210263: नियोक्ता (कार्यदाता) ने एक कर्मचारी के साथ अन्याय किया और उसे उसके वित्तीय अधिकार नहीं दिए, तो क्या लेखाकार के लिए नियोक्ता की अज्ञानता में ज़ुल्म को समाप्त करने के लिए उस कर्मचारी के हक़ को लौटाना जायज़ है?


प्रश्न : मैं एक लेखाकार के रूप में काम करता हूँ। हमारे यहाँ एक कर्मचारी है जिसकी सेवा को अचानक समाप्त कर दिया गया। उसके 33000 हज़ार के बराबर अधिकार बनते हैं। तथा उस देश के श्रम क़ानून ने, जिसमें मैं काम करता हूँ, अचानक सेवानिवृत्त करने के मुआवज़े के तौर पर चेतावनी का वेतन भुगतान करने का आदेश दिया। ज्ञात रहे कि उस कर्मचारी ने एक अवधि पूर्व कंपनी से 12000 राशि का अग्रिम (उधार) ले रखा था। कंपनी के मालिक ने 33000 हज़ार के योग से 12000 हज़ार के अलावा कुछ नहीं दिया। जब मैं ने यह खुला अत्याचार देखा, तो उससे उस अग्रिम (उधार) राशि की कटौती नहीं की।

तो क्या यह हराम (निषिद्ध) है?

जबकि ज्ञात रहे कि मुझे अच्छी तरह पता है कि इस कर्मचारी पर यह खुला अत्याचार हुआ है, तथा प्रवास में उसका एक परिवार है और उसे अचानक बर्खास्त कर दिया गया है।

उत्तर :

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

यह अत्याचार जो इस कर्मचारी पर हुआ है, यह आपके लिए उसके ऊपर अनिवार्य होने वाले अग्रिम (उधार) को छुपाने की अनुमति नहीं देता है, क्योंकि आप अपने इस काम पर विश्वस्त बनाए गए हैं, और अल्लाह तआला का फरमान है:

﴿إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُكُمْ أَنْ تُؤَدُّوا الْأَمَانَاتِ إِلَى أَهْلِهَا ﴾ [النساء : 57]

''अल्लाह तआला तुम्हें आदेश देता है कि अमानतों (धरोहर) को उनके मालिकों तक पहुँचा दो'' (सूरतुन्निसा : 58).

तथा अमानत (धरोहर) और आपके और कंपनी के बीच जो अनुबंध है उसकी अपेक्षाओं में से यह नहीं है कि आप अग्रिम (उधार) को न घटायें। तथा आपका लेखाकर्म (अकाउंटेंसी) में काम करना, इस घटना - अर्थात अग्रिम (उधार) - के होने या न होने पर एक प्रकार की गवाही है, और अल्लाह तआला का फरमान है:

 ﴿يا أيها الذين آمنوا كونوا قوامين بالقسط شهداء لله ولو على أنفسكم أو الوالدين والأقربين إن يكن غنيا أو فقيرا فالله أولى بهما ﴾ [النساء : 135].

''ऐ ईमान वालो! इंसाफ पर मज़बूत रहने वाले और अल्लाह के लिए सच गवाही देने वाले बन जाओ, चाहे वह स्वयं तुम्हारे अपने या माँ-बाप या रिश्तेदारों के विरूद्ध ही क्यों न हो। अगर वइ इंसान धनी हो तो या गरीब हो तो उन दोनों से अल्लाह का रिश्ता अधिक है।'' (सूरतुन्निसा : 135).

इब्ने कसीर रहिमहुल्लाह ने फरमाया :

अल्लाह का फरमानः (إن يكن غنيا أو فقيرا فالله أولى بهما) (यानी अगर वइ इंसान धनी हो तो या गरीब हो तो उन दोनों से अल्लाह का रिश्ता अधिक है।) अर्थात: उसकी अमीरी की वजह से उसकी रिआयत न करो, न ही उसकी गरीबी की वजह से उस पर तरस खाओ, अल्लाह उनका ज़िम्मेदार है, बल्कि वह उनका आप से अधिक योग्य है, और जिस चीज़ के अंदर उन दोनों का हित और भलाई है उसको सबसे अधिक जानने वाला है।

तफसीर इब्ने कसीर - दार तैबा - (2/433) से अंत हुआ।

आपका क्या विचार है यदि अत्याचारी भविष्य में इस अत्याचार पर पछतावा करे और अत्याचार ग्रस्त व्यक्ति को उसका हक़ लौटा दे, या ज़िम्मेदार लोग हस्तक्षेप करते हुए उसके हक़ को बहाल करा दें, तो इस अग्रिम (उधार) का क्या हाल होगा जिसका कोई दस्तावेज़ नहीं तैयार किया गया है?

यदि आपका मामला खुल जाए और आप ने जो कुछ किया है उसका उन्हें पता चल जाए, तो क्या होगा? इस में कोई शक नहीं कि यह आपको, आपके सभी कामों में आरोप का पात्र बना देगा? आपके ऊपर अनिवार्य यह है कि अपनी शक्ति भर ज़ालिम और मज़लूम की मदद करने की कोशिश करें। हदीस में आया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : ''अपने भाई की मदद करो चाहे वह ज़ालिम हो या मज़लूम। तो एक आदमी ने कहा : ऐ अल्लाह के पैगंबर! अगर वह मज़लूम है तो मैं उसकी मदद करूं, तो भला बतलाइये कि यदि वह ज़ालिम है तो मैं उसकी किस तरह मदद करूँ? आप ने फरमाया : तुम उसे ज़ुल्म से रोक लो या बाज़ रखो, यही उसकी मदद करना है।'' इसे बुखारी (हदीस संख्या : 6952) ने रिवायत किया है।

अतः आप ज़ालिम को नसीहत करें ताकि वह ज़ुल्म व अत्याचार करने से रूक जाए। तथा मज़लूम (अत्याचार से पीड़ित) की उस चीज़ के द्वारा मदद करें जो उसके लिए उसके अधिकार को बहाल करने पर सहायक हो बिना इसके कि आप अपनी अमानत में खयानत करें। जिन चीज़ों के द्वारा आप उसकी मदद कर सकते हैं, उन्हीं में से यह भी है कि आप उसे उसके अधिकार को पुनः प्राप्त करने के लिए वैधानिक तरीक़ा बतलायें।

हम ने शैख सालेह अल-फौज़ान – हफिज़हुल्लाह - पर कंपनी के एकाउंटेंट या खज़ांची के कंपनी के मालिक से पैसे लेकर, उसे उस व्यक्ति को देने जिसे वह मज़लूम (अन्याय पीड़ित) समझता है, के हुक्म के बारे में एक प्रश्न पेश किया।

तो शैख ने यह कहते हुए उत्तर दिया : ''लेखाकार के लिए नियोक्ता (कार्दाता) से पैसे लेकर, उसे उस व्यक्ति को देना जिसे वह मज़लूम (पीड़ित) समझ रहा है, जायज़ नहीं है। बल्कि वह ज़ुल्म करने वाले को नसीहत करे और ज़ुल्म से पीड़ित व्यक्ति की मदद करे, परंतु उस पैसे की तरफ हाथ न बढ़ाए जिस पर उसे ज़िम्मेदार बनाया गया है।'' अंत हुआ।

और अल्लाह तआला ही सबसे बेहतर ज्ञान रखता है।
Create Comments