171235: वह अपनी कमज़ोरी की वजह से अपने छोड़े हुए रोज़ों की कज़ा करने की ताक़त नहीं रखती है।


मेरी आयु चौबीस वर्ष है। मैं रमज़ान के महीने में बहुत सारे दिनों का रोज़ा तोड़ देती थी और उनका रोज़ा नहीं रखती थी। अर्थात् मैं कुछ परिस्थितियों के कारण 12 वर्ष की आयु से 24 वर्ष की आयु तक आठ दिनों का रोज़ा तोड़ दिया करती थी। मैं ने अल्लाह की बहुत क़सम खाई कि मैं इस तरह पुनः कभी नहीं करूँगी, लेकिन मैं ने रोज़ा नहीं रखा। मैं स्वास्थिक रूप से कमज़ोर हूँ। रोज़ा मुझे थका देता है . . मेरी समझ में नहीं आता कि उन दिनों के बारे में क्या करूँ जो मेरे ऊपर रह गए हैं। जबकि मैं काम-काज नहीं करती हूँ और मेरे हाथ में कोई आर्थिक आय नहीं है जिससे मैं गरीबों को खाना खिला सकूँ। मेरे परिवार वाले ही मेरे ऊपर खर्च करते हैं। काश कि आप मेरी सहायता करते, मैं ने उसे गिना तो उसे रमज़ान के अलावा सौ से अधिक दिन पाया, और यह मेरी स्वास्थ्य के ऊपर बहुत कठिन है।

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

सर्व प्रथम :

ऐ सम्मानित बहन! यह बात जान लें कि अल्लाह सर्वशक्तिमान ने रमज़ान के रोज़े को अपने बन्दों पर अनिवार्य ठहराया है, जैसा कि अल्लाह का फरमान है :

﴿يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى الَّذِينَ مِنْ قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ ﴾ [البقرة: 183].

''ऐ ईमान वालो! तुम पर रोज़े रखना अनिवार्य किया गया है जिस प्रकार तुम से पूर्व लोगों पर अनिवार्य किया गया था, ताकि तुम संयम और भय अनुभव करो।'' (सूरतुल बक़रा : 183)

तथा बिना किसी धार्मिक कारण, जैसेः बीमारी, यात्रा और मासिक धर्म के उसे तोड़ देना हराम ठहराया है, जैसा कि अल्लाह का फरमान है :

﴿وَمَنْ كَانَ مَرِيضاً أَوْ عَلَى سَفَرٍ فَعِدَّةٌ مِنْ أَيَّامٍ أُخَرَ ﴾ [البقرة: 185].

 

''और जो बीमार हो या यात्रा पर हो तो वह दूसरे दिनों में उसकी गिन्ती पूरी करे।'' (सूरतुल बक़राः 185)

दूसरा :

आपके प्रश्न से हमारे लिए यह स्पष्ट नहीं हो सका कि आप ने किस कारण रमज़ान के महीने में रोज़ा तोड़ दिया था। और यह मामला दो स्थितियों से खाली नहीं हो सकता :

पहली स्थिति : यह कि यह किसी धार्मिक कारण जैसेः मासिक धर्म, या बीमारी या यात्रा या इसके समान किसी अन्य कारण से होगा जिनकी वजह से अल्लाह ने रोज़ा तोड़ने की अनुमति प्रदान की है, तो ऐसी स्थिति में आपके ऊपर आपके रोज़ा तोड़ने की वजह से कोई पाप नहीं है। क्योंकि यह एक धार्मिक (शरई) कारण से रोज़ा तोड़ना है। लेकिन आपके ऊपर उन दिनों की क़ज़ा करना और इतना बिलंब न करना अनिवार्य था कि आपके ऊपर पिछले रमज़ान के जिन दिनों का रोज़ा अनिवार्य था उनकी क़ज़ा करने से पहले दूसरा रमज़ान आ जाए।

इस आधार पर, आपके ऊपर जो कुछ आप ने किया है उनसे तौबा करना और अपने ऊपर अनिवार्य दिनों की क़ज़ा करना अनिवार्य है। और इसमें आपके ऊपर लगातार रोज़ा रखना अनिवार्य नहीं है। आपके लिए संभव है कि इसके रोज़े को अलग-अलग बांट दे इस प्रकार कि वह आप के लिए कष्टदायक न हो। इसी तरह आप के लिए हर दिन के बदले एक मिसकीन को खाना खिलाना अनिवार्य है, और यह आपके उन दिनों के रोज़ों की क़ज़ा करने में विलंब करने की वजह से है जो आपके ऊपर अनिवार्य थे यहाँ तक कि दूसरा रमज़ान आ गया।

यदि आपके पास इतना धन नहीं है कि उससे मिसकीनों को खाना खिला सकें, या उसे कफ्फारा के तौर पर निकाल सकें : तो आपके के ऊपर कुछ भी अनिवार्य नहीं है।

दूसरी स्थिति : यह है कि यह विलंब बिना किसी शरई कारण के, आपकी ओर से कमी और कोताही के कारण हो। तो जिस व्यक्ति ने जानबूझ कर बिना किसी उज़्र के रमज़ान के दिन में रोज़ा तोड़ दिया तो वह दो हालतों से खाली नहीं है :

पहली हालत :

वह रमज़ान के एक दिन या उससे अधिक दिन के रोज़े सिरे से ही छोड़ दे, चुनाँचे वह उसके रोज़े की शुरूआत ही न करे, तो ऐसा व्यक्ति रोज़ा न रखने की वजह से दोषी – गुनाहगार - होगा, और उसके ऊपर तौबा करना अनिवार्य है, तथा कुछ विद्वानों के निकट उसके ऊपर क़ज़ा करना अनिवार्य नहीं है; क्योंकि वे इबादतें जो किसी समय के साथ निर्धारित हैं, जब भी मनुष्य जानबूझ कर उसे उसके समय से विलंब कर दे, तो अल्लाह सर्वशक्तिमान उसे स्वीकार नहीं करेगा, और उसकी क़ज़ा करने का कोई लाभ नहीं है। उसके ऊपर अनिवार्य है कि उसने अल्लाह सर्वशक्तिमान की सीमाओं का जो उल्लंघन किया है उससे तौबा करे। तथा उसके ऊपर अनिवार्य सच्ची तौबा करना, अधिक से अधिक भलाइयाँ और नेक कार्य करना है।

दूसरी हालत :

यह है कि वह रमज़ान के किसी दिन के रोज़े की शुरूआत करे, फिर रोज़े के दौरान जानबूझकर बिना किसी कारण के रोज़ा तोड़ दे। तो ऐसे व्यक्ति के हक़ में अल्लाह के समक्ष तौबा करना और उस दिन के रोज़े की क़ज़ा करना अनिवार्य है।

शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह से :

बिना कारण के रमज़ान के दिन में रोज़ा तोड़ने के हुक्म के बारे में प्रश्न किया गया।

तो उन्हों ने यह उत्तर दिया :

''बिना किसी कारण के रमज़ान के दिन में रोज़ा तोड़ना बड़े गुनाहों में से है, और इसकी वजह से इन्सान फासिक़ – अवज्ञाकारी – होगा, और उसके ऊपर अल्लाह से तौबा करना और उस दिन की क़ज़ा करना जिसका उसने रोज़ा तोड़ दिया है, अनिवार्य है। अर्थात यदि उसने रोज़ा रखा और दिन के दौरान बिना कारण के रोज़ा तोड़ दिया तो उसके ऊपर गुनाह है, और वह उस दिन की कज़ा करे जिसका उसने रोज़ा तोड़ दिया है ; क्योंकि जब उसने उसकी शुरूआत कर दी तो वह उसका प्रतिबद्ध हो गया और उसमें इस तौर पर प्रवेश किया कि वह अनिवार्य है। अतः नज़्र (मन्नत) के समान, उसके ऊपर उसकी क़ज़ा करना अनिवार्य है।

परन्तु यदि उसने बिना कारण के जानबूझकर सिरे से ही रोज़ा छोड़ दिया, तो राजेह बात यह है कि उसके लिए क़ज़ा करना अनिवार्य नहीं है ; क्योंकि वह उससे कोई लाभ नहीं उठायेगा, क्योंकि वह उससे कदापि स्वीकार नहीं किया जायेगा। क्योंकि नियम यह है कि हर वह उपासना जो किसी निधार्रित समय के साथ विशिष्ट है, अगर उसे बिना कारण के उस निर्धारित समय से विलंब कर दिया जाए तो वह उसके करने वाले की ओर से स्वीकार नहीं की जायेगी ; क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : ''जिसने कोई ऐसा कार्य किया जिस पर हमारा आदेश नहीं है उसे रद्द कर दिया जायेगा।'', और इसलिए भी कि यह अल्लाह की सीमाओं से आगे बढ़ना है, और अल्लाह की सीमाओं को फलाँगना ज़ुल्म (अत्याचार) है। और ज़ालिम से स्वीकार नहीं किया जाता है। अल्लाह तआला का फरमान है :

﴿وَمَن يَتَعَدَّ حُدُودَ ٱللَّهِ فَأُوْلَئِكَ هُمُ ٱلظَّالِمُونَ﴾

''और जिसने अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन किया, तो यही लोग अत्याचारी हैं।''

और इसलिए भी कि यदि वह इस इबादत को उसके समय से पहले कर दे - अर्थात उसका समय होने से पहले अदा कर ले - तो उससे स्वीकार नहीं किया जायेगा, तो इसी तरह यदि उसने उसे उसके समय के निकलने के बाद किया है तो उससे स्वीकार नहीं किया जायेगा, सिवाय इसके कि उसके पास कोई उज़्र (वैध कारण) हो।'' मजमूओ फतावा शैख इब्ने उसैमीन (19/प्रश्न संख्या 45)

तीसरा :

जब भी आदमी अपने ऊपर रमज़ान के महीने से अनिवार्य रोज़े की क़ज़ा करने से असमर्थ हो जाए, इस कारण कि उसका उज़्र निरंतर है जैसे कि वह बीमारी जिससे ठीक होने की आशा नहीं है तो उसके ऊपर हर दिन के बदले एक मिसकीन को खाना खिलाना अनिवार्य है। शैख मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन रहिमहुल्लाह से पूछा गया :

एक महिला ने बच्चा जन्म देने की वजह से रमज़ान के महीने का रोज़ा नहीं रखा, और उसके ऊपर एक लंबा ज़माना बीत गया, और वह (अब) रोज़ा रखने की ताक़त नहीं रखती है, तो इसका क्या हुक्म है?

तो उन्हों ने उत्तर दिया :

इस महिला पर अनिवार्य है कि इसने जो कुछ किया है उससे अल्लाह से तौबा करे ; क्योंकि किसी इन्सान के लिए रमज़ान के रोज़े की क़ज़ा को बिना शरई उज़्र के दूसरे रमज़ान तक विलंब कर देना जायज़ नहीं है। अतः उसके ऊपर तौबा करना अनिवार्य है, फिर यदि वह रोज़ा रखने की ताक़त रखती है भले ही एक दिन छोड़कर ही सही : तो वह रोज़ा रखेगी। और यदि वह रोज़ा नहीं रख सकती है : तो देखा जायेगा, यदि वह असमर्थता किसी निरंतर रहने वाले उज़्र की वजह से है तो : वह हर दिन के बदले एक मिसकीन को खाना खिलायेगी, और यदि किसी सामयिक कारण की वजह से है जिसके समाप्त होने की आशा की जा रही है : तो वह प्रतीक्षा करेगी यहाँ तक कि वह उज़्र समाप्त हो जाए, फिर अपने ऊपर अनिवार्य रोज़ों की क़ज़ा करेगी।'' अंत हुआ।

(19 / प्रश्न संख्या 361 का उत्तर)

चौथा :

मुसलमान पर अनिवार्य है कि वह अपने क़सम की रक्षा करे और अधिक क़समें न खाए, अल्लाह तआला का फरमान है :

﴿وَاحْفَظُوا أَيْمَانَكُمْ ﴾ [المائدة : 89].

''अपनी क़समों की हिफाज़त (रक्षा) करो।'' (सूरतुल मायदा : 89).

और जब भी वह अपने क़सम को तोड़ दे तो उसके ऊपर क़ज़ा करना अनिवार्य है। अल्लाह तआला ने फरमाया :

﴿لا يُؤَاخِذُكُمُ اللَّهُ بِاللَّغْوِ فِي أَيْمَانِكُمْ وَلَكِنْ يُؤَاخِذُكُمْ بِمَا عَقَّدْتُمُ الأَيْمَانَ فَكَفَّارَتُهُ إِطْعَامُ عَشَرَةِ مَسَاكِينَ مِنْ أَوْسَطِ مَا تُطْعِمُونَ أَهْلِيكُمْ أَوْ كِسْوَتُهُمْ أَوْ تَحْرِيرُ رَقَبَةٍ فَمَنْ لَمْ يَجِدْ فَصِيَامُ ثَلاثَةِ أَيَّامٍ ﴾ [المائدة : 89].

''अल्लाह तुम्हारी कसमों में से बेकार क़समों पर तुम्हारी पकड़ नहीं करेगा, किंतु वह तुम्हारी पकड़ करेगा उन क़समों पर जिन्हें तुम ने मज़बूत कर दिया है। तो उसका कफ्फारा (परायश्चित) दस मिसकीनों को खाना खिलाना है औसत दर्जे का, जो तुम अपने घरवालों को खिलाते हो, या उन्हें कपड़े पहनाना या एक गु़लाम आज़ाद करना है। और जो यह न पाए तो तीन दिन रोज़े रखे। यह तुम्हारी क़समों का कफ्फारा है जब तुम क़सम खा बैठो, और तुम अपनी क़समों की हिफाज़त करो। इसी तरह अल्लाह तआला तुम्हारे लिए अपनी आयतों (आदेशों) को बयान करता है ताकि तुम शुक्र करो।'' (सूरतुल मायदा : 89)

रोज़े के द्वारा कफ्फारा अदा करना जायज़ नहीं है, सिवाय उस आदमी के लिए जो दस मिसकीनों को खाना खिलाने, या उन्हें कपड़ा पहनाने, या एक गुलाम (दास या दासी) मुक्त करने में सक्षम नहीं है।

तथा क़सम के कफ्फारा के बारे में विस्तार से जानने के लिए प्रश्न संख्या (45676) का उत्तर देखें।

पाँचवां :

जब भी इन्सान कफ्फारा देने में असमर्थ हो जाए, इस प्रकार कि वह उन दिनों के रोज़ों की क़ज़ा करने की ताक़त न रखे जिन्हें उसने रमज़ान में तोड़ दिया था, और न तो उनके बदले खाना खिलाने की ताक़त रखे, या क़सम का कफ्फारा अदा करने में बिल्कुल असमर्थ हो : तो उससे खाना खिलाना और कफ्फारा समाप्त हो जाता है ; क्योंकि शरई नियम के अनुसार यह प्रमाणित हो चुका है कि अनिवार्य चीज़ें असमर्थता की स्थिति में समाप्त हो जाती हैं।

शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह ने फरमाया : ''अगर इन्सान पर क़सम का कफ्फारा अनिवार्य हो जाए और वह मिसकीनों को खिलाने के लिए कुछ न पाए और वह रोज़े की भी ताक़त न रखे तो वह उससे समाप्त हो जाएगा, क्योंकि अल्लाह तआला का फरमाता है :

﴿فاتقوا الله ما استطعتم﴾ [التغابن : 16].

''तुम अपनी ताक़त भर अल्लाह से डरो।'' (सूरतुत तगाबुन : 16)

तथा फरमाया :

﴿لا يُكَلِّفُ اللَّهُ نَفْساً إِلاَّ وُسْعَهَا﴾ [البقرة : 286].

''अल्लाह तआला किसी प्राणी पर उसकी शक्ति से अधिक भार नहीं डालता।'' (सूरतुल बक़रा : 286)

तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित है कि आप ने फरमाया : ''जब मैं तुम्हें किसी चीज़ का आदेश दूँ तो तुम अपनी यथाशक्ति उसे करो।''

और उसके ऊपर कोई चीज़ अनिवार्य नहीं है ; क्योंकि प्रमाणित नियमों में से यह है कि अनिवार्य चीज़ें उनमें असमर्थता की स्थिति में समाप्त होकर उसके बदल की ओर परिवर्तित हो जाती हैं, यदि उनका कोई बदल है। या अगर उनका कोई बदल नहीं है तो 'कोई भी चीज़ नहीं' की ओर परिवर्तित हो जाती हैं, और यदि बदल भी दुर्लभ हो जाए तो सिरे से समाप्त हो जाती हैं।''  ''फतावा नूरून अलद-दर्ब'' से अंत हुआ।

यहाँ इस बात पर चेतावनी देना उचित है कि : रोज़ा रखने में वास्तविक असमर्थता और मात्र कष्ट के भय के बीच अंतर है, और इन्सान अल्लाह के सामने इस बात पर अमीन (विश्वस्त) बनाया गया है, अतः उसे चाहिए कि इस बाबत अल्लाह से डरे, और इस बात को अच्छी तरह जान ले कि अल्लाह सर्वशक्तिमान उसके भेद और उसके मामले की वास्तविकता से अवज्ञत है, और वह जानता है कि वह (मनुष्य) वास्तव में असक्षम है, या कि वह अल्लाह ने उसके ऊपर जो कफ्फारा अनिवार्य किया है उसको त्यागने के लिए इसे ज़रिया (साधन) बना रहा है। अल्लाह तआला का कथन है :

﴿قُلْ إِنْ تُخْفُوا مَا فِي صُدُورِكُمْ أَوْ تُبْدُوهُ يَعْلَمْهُ اللَّهُ وَيَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الأرْضِ وَاللَّهُ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ ﴾ [آل عمران : 29].

''(आप) कह दीजिए कि चाहे तुम अपने दिल की बातें छिपाओ या ज़ाहिर करो, अल्लाह (तआला) सब को जानता है, आकाशों और धरती में जो कुछ है सब उसे मालूम है, अल्लाह (तआला) हर चीज़ पर शतक्ति रखने वाला है।'' (सूरत आले-इम्रान : 29).

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

इस्लाम प्रश्न और उत्तर
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