23265: सदाचारियों की प्रतिष्ठा और अल्लाह के यहाँ उनके स्थान के माध्यम से अल्लाह से सवाल करने का हुक्म


शुद्धता, सत्यनिष्ठा, तेरे पास उसकी प्रतिष्ठा और तेरे लिए उसकी उपासना के माध्यम से, ऐ अल्लाहह मेरी परेशानी को दूर कर दे। जबकि हम जानते हैं कि लाभ अल्लाह की ओर से होता है।

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि दुआ महान शरई इबादतों में से है जिसके द्वारा बंदा अपने पालनहार की निकटता प्राप्त करता है, तथा इस में भी कोई संदेह नहीं कि किसी बंदे के लिए जायज़ नहीं है कि वह अल्लाह की उपासना करे मगर उस चीज़ के द्वारा जिसे अल्लाह ने अपने पैगंबर की ज़ुबानी धर्मसंगत करार दिया है। क्योंकि बुखारी (हदीस संख्या : 2499) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 3242) ने आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा : अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : ''जिसने हमारे इस (धार्मिक) मामले में कोई ऐसी चीज़ अविष्कार की जो उसमें से नहीं है तो वह अस्वीकृत है।'' तथा मुस्लिम की एक रिवायत (हदीस संख्या : 3243) के शब्द यह हैं कि : ‘‘जिसने कोई ऐसा काम कियाम जो हमारे आदेश के अनुसार नहीं है तो वह अस्वीकृत है।’’

इससे पता चलता है कि अल्लाह की ओर ध्यानमग्न होना और उसकी तरफ ऐसा वसीला (साधन) अपनाना जो उसके नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कथन या कर्म से वर्णित नहीं है, तथा जिसे उसके सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम ने नहीं किया है जो कि भलाई के सबसे अधिक इच्छुक थे और उसकी तरफ सबसे अधिक पहल करने वाले थे ; एक घृणित बिदअत है, जिसकी तरफ क़दम बढ़ाना और उसके द्वारा उपासना करना अपने पालनहार से महब्बत रखन वाले और अपने पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पैरवी करने वाले के लिए उचित नहीं है।

जब हम उस चीज़ को देखते हैं जिसका - ऐ प्रशन कर्ता - आप ने उल्लेख किया है अर्थात नेक लेागों के पद व स्थान, उनकी उपासना वा आराधना और अल्लाह के पास उनी प्रतिष्ठ को अल्लाह के यहाँ वसीला (साधन और माध्यम) बनाना ; तो हम पाते हैं कि वह एक नई ईजाद कर ली गई चीज़ है, जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित नहीं है, और न तो आपके सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम के बारे में वर्णित है कि उन्हों ने किसी दिन नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की प्रतिष्ठा और पद व स्थान को अल्लाह के पास वसीला (माध्यम एवं साधन) बनाया है, न तो आपके जीवन में और न ही आपकी मृत्यु के बाद। बल्कि वे आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जीवनकाल आपकी उनके हक़ में दुआ को अल्लाह के यहाँ वसीला (साधन) बनाते थे। जब आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मृत्यु हो गई तो उन्हों ने जीवित लोगों में से सदाचारियों की दुआ को अल्लाह के पास वसीला बनाया और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की प्रतिष्ठा को वसीला नहीं बनाया। जिससे स्पष्ट रूप से पता चलता है कि आपके अस्तित्व और प्रतिष्ठा का वसीला लेना यदि धर्म संगत और भलाई का काम होता तो वे लोग ऐसा करने में हम से पहल करने वाले होते।

ऐसा कौन है जो यह गुमान करे कि वह भलाई का उमर बिन खत्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु से अधिक लालायित और इच्छुक है, लेकिन वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की प्रतिष्ठा का वसीला लेने से उपेक्षा कर अपने नबी के चाचा की दुआ का वसीला लेते हैं, और सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम इसके साक्षी हैं, वे इसका कोई खण्डन या विरोध नहीं करते हैं ; जैसाकि सहीह बुखारी (हदीस संख्या : 954) में अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि : ‘‘जब वे लोग अकाल से पीड़ित होते थे, तो उमर बिन खत्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु, अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलि के द्वारा बारिश मांगते थे। चुनाँचे वह कहते थे : ऐ अल्लाह! हम तेरे पास तेरे नबी का वसीला लेते थे, तो तू हमे बारिश से सेराब करता था। और (अब) हम तेरे पास तेरे नबी के चाचा का वसीला लेते है, अतः तू हमें बारिश से सेराब कर। हदीस के रावी (कथावाचक) कहते हैं कि तो वे बारिश से सेराब किए जाते थे।’’

उनके नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का या अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु का वसीला लेने का मतलब : आपकी दुआ का वसीला लेना है, इसका प्रमाण यह है कि हदीस के कुछ तरीक़ों में अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्हों ने कहा : ‘‘जब वे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के समय काल में अकाल से पीड़ित होते थे तो वे आप द्वारा बारिश मांगते थे, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उनके लिए बारिश मांगते थे, तो उन पर बारिश होती थी। जब उमर रज़ियल्लाहु अन्हु की खिलाफत का समय काल था।'' तो उन्हों ने पूरी हदीस वर्णन की जिसे इसमाईली ने सहीह बुखारी पर अपनी मुसतखरज में उल्लेख किया है। तथा अब्दुर्रज़्ज़ाक़ के यहाँ इब्ने अब्बास की हदीस से वणिर्त है कि : ‘‘उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने ईदगाह में बारिश मांगने की नमाज़ पढ़ी। फिर अब्बास से कहा : उठिए और बारिश के लिए दुआ कीजिए। चुनाँचे अब्बास खड़े हुए...’’ फिर पूरी हदीस वर्णन की। इसे हाफिज़ इब्ने हजर ने फत्हुल बारी में उल्लेख किया और उस पर खामोशी अपनाई है।

इससे स्पष्ट हो गया कि उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने जिस तवस्सुल का क़सद किया था वह नेक आदमी की दुआ का वसीला लेना था। और वह एक सही और धर्म संगत तवस्सुल है जिस पर बहुत सारी दलीलें हैं। और यही सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम की हालत से भी सर्वज्ञात है। क्योंकि जब वे अकाल से ग्रस्त होते और उनसे बारिश रूक जाती तो अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अनुरोध करते थे कि आप उनके लिए दुआ करें। चुनाँचि आप उनके लिए दुआ करते थे तो उन पर बारिश होती थी। इस बारे में हदीसें बहुत हैं और प्रसिद्ध हैं।

स्थायी समिति के फतावा (1/153) में आया है :

''अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की प्रतिष्ठा से, या फलाँ (अमुक) सहाबी या उनके अलावा की प्रतिष्ठा से, या आपके जीवन के हवाले से दुआ करना जायज़ नही है, क्योंकि इबादतें तौक़ीफ़ी हैं (यानी उनके सबूत के लिए क़ुरआन और हदीस के स्पष्ट प्रमाण की ज़रूरत होती है), और अल्लाह ने इसे धर्म संगत नहीं बनाया है। उसने अपने बन्दों के लिए अपने नामों और विशेषणों, अपनी तौहीद (एकेश्वरवाद) और अपने ऊपर ईमान लाने और नेक कार्यों का वसीला लेना धर्म संगत बाया है। अमुक और अमुक की प्रतिष्ठा और उसके जीवन का वसीला इसमें से नहीं है। अतः मुकल्लफ (शरीअत के प्रावधानों की प्रतिबद्धता के योग्य) लोगों पर, अल्लाह सर्वशक्तिमान ने जो कुछ धर्म संगत बनाया है, उसी पर निर्भर करना अनिवार्य है। इसी से यह ज्ञात हो जाता है कि फलाँ की प्रतिष्ठा, उसके जीवन और उसके हक़ का वसीला लेना धर्म में पैदा कर ली गई बिदअतों में से है।'' अंत हुआ।

तथा शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिय्या ने फरमाया : ''किसी के लिए यह अनुमति नहीं है कि वह अल्लाह के सामने अपने पूर्वजों की धर्मनिष्ठा और धार्मिकता पर गर्व करे, क्योंकि उनकी धार्मिकता और शुद्धता उसके उस अमल से नहीं है जिस पर वह प्रतिफल का पात्र है, जैसे कि तीनों गुफा वालों की कहानी है। चुनाँचे उन्हों ने अपने पूर्वजों की धर्मनिष्ठा और पवित्रता का अल्लाह के यहाँ वसीला नहीं लिया, बल्कि अपने कार्यों का वसीला लिया।'' अंत हुआ।

हम अल्लाह तआला से दुआ करते हैं कि वह हमें अपने धर्म अैर अपनी शरीअत पर सुदृढ़ रखे यहाँ तक कि हमारी उससे मुलाक़ात हो। . . . आमीन।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधि ज्ञान रखता है।

देखिए  (अत्तवस्सुल अनवाउहू व अहकामुहू, लेखकः शैख अल्बानी, पृष्ठ : 55 और उसके बाद,  फतावा स्थायी समिति 1/153, और किताब अत्तवस्सुल इला हक़ीक़तित् तवस्सुल लेखकः शैख मुहम्मद नसीब अर-रिफाई पृष्ठ: 180).

इस्लाम प्रश्न और उत्तर
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