Thu 24 Jm2 1435 - 24 April 2014
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जादू लगने से पूर्व उस से बचाव के शरई (धार्मिक) उपाय

वो कौन से शरई साधन और उपाय हैं जिन के द्वारा जादू से उसके लगने से पहले बचा जा सकता है?

हर प्रकार की प्रशंसा और स्तुति अल्लाह के लिए योग्य है।

जादू लगने से पहले उस के खतरे से बचाव के सब से महत्व पूर्ण साधनों में से शरई ज़िक्र व अज़कार, दुआओं और शरीअत में निर्धारित पनाह देने वाली सूरतों के द्वारा अपने आप को सुरक्षित और क़िलाबन्द करना है, जिन में से कुछ निम्नलिखित हैं :

1- हर फर्ज़ नमाज़ के पीछे सलाम फेरने के बाद मस्नून अज़कार पढ़ने के बाद आयतुल कुर्सी पढ़ना।

2- इसी तरह सोते समय आयतुल कुर्सी पढ़ना, और आयतुल कुर्सी क़ुर्आन करीम की सब से महान आयत है, वह अल्लाह तआला का यह फरमान है :

اللهُ لا إِلَهَ إِلا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ لا تَأْخُذُهُ سِنَةٌ وَلا نَوْمٌ لَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الأَرْضِ مَنْ ذَا الَّذِي يَشْفَعُ عِنْدَهُ إِلا بِإِذْنِهِ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلا يُحِيطُونَ بِشَيْءٍ مِنْ عِلْمِهِ إِلا بِمَا شَاءَ وَسِعَ كُرْسِيُّهُ السَّمَاوَاتِ وَالأَرْضَ وَلا يَئُودُهُ حِفْظُهُمَا وَهُوَ الْعَلِيُّ الْعَظِيمُ

"अल्लाह (तआला) ही सच्चा पूज्य है, जिसके अलावा कोई पूज्य नहीं, जो ज़िन्दा है और सब का थामने वाला है, जिसे न ऊँघ आये न नींद, उस की मिल्कियत में धरती और आकाश की सभी चीज़ें हैं, कौन है जो उसके हुक्म के बिना उसके सामने सिफारिश कर सके, वह जानता है जो उनके सामने है और जो उनके पीछे है और वह उसके इल्म में से किसी चीज़ का घेरा नहीं कर सकते, लेकिन वह जितना चाहे। उसकी कुर्सी के विस्तार ने धरती और आकाशों को घेर रखा है, वह अल्लाह उनकी हिफाज़त से न थकता है और न ऊबता है, वह तो बहुत महान और बहुत बड़ा है।" (सूरतुल बक़रा : 255)

3- इसी प्रकार हर फर्ज़ नमाज़ के बाद "क़ुल हुवल्लाहु अहद" , "क़ुल अऊज़ो बिरिब्बल फलक़" और "क़ुल अऊज़ो बिरिब्बन्नास" पढ़ना, तथा इन तीनों सूरतों को दिन के शुरू में फज्र के बाद और रात के शुरू में मग्रिब के बाद तीन बार पढ़ना।

4- इसी तरह रात के प्रथम भाग में सूरतुल बक़रा की अंतिम दो आयतें पढ़ना, और वे अल्लाह तआला का यह फरमान हैं :

آمَنَ الرَّسُولُ بِمَا أُنْزِلَ إِلَيْهِ مِنْ رَبِّهِ وَالْمُؤْمِنُونَ كُلٌّ آمَنَ بِاللهِ وَمَلائِكَتِهِ وَكُتُبِهِ وَرُسُلِهِ لا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍ مِنْ رُسُلِهِ وَقَالُوا سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا غُفْرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيْكَ الْمَصِيرُ لا يُكَلِّفُ اللهُ نَفْسًا إِلا وُسْعَهَا لَهَا مَا كَسَبَتْ وَعَلَيْهَا مَا اكْتَسَبَتْ رَبَّنَا لا تُؤَاخِذْنَا إِنْ نَسِينَا أَوْ أَخْطَأْنَا رَبَّنَا وَلا تَحْمِلْ عَلَيْنَا إِصْرًا كَمَا حَمَلْتَهُ عَلَى الَّذِينَ مِنْ قَبْلِنَا رَبَّنَا وَلا تُحَمِّلْنَا مَا لا طَاقَةَ لَنَا بِهِ وَاعْفُ عَنَّا وَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا أَنْتَ مَوْلانَا فَانْصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ

"रसूल उस चीज़ पर ईमान लाये जो उनकी तरफ अल्लाह तआला की ओर से उतारी गयी और मुसलमान भी ईमान लाये। यह सब अल्लाह तआला और उसके फरिश्तों पर, और उसकी किताबों पर, और उसके रसूलों पर ईमान लाये, उस के रसूलों में से किसी के बीच हम फर्क़ नहीं करते, उन्हों ने कहा कि हम ने सुना और पैरवी की, हम तुझ से माफी चाहते हैं। हे हमारे रब! और हमें तेरी ही तरफ लौटना है। अल्लाह किसी भी आत्मा (नफ़्स) पर उस की ताक़त से अधिक बोझ नहीं डालता, जो सवाब वह करे वह उस के लिए है और जो बुराई वह करे वह उसी पर है। हे हमारे रब! अगर हम भूल गये हों या गलती की हो तो हमें न पकड़ना। हे हमारे रब! हम पर वह बोझ न डाल जो हम से पहले लोगों पर डाला था। हे हमारे रब! हम पर वह बोझ न डाल जो हमारी ताक़त में न हो और हमें माफ कर दे, और हमें क्षमा प्रदान कर, और हम पर दया कर, तू ही हमारा मालिक है, हमें काफिर क़ौम पर विजय प्रदान कर।" (सूरतुल बक़रा : 285, 286)

अल्लाह के पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सहीह हदीस में प्रमाणित है कि आप ने फरमाया :"जिस ने किसी रात आयतुल कुर्सी पढ़ी तो निरंतर अल्लाह की ओर से उस पर एक संरक्षक नियुक्त रहता है और सुबह होने तक कोई शैतान उसके निकट नहीं जाता।"

तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से यह भी प्रमाणित है कि आप ने फरमाया : "जिस ने किसी रात सूरतुल बक़रा की अन्तिम दो आयतें पढ़ीं तो वे (आयतें) उस के लिए काफी हो जायेंगी।"

इसका अर्थ यह है -और सर्वश्रेष्ठ ज्ञान अल्लाह ही के पास है- कि वे उसके लिए हर बुराई से काफी हो जायेंगी।

5- इसी तरह रात और दिन में, और किसी भी स्थान पर उतरते समय चाहे आबादी में हो, या रेगिस्तान, या अन्तरिक्ष, या समुद्र में, अल्लाह तआला के सम्पूर्ण कलिमात के द्वारा उसकी मख्लूक़ की बुराई से अधिक से अधिक शरण मांगना, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : "जो आदमी किसी जगह उतरा (पड़ाव डाला) और यह दुआ पढ़ी :

"अऊज़ो बि-कलिमातिल्लाहित्ताम्माते मिन् शर्रे मा खलक़" (यानी मैं अल्लाह के सम्पूर्ण कलिमात की शरण में आता हूँ उस चीज़ की बुराई से जिसे उस ने पैदा किया है।) तो कोई चीज़ उसे नुक़सान नहीं पहुँचायेगी यहाँ तक कि वह अपने उस ठिकाने से प्रस्थान कर जाये।"

6- और उसी में से यह भी है कि : मुसलमान रात और दिन के शुरू में तीन बार यह दुआ पढ़े :

"बिस्मिल्लाहिल्लज़ी ला यज़ुर्रो म'अ़स्मिही शैयुन् फ़िल् अर्ज़ि वला फ़िस्समा व-हुवस्स- मीउल् अ़लीम" (शुरू अल्लाह के नाम से जिसके नाम के साथ धरती और आकाश में कोई चीज़ नुक़्सान नहीं पहुँचा सकती और वह सुनने वाला जानने वाला है।)

क्योंकि सहीह हदीस में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इसकी रूचि दिलाई है, और यह कि ये हर बुराई से सुरक्षा का कारण है।

ये अज़कार व दुआयें और शरण मांगने वाली सूरतें, उस आदमी के लिए जादू और अन्य दूसरी बुराईयों से बचाव के महान कारणों में से हैं, जो सच्चाई और ईमानदारी के साथ, तथा अल्लाह पर भरोसा और एतमाद करते हुये, और जिन चीज़ों पर ये दलालत करती हैं उन पर खुले दिल से विश्वास रखते हुये नियमित रूप से इनका पाठ करे।

इसी तरह ये जादू लग जाने के बाद भी जादू का निवारण करने के लिए एक बहुत बड़ा (प्रभावी) हथियार हैं, इसके साथ ही साथ अधिक से अधिक अल्लाह तआला से गिड़गिड़ाना और उस से यह प्रश्न करना चाहिए कि नुक़सान को हटा दे और संकट को दूर कर दे।

इसी तरह बीमारियों और जादू वगैरा के उपचार के विषय में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित दुआओं में से जिनके द्वारा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने सहाबा पर दम किया करत थे, यह दुआ है:

"अल्लाहुम्मा रब्बन्नास, अज़्हिबिल्बास वश्फ़ि अन्तश्शाफ़ी, ला शिफ़ाआ इल्ला शिफ़ाउक्, शिफ़ाअन् ला युग़ादिरो सक़मा"

( ऐ अल्लाह, लोगों के रब! कष्ट को दूर कर दे, और स्वास्थ्य प्रदान कर, तू ही स्वास्थ्य प्रदान करने वाला है, तेरे रोग निवारण के अलावा कोई रोग निवारण नहीं, ऐसा रोग निवारण (स्वास्थ्य) प्रदान कर कि कोई बीमारी बाक़ी न रहे।)

और इसी में से वह दम (झाड़-फूँक) भी है जिसके द्वारा जिब्रील अलैहिस्सलाम ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दम किया था, और वह निम्नलिखित है :

"बिस्मिल्लाहि अर्क़ीक, मिन कुल्ले शैइन यू'ज़ीक, व मिन शर्रे कुल्ले नफ़्सिन् औ ऐ़निन् ह़ासिदिन्, अल्लाहु यश्फ़ीक, बिस्मिल्लाहि अर्क़ीक "

(मैं अल्लाह के नाम से तुझ पर दम करता हूँ हर उस चीज़ से जो तुझे कष्ट पहुँचाती है, और हर नफ्स की बुराई से या हसद करने वाली आँख से, अल्लाह तुझे शिफा दे, मैं अल्लाह के नाम से तुझ पर दम करता हूँ।)

इस दुआ को तीन बार दोहराना चाहिये। और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ जानने वाला है।

शैख अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़ रहिमहुल्लाह की किताब "मजमूअ़ फतावा व मक़ालात" भाग- 8
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