकार से पैसा पाती है, अब समस्या यह है कि पति पहली पत्नी से यह मांग कर रहा है कि वह इस धन राशि को उसके नाम पर ट्रांस्फर कर दे ताकि वह स्वयं प्रति महीने उसे प्राप्त करे, और उसका तर्क यह है कि इस्लाम औरत को इस बात की अनुमति नहीं देता है कि वह सीधे सकार से धनराशि प्राप्त करे, जबकि वह दूसरी पत्नी से इस तरह का अनुरोध नहीं करता है, और जब पहली पत्नी ने उससे पूछा कि वह यही मांग या अनुरोध दूसरी पत्नी से क्यों नहीं करता है तो उसने कहा कि : वह उससे शादी करने से पूर्व ही इस राशि को प्राप्त कर रही थी, इसलिए उसके लिए उससे मांग करने का अधिकार नहीं है, तो इस बारे में इस्लामी शरीअत का दृष्टिकोण क्या है ?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

मूलतः पत्नी के पास जो कुछ धनराशि है वह उसी की है उसके पती की नहीं है, चाहे वह धन उसके किसी व्यापार से हो, या विरासत का हो या उसकी मह्र का हो या सरकार की तरफ से हो : इन सबसे उसके अंदर पति का कोई हिस्सा नहीं बनता है, बल्कि वह उसी की संपत्ति है, उसमें से पति के लिए कुछ भी हलाल नहीं है सिवाय इसके कि वह अपनी खुशी उसे प्रदान कर दे। यदि ऐसी बात होती कि पति अपनी पत्नी के धन का मालिक होता है, तो पत्नी की मीरास उसकी मृत्यु के बाद सारी की सारी उसके पति की हो जाती, उसमें उसका कोई और भागीदार न होता, हालांकि अल्लाह सर्वशक्तिमान की पवित्र शरीअत में इसका कोई अस्तित्व नहीं है।

इस आधार पर, वह धनराशि जो पत्नी के पास राज्य की ओर से सहायता के तौर पर आती है, वह उसकी निजी संपत्ति है, और पति के लिए उस पर अधिकार जमाना जायज़ नहीं है। जहाँ तक उसके यह कहने का संबंध है कि इस्लाम औरत को इस बात की अनुमति नहीं देता है कि वह सीधे सरकार से धन वसूल करे, तो इस्लामी शरीअत में इस बात का कोई आधार नहीं है, इस विषय में पुरूष और महिला दोनों समान हैं।

पति के लिए अपनी पत्नी के माल से लेना जायज़ नहीं सिवाय इसके कि वह अपनी सहमति से उसे जो प्रदान कर दे।

अल्लाह तआला ने फरमाया :

 ﴿ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لا تَأْكُلُوا أَمْوَالَكُمْ بَيْنَكُمْ بِالْبَاطِلِ إِلَّا أَنْ تَكُونَ تِجَارَةً عَنْ تَرَاضٍ مِنْكُمْ ﴾ [النساء : 29]

‘‘ऐ ईमान वालो ! तुम अपने धन को अपने बीच अवैध तरीक़े से न खाओ, सिवाय इसके कि वह तुम्हारी परस्पर सहमति से कोई व्यापार हो।’’ (सूरतुन्निसा : 29).

तथा अल्लाह तआला का फरमान है:

 ﴿ وَآتُوا النِّسَاءَ صَدُقَاتِهِنَّ نِحْلَةً فَإِنْ طِبْنَ لَكُمْ عَنْ شَيْءٍ مِنْهُ نَفْساً فَكُلُوهُ هَنِيئاً مَرِيئاً ﴾ [النساء : 4]

 ‘‘और तुम महिलाओं को उनके मह्र प्रसन्नता से भुगतान कर दो, यदि वे अपनी खुशी उस में से कुछ छोड़ दे तो उसे चाव से खाओ।’’ (सूरतुन्निसा : 4).

तथा प्रश्न संख्या (3054) के उत्तर में किताब व सुन्नत और विद्वानों की सर्वसहमति के प्रमाणों द्वारा यह उल्लेख किया जा चुका है कि पति का अपनी पत्नी पर खर्च करना अनिवार्य है, और यह कि ये खर्च करना उसकी अपनी क्षमता और शक्ति के अनुसार होगा, तथा पति के लिए यह जायज़ नहीं है कि वह पत्नी को उसकी सहमति के बिना अपना खर्च उठाने के लिए बाध्य करे भले ही वह मालदार हो। तथा आप पत्नी के वेतन के मुद्दे के बारे में प्रश्न संख्या (126316) का उत्तर देखें।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

इस्लाम प्रश्न और उत्तर
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