Wed 23 Jm2 1435 - 23 April 2014
171308

तवाफ के चक्करों की संख्या में शंका और दो रायों के बीच सामंजस्य

मैं तवाफ़ के चक्करों की संख्या के बारे में संदेह का शिकार होने वाले व्यक्ति के हुक्म से संबंधित दो विचारों से अवगत हुआ हूँ। पहला विचार यह है कि : यदि आदमी को अपने तवाफ़ के दौरान तवाफ के चक्करों की संख्या के बारे में संदेह हो जाए कि उसने छः चक्कर तवाफ किया है या सात चक्कर ॽ तो उसके लिए उचित है कि वह एक बार (चक्कर) और तवाफ करे जिस से वह सात चक्कर पूरा कर ले ताकि शंका समाप्त हो जाए। परंतु अगर उसे यह शंका तवाफ से पूरी तरह फारिग होने के बाद पैदा होती है तो यह शैतान की ओर से शंका डालना है और उसका तवाफ सही है और उसे इसके प्रति कुछ भी नहीं करना चाहिए। (फतावा शैख इब्ने बाज़)। दूसरा विचार : मालिक से वर्णित है कि उन्हों ने कहा : यदि आदमी ने काबा का तवाफ किया और उससे फारिग होकर तवाफ की दो रक्अतें अदा करने के लिए गया तो उसे उसके तवाफ के चक्करों की संख्या के बारे में संदेह ने घेर लिया, तो उस पर अनिवार्य है कि वह वापस जाकर तवाफ के उन चक्करों को पूरा करे जिनके छोड़ देने के बारे में उसे संदेह हुआ है, फिर वापस लौटकर नये सिरे से दो रक्अत नमाज़ पढ़े, उन दोनों रकअतों का कोई एतिबार न करे जिन्हें वह पढ़ चुका था, क्योंकि वे दोनों सात चक्कर तवाफ के बाद ही पर्याप्त हो सकती हैं। (मुवत्ता मालिक, हदीस संख्या : 266)। तो इन दोनों कथनों के बीच हम कैसे समानता व सामंजस्य पैदा करें ॽ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

सर्व प्रथम : संदेह दो हालतों से खाली नहीं होगा :

पहली हालत: यह है कि वह शंका इबादत के अंदर हो, तो इस हालत में वह कम से कम संख्या को आधार बनायेगा, यदि उसे संदेह हो गया कि उसने पाँच चक्कर तवाफ किया है या छः चक्कर, तो वह कम से कम संख्या “पाँच” को आधार बनायेगा, क्योंकि यही निश्चित है और वृद्धि यानी “छः” चक्कर का मामला संदिग्ध है, और इसका प्रमाण नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह फरमान है : “यदि तुम से किसी को अपनी नमाज़ के अंदर संदेह हो जाए कि उसे पता न चले कि उसने तीन रक्अत नमाज़ पढ़ी है या चार रक्अत तो वह संदेह को समाप्त कर दे और यक़ीन को आधार बनाए।” इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 88) ने रिवायत किया है।

इब्ने क़ुदामा रहिमहुल्लाह ने फरमाया : “. . . और अगर उसे तवाफ की संख्या के बारे में संदेह हो जाए तो वह यक़ीन को आधार बनाए। इब्नुल मुंज़िर ने फरमाया : विद्वानों में से जिनकी बातों को हम सुरक्षित रखते हैं उन सभी का इस पर सर्वसहमति है। और इसलिए कि वह इबादत है तो जब भी उसे उसके बारे में संदेह हो और वह उसी के अंदर हो तो वह यक़ीन को आधार बनायेगा जैसेकि नमाज़ . . .”  “अल-मुगनी” (3/187) से अंत हुआ।

दूसरी हालत : यह है कि इबादत से फारिग होने के बाद संदेह हो, तो विद्वानों के सही कथन के अनुसार उस पर ध्यान नहीं दिया जायेगा, क्योंकि मूल सिद्धांत इबादत का कमी से सुरक्षित होना है, और ताकि वह अपने ऊपर वस्वसे का द्वार न खोले।

“अल-मौसूअतुल फिक़हिय्या” (29/125) में आया है : “परंतु यदि तवाफ से फारिग होने के बाद उसे संदेह पैदा होता है तो जमहूर (विद्वानों की बहुमत) के निकट उस पर कोई ध्यान नहीं दिया जायेगा, जबकि मालिकिया ने उसके बीच और जबकि वह तवाफ के अंदर ही हो, के बीच कोई अंतर नहीं किया है, और अहनाफ ने संदेह के बारे में अपनी इबारतों को सामान्य रखा है . . .” अंत हुआ।

तथा शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह ने फरमाया : “इबादत से फारिग होने के बाद संदेह के पैदा होने का कोई एतिबार नहीं है, और इसी तरह : यदि उसे तवाफ के चक्कर के बारे में शक हो जाए कि उसने छः चक्कर तवाफ किया है या पाँच चक्कर, तो हम कहेंगे कि : यदि यह तवाफ के दौरान है तो वह उस चीज़ को कर ले जिसके बारे में उसे संदेह पैदा हुआ है और मामला इसी पर समाप्त हो जायेगा। और यदि तवाफ से फारिग होने और वहाँ से रवाना होने के बाद संदेह होता है, वह कहता है : अल्लाह की क़सम ! मैं नहीं जानता कि छः चक्कर तवाफ किया हूँ या सात चक्कर ॽ तो इस शक का कोई एतिबार नहीं है, इस संदेह को वह निरस्त कर देगा और उसे सात चक्कर समझेगा।

यह आदमी के लिए एक लाभदायक नियम है : यदि उसके साथ संदेहों की अधिकता हो जाए तो वह उस पर ध्यान न दे, और अगर इबादत से फारिग होने के बाद शक पैदा हो तो उस पर ध्यान न दे, सिवाय इसके कि उसे यक़ीन हो जाए, अगर उसे यक़ीन हो जाए तो उसके ऊपर कमी को पूरा करना अनिवार्य है।” “फतावा नूरून अलद दर्ब” से अंत हुआ।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक जानने वाला है।
Create Comments