23491: वह तौबा करता है फिर गुनाह की तरफ पलट आता है


मेरी समस्या हराम (निषिद्ध) चीज़ों को देखना है, मैं तौबा करता हूँ फिर उसी हालत की ओर पलट जाता हूँ। मुझे नहीं मालूम कि कौन सी चीज़ मुझे इस कार्य पर बाध्य कर देती है ?

हर प्रकार की स्तुति और प्रशंसा केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

ऐ मुसलमान, . . . अल्लाह सर्वशक्तिमान ने हमें एक महान कार्य के लिए पैदा किया है और वह केवल उसी की उपासना करना है जिसका कोई साझी नहीं। अल्लाह सर्वशक्तिमान ने फरमाया: [وما خلقت الجن والإنس إلا ليعبدون ]  "मैं ने जिन्नात और इंसान को मात्र इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी ही उपासना करें।’’

अतः, प्रत्येक मुसलमान पर अनिवार्य है कि वह अपनी शक्ति भर अपने पालनहार व स्वामी की उपासना में संघर्ष करे

 [ لا يكلف الله نفساً إلا وسعها]  

"अल्लाह किसी प्राणी पर उसके सामर्थ्य से बढ़कर भार नहीं डालता।"

किंतु इस कारण कि इंसान कमज़ोर है, हर तरफ से दुश्मनों से घिरा हुआ है . . चुनांचे उसके दोनों पार्शव के बीच "नफ्से अम्मारह" अर्थात बुराई का आदेश करने वाला नफ्स है . . शैतान उसके शरीर में रक्त की तरह दौड़ता है . . और वह ऐसी दुनिया में रहता है जो उसके लिए श्रृंगार और सजावट करती है, तो फिर वह इन दुश्मनों से कैसे सुरक्षित रह सकता है यदि अल्लाह तआला उस पर दया और कृपा न करे।

इन सभी चीज़ों के साथ-साथ, नरक को शह्वतों (इच्छाओं) से घेर दिया गया है और स्वर्ग को अनेच्छिक और घृणित चीज़ों से घेर दिया गया है। अतएव, इंसान के ऊपर अनिवार्य है कि वह अल्लाह की ओर शरण ले, उसका सहारा ढूँढ़े ताकि अल्लाह तअला अपने ज़िक्र (जप), अपने शुक्र और अच्छे ढंग से अपनी इबादत पर उसकी ममद करे। यह अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु हैं जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आये और अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कहा: मुझे कोई दुआ सिखला दीजिए जिसके द्वारा मैं अपनी नमाज़ में दुआ करूँ। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: "तुम कहो:

اللَّهُمَّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي ظُلْمًا كَثِيرًا وَلا يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلا أَنْتَ فَاغْفِرْ لِي مَغْفِرَةً مِنْ عِنْدِكَ وَارْحَمْنِي إِنَّك أَنْتَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ "

उच्चारण : अल्लाहुम्मा इन्नी ज़लम्तो नफ्सी ज़ुल्मन कसीरन वला यग्फ़िरूज़्ज़ुनूबा इल्ला अन्त, फ़ग्फिर ली मग्फि-रतन मिन् इंदिक, वर्-हम्नी, इन्नका अन्तल-ग़फूरूर्रहीम।

"ऐ अल्लाह मैं ने अपने प्राण पर बहुत अत्याचार किया है (अर्थात् बहुत पाप किया है) और पापों को तेरे अलावा कोई माफ नहीं कर सकता। अतः, तू अपनी ओर से मुझे माफी प्रदान कर, निःसंदेह तू बड़ा ही क्षमादाता दयावान व करूणामई है।’’ इसे बुखारी (हदीस संख्या: 834) और मुस्लिम (हदीस संख्या: 2705) ने रिवायत किया है।

इस हदीस में मनन चिंतन करें कि किस प्रकार नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु का, जो कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बाद इस उम्मत के सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति हैं, इस बात की ओर मार्गदर्शन किया कि वह यह दुआ पढ़ें कि "अल्लाहुम्मा इन्नी ज़लम्तो नफ्सी ज़ुल्मन कसीरा..." जब अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु -जबकि वह सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति हैं- यह बात कहते हैं तो फिर हम क्या कहेंगे ?!! ऐ अल्लाह, तू हम पर दया कर।

यह सर्वश्रेष्ठ और फुक़हा-ए-सहाबा में से एक दूसरे सहाबी -मुआज़ बिन जबल- रज़ियल्लाहु अन्हु हैं, उनसे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फरमाते हैं: "ऐ मुआज़, मैं तुमसे महब्बत करता हूँ। (तो इस पर मुआज़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा:) और मैं भी आप से महब्बत करता हूँ, ऐ अल्लाह के पैगंबर। तो अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: तुम हर नमाज़ में यह कहना न छोड़ो:

رَبِّ أَعِنِّي عَلَى ذِكْرِكَ وَشُكْرِكَ وَحُسْنِ عِبَادَتِكَ

उच्चारण: "रब्बि अ-इन्नी अला ज़िक्रिका व शुक्रिका व हुस्नि इबादतिक"

"ऐ मेरे पालनहार, तू अपने ज़िक्र (जप), अपने शुक्र और अच्छे ढंग से अपनी इबादत पर मेरी मदद कर।" इसे नसाई (हदीस संख्या: 1303) ने रिवायत किया है और अल्बानी ने सहीह सुनन नसाई (हदीस संख्या: 1236) में उसे सहीह कहा है।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की अपने एक प्रिय सहाबी रज़ियल्लाहु अन्हु के लिए इस वसीयत पर मनन चिंतन करें कि किस प्रकार आप ने उन्हें इबादत की अदायगी में अल्लाह सर्वशक्तिमान से मदद मांगने की ओर मार्गदर्शन किया ; क्योंकि यदि इंसान अल्लाह की ओर से ममद से वंचित कर दिया गया तो सचमुच वह वंचित (महरूम) है : ((यदि मनुष्य को अल्लाह की ओर से मदद प्राप्त न हो तो सर्व प्रथम उसका इज्तिहाद (संघर्ष) ही उसे हानि पहुँचाता है।"

अतः, हमारे ऊपर अनिवार्य है कि हम अल्लाह की ओर शरण लें और जो कुछ भी उसने हमें आदेश दिया है उस पर हम उससे सहायत मांगें।

फिर जबकि कमी व अभाव सर्व मानव जाति पर प्रभुत्व रखता है, अल्लाह सर्वशक्तिमान ने हमारे लिए समस्त गुनाहों और पापों से तौबा (पश्चाताप) करना धर्मसंगत क़रार दिया है। अल्लाह सर्वशक्तिमान ने फरमाया:

] وَتُوبُوا إِلَى اللَّهِ جَمِيعًا أَيُّهَا الْمُؤْمِنُونَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ [ (سورة النور : 31)

"ऐ मोमिनो, तुम सब के सब अल्लाह की ओर तौबा (पश्चाताप) करो ताकि तुम्हें सफलता प्राप्त हो।" (सूरतुन्नूर: 31)

तथा अल्लाह सर्वशक्तिमान ने -अपने पैगंबरों में से एक पैगंबर की ज़ुबानी- फरमाया:

]وَأَنِ اسْتَغْفِرُوا رَبَّكُمْ ثُمَّ تُوبُوا إِلَيْهِ[ [سورة هود : 2]

"अपने पालनहार से क्षमायाचना करो फिर उसकी ओर पश्चाताप करो।" (सूरत हूद: 2)

तथा अल्लाह तआला ने फरमाया:

] يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا تُوبُوا إِلَى اللَّهِ تَوْبَةً نَصُوحًا عَسَى رَبُّكُمْ أَنْ يُكَفِّرَ عَنْكُمْ سَيِّئَاتِكُمْ وَيُدْخِلَكُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الأنْهَارُ [ [سورة التحريم : 8]

"ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, अल्लाह की ओर सच्ची तौबा करो, आशा है कि तुम्हारा पालनहार तुम्हारे गुनाहों को मिटा दे और तुम्हें ऐसे बागों में प्रवेश करे जिनके नीचे नहरें जारी होंगी।" (सूरत तहरीम: 8)

‘‘अल्लाह सर्वशक्तिमान ने इस आयत में गुनाहों के मिटाने और बागों में प्रवेश करने को सच्ची तौबा के साथ संबंधित किया है, और वह यह है कि वह गुनाहों के छोड़ने और उससे बचने, और जो कुछ उससे हो चुका है उस पर पछतावा करने, और इस बात पर सच्चे संकल्प पर आधारित हो कि वह पुनः उसकी ओर नहीं लौटेगा, अल्लाह सर्वशक्तिमान का सम्मान करते हुए, उसके सवाब (पुण्य) की चाहत रखते हुए और उसकी सज़ा से डरते हुए।" (शैख अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ की बात मजमूउल फतावा (अक़ीदा - भाग 2, पृष्ठ 640) से समाप्त हुई).

तथा अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्हों ने कहा: मैं ने अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को फरमाते हुए सुना: "अल्लाह की क़सम! मैं अल्लाह से एक दिन में सत्तर से अधिक बार इस्तिग़फार (क्षमायाचना) और तौबा (पश्चाताप) करता हूँ।" इसे बुखारी (हदीस संख्या: 6307) ने रिवायत किया है।

तथा अबू बुर्दह से वर्णित है कि उन्हों ने कहा कि मैं ने अल-अग़र रज़ियल्लाहु अन्हु को - और वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के असहाब (साथियों) में से थे- कहते हुए सुना कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: "ऐ लोगो, अल्लाह से तौबा (पश्चाताप) करो, क्योंकि मैं उससे दिन में सौ बार तौबा करता हूँ।" इसे मुस्लिम (हदीस संख्या: 2702) ने रिवायत किया है।

ये प्रमाण अल्लाह सर्वशक्तिमान की ओर तौबा (पश्चाताप) करने पर उभारने पर आधारित हैं, और यह तौबा करने वालों के इमाम -अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम - एक दिन में सौ बार तौबा करते हैं। अतः, हम गुनाहों की अधिकता के कारण अधिक से अधिक तौबा करने के सर्वाधिक योग्य हैं, और अल्लाह तआला की तौफीक़ के बिना किसी बुराई से बचने का सामर्थ्य है और न किसी भलाई के करने की ताक़त।

ऐ मुसलमान, आप का यह कहना कि .. आप तौबा करते हैं फिर गुनाह की ओर लौट आते हैं उसके बाद फिर तौबा करते हैं और फिर गुनाह की ओर पलट जाते हैं .. तो हम आपसे कहते हैं कि यद्यपि आप गुनाह की ओर बार-बार लौट आते हैं परंतु आप अधिक से अधिक तौबा करें और अपने शैतान को मात दे दें जो आपके विनाश की प्रतीक्षा करता है, और इस बात को जान लें कि "अल्लाह सर्वशक्तिमान रात के समय अपने हाथ को फैलाता ताकि दिन के समय पाप करने वाला तौबा (पश्चाताप) कर ले, तथा दिन के समय अपने हाथ को फैलाता है ताकि रात के समय पाप करने वाला तौबा (पश्चाताप) कर ले यहाँ तक कि सूरज पश्चिम से निकल आए।" इसे मुस्लिम (हदीस संख्या: 2759) ने रिवायत किया है।

तथा तौबा (पश्चाताप) का द्वार खुला हुआ है, अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्हों ने कहा: अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: "जिस व्यक्ति ने सूरज के पश्चिम से निकलने से पूर्व तौबा कर लिया तो अल्लाह तआला उसकी तौबा को स्वीकार कर लेगा।" इसे मुस्लिम (हदीस संख्या: 2703) ने रिवायत किया है।

तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: "अल्लाह तआला बंदे की तौबा (पश्चाताप) उस समय तक स्वीकार करता है जब तब कि उसकी जान गले में न पहुँच जाये।" (अर्थात् उसे अपनी मृत्यु का विश्वास हो जाये) इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है और अल्बानी ने सहीह तिर्मिज़ी (हदीस संख्या: 802) में इसे हसन कहा है।

लेकिन ऐ मुसलमान, आप इस बात को अच्छी तरह जान लें कि तौबा की कुछ शर्तें हैं जिनका तौबा के अंदर मौजूद होना ज़रूरी है ताकि तौबा धार्मिक रूप से शुद्ध हो, जिन्हें आप प्रश्न संख्या (13990) में विस्तार के साथ पायेंगे। तथा प्रश्न संख्या (5092) को भी देखना महत्वपूर्ण है।

अंत में हम आप को वसीयत करते हैं कि अपने नफ्से अम्मारह (बुराई का आदेश देने वाले नफ्स) से संघर्ष करें और उसके शर्र (बुराई) और मर्दूद शैतान की बुराई से अल्लाह के शरण में आ जायें। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने नफ्स के शर्र और शैतान के शर्र और उसके र्शिक से अल्लाह तआला की पनाह मांगते (शरण ढूंढ़ते) थे, जैसाकि हदीस में है: "मैं तेरे शरण में आता हूँ अपने नफ्स की बुराई तथा शैतान की बुराई और उसके शिर्क से।" (अल्बानी ने अस्सिलसिला अस्सहीहा (हदीस संख्या: 2753) में इसे सहीह कहा है)

फिर आप के ऊपर अनिवार्य है कि पाप (अवज्ञा) के कारणों से दूर रहें। अल्लाह तआला ने ज़िना (व्यभिचार) के निकट जाने से डराया है जैसाकि उसके इस फरमान में है कि [ وَلا تَقْرَبُوا الزِّنَى ]   ((और व्यभिचार के निकट भी न जाओ)), और यह व्यभिचार की ओर ले जाने वाले कारणों से दूर रहकर होगा।

तथा अल्लाह तआला से विनती करें और प्रार्थना के साथ आग्रह करें कि वह आपको तौफीक़ प्रदान करे और आपके पाप को मिटा दे तथा आप को तक़्वा (ईश्भय और धर्मनिष्ठता) से सम्मानित करे।

हम अल्लाह से प्रार्थना करते हैं कि वह हम सभी पर सच्ची तौबा के साथ उपकार करे, तथा हर प्रकार की स्तुति और गुणगान केवल सर्वसंसार के पालनहार के लिए योग्य है।

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।
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