Wed 23 Jm2 1435 - 23 April 2014
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रमज़ान के दिन में अपनी पत्नी से संभोग करने वाले का कफ्फारा (प्रायश्चित)

मैं ने रमज़ान के दिन में अपनी पत्नी से कई बार संभोग कर लिया, जिस पर मैं बहुत अधिक शर्मिंदा हूँ। और मुझे पता चला है कि रमज़ान के दिन में संभोग करने का कफ्फारा एक गुलाम (दास/दासी) आज़ाद करना है, और मेरे पास गर्दन मुक्त करने के लिए कुछ नहीं है, और काम के कारण मेरे लिए लगातार दो महीने रोज़ा रखना बहुत कठिन है, तो क्या मैं साठ गरीब व्यक्तियों को खाना खिला सकता हूँ, जैसाकि हदीस में वर्णित है?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्या है।

आप के लिए नसीहत (सलाह) यह है कि सर्दी के दिनों में या संतुलित दिनों में दो महीने लगातार रोज़ा रखने का प्रयास करें, जबकि दिन छोटा होता है और कष्ट और कठिनाई कम होती है, या वार्षिक छुटि्टयों में जो आप को काम करने की जगह से मिलती है, या इसी प्रकार के अन्य अवसर जिनसे अपने ऊपर अनिवार्य ज़िम्मेदारी को अदा करने के लिए लाभ उठा सकते हैं। यदि आप वास्तव में सही मायने में रोज़ा रखने से असमर्थ हैं तो ऐसी अवस्था में आप के लिए साठ गरीब व्यक्तियों को खाना खिलाना जाइज़ है, जिन्हें आप -अपनी क्षमता के अनुसार- कई चरणों में भोजन करा सकते हैं यहाँ तक कि उनकी संख्या पूरी हा जाये। आप की पत्नी पर भी इसी के समान कफ्फारा अनिवार्य है यदि रमज़ान के महीने के दौरान संभोग करने पर वह आप का आज्ञापालन करने वाली थी। यदि यह संभोग विभिन्न (अलग-अलग) दिनों में हुआ है तो आप दोनों पर उन दिनों की संख्या में जिनकी हुर्मत (पवित्रता) को आप दोनों ने इस महीने में भंग किया है, विभिन्न (अलग-अलग) कफ्फारा अनिवार्य होगा।

"किफायतुत्तालिब" के लेखक कहते हैं : "(संभोग के) दिनों के अनेक होने पर कफ्फारा भी अनेक होगा, और अगर एक ही दिन में कफ्फारा देने से पहले कई बार (संभोग) हुआ है तो उस से कफ्फारा अनेक नहीं होगा, इस पर सब की सहमति है।" और हाशियतुद्दसूक़ी में है : "एक ही दिन में अनेक बार खाने या संभोग करने से कफ्फारा अनेक बार नहीं होगा।" तथा "मुगनिल-मुहताज" के लेखक कहते हैं : "फसाद -गड़बड़ी- के अनेक होने पर कफ्फारा भी अनेक होगा ... (जिस ने दो दिनों में संभोग किया उस पर दो कफ्फारा अनिवार्य है।) क्योंकि प्रत्येक दिन एक स्थायी इबादत है, अत: उन दोनों का कफ्फारा एक दूसरे में समागम नहीं होगा, ... अगर एक ही दिन में अनेक बार संभोग होता है, तो कफ्फारा अनेक नहीं होगा।" (अन्त हुआ )।

अल्लाह तआला किसी प्राणी पर उसकी सहन शक्ति से अधिक बोझ नहीं डालता हैं, और वह हदीस जिसकी ओर आप ने अपने प्रश्न में संकेत किया है, वह अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित हदीस है, वह कहते हैं : "हम नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास बैठे हुये थे कि एक व्यक्ति आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया और कहा: ऐ अल्लाह के रसूल ! मेरा सर्वनाश हो गया। आप ने पूछा: "किस चीज़ ने तेरा सर्वनाश कर दिया?" उसने उत्तर दिया: मैं ने रमज़ान के दिन में रोज़े की हालत में अपनी पत्नी से सम्भोग कर लिया। आप ने कहा : "क्या तुम एक गु़लाम (दास या दासी) मुक्त करने की ताक़त रखते हो?" उस ने कहा : नहीं। आप ने कहा कि क्या तुम निरंतर दो महीने का रोज़ा रखने की शक्ति रखते हो?" उसने कहा : नहीं। आप ने कहा : क्या तुम साठ मिस्कीनों को भोजन कराने का सामर्थ्य रखते हो?" उसने कहा: नहीं। फिर आदमी बैठ गया। उसी बीच में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास खजूर की एक टोकरी आई, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उस से कहा: "इसे ले जाकर दान कर दो।" उस व्यक्ति ने कहा: क्या अपने से भी अधिक दरिद्र पर दान कर दूँ ? अल्लाह की सौगन्ध ! मदीना की दोनों पहाड़ियों के बीच मुझ से अधिक निर्धन कोई घराना नहीं है। इस पर पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हंस पड़े यहाँ तक कि आप के केंचुली के दांत स्पष्ट हो गए, फिर आप ने फरमाया: "इसे ले जाकर अपने घर वालों को खिला दो।" (बुखारी व मुस्लिम)

इमाम अहमद की एक रिवायत में आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा से वर्णित है कि अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हस्सान रज़ियल्लाहु अन्हु के क़िले की ऊँची छाया में बैठे हुये थे कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास एक आदमी आया और कहा : ऐ अल्लाह के पैगंबर! मैं जल गया। आप ने फरमाया : "तुम्हारा क्या मामला है?" उस ने कहा : मैं ने रोज़े की हालत में अपनी पत्नी से संभोग कर लिया। आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा कहती हैं कि यह रमज़ान का महीना था। रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उस से कहा : बैठ जाओ। वह लोगों के एक किनारे बैठ गया। इसी बीच एक आदमी गधे के साथ आया जिस पर एक टोकरा था जिस में खजूरें थीं और कहा कि ऐ अल्लाह के पैगंबर! यह मेरा सद्क़ा है। तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा : "अभी जलने वाला आदमी कहाँ है?" उस ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल मैं यह हूँ। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा: "इसे ले जाकर दान कर दो।" उसने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! सद्क़ा तो मेरे ही ऊपर और मेरे ही लिए है, उस अस्तित्व की सौगंध जिस ने आप को सत्य के साथ भेजा है, मेरे और मेरे बच्चों (परिवार) के पास कुछ भी नहीं है। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा : "तो इसे (स्वयं) ले लो।" चुनाँचि उस ने ले लिया। (मुस्नद अहमद 6/276)

हम अल्लाह सुब्हानहु व तआला से प्रश्न करते हैं कि वह हमारे गुनाहों और हमारे मामलों मे हमारी अतियों को क्षमा कर दे और हमारी तौबा को स्वीकार कर ले, नि:सन्देह वह बड़ा तौबा क़बूल करने वाला और अत्यंत दया करने वाला है।

शैख मुहम्मद सालेह अल-मुनज्जिद
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