33757: बुराई को हाथ से बदलना


क्या बुराई को हाथ से बदला जायेगा ? और हाथ से बुराई का बदलना किसकी ज़िम्मेदारी है ?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

अल्लाह सर्वशक्तिमान ने ईमान वालों का वर्णन इस गुण के साथ किया है कि वे बुराई का खण्डन करते हैं और नेकी व भलाई का आदेश देते हैं। अल्लाह तआला ने फरमाया :

﴿الْمُؤْمِنُونَ وَالْمُؤْمِنَاتُ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ يَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ ﴾ [التوبة : 71]

‘‘मोमिन पुरूष और महिलाएं आपस में एक दूसरे के दोस्त हैं, वे भलाई का आदेश देते हैं और बुराई से रोकते हैं।’’ (सूरतुत्तौबा : 71)

तथा एक दूसरे स्थान पर फरमाया :

  ﴿وَلْتَكُنْ مِنْكُمْ أُمَّةٌ يَدْعُونَ إِلَى الْخَيْرِ وَيَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ ﴾ [آل عمران : 104]

और तुम में से एक गिरोह ऐसा होना चाहिए, जो भलाई की ओर बुलाए और नेक कामों का हुक्म दे और बुरे कामों से रोके।’’ (सूरत आल इमरान: 104).

तथा अल्लाह तआला ने फरमाया :

﴿ كنْتُمْ خَيْرَ أُمَّةٍ أُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ تَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَتَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ ﴾ [ آل عمران : 110].

‘‘तुम सबसे अच्छी उम्मत हो जो लोगों के लिए निकाली गई है कि तुम नेक कामों का आदेश करते हो और बुरे कामों से रोकते हो।’’ (सूरत आल-इमरान : 110)

भलाई व नेकी का हुक्म देने और बुराई से रोकने के बारे में आयतें बहुत अधिक हैं। और यह केवल उसके महत्व और उसकी सख्त ज़रूरत की वजह से है।

तथा सही हदीस में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फरमाते हैं :

‘‘तुम में से जो व्यक्ति कोई बुराई देखे तो उसे अपने हाथ से बदल दे। यदि वह इसमें सक्षम नहीं है तो अपनी ज़ुबान से बदले। यदि वह इसकी ताक़त न रखे तो अपने दिल से खण्डन करे। और यह सबसे कमज़ोर ईमान है।’’ इसे मुस्लिम ने अपने सहीह में रिवायत किया है।

हाथ से खण्डन करना उस व्यक्ति के हक़ में है जो इसकी ताक़त रखता है जैसे कि शासक, इसके लिए विशिष्ट समिति - सरकारी अधिकारी - उन चीज़ों के अंदर जिसका उन्हें अधिकार दिया गया है, तथा हिस्बा के कार्यकर्ता अपने अधिकार क्षेत्र के अंदर, अमीर अपने शासन क्षेत्र में, तथा क़ाज़ी – न्यायाधीश - अपने कार्य क्षेत्र में, तथा इन्सान अपने घर में अपने बच्चों और अपने घरवालों के साथ जिन चीज़ों में वह सक्षम है।

लेकिन जो व्यक्ति इसकी ताक़त नहीं रखता है, या यदि उसने उस बुराई को हाथ से बदल दिया तो इस पर फित्ना (विद्रोह और बवाल) खड़ा हो जायेगा, तथा मतभेद और मारपीट निष्कर्षित होगा, तो वह उसे अपने हाथ से नहीं बदले गा। बल्कि वह अपनी ज़ुबान से उसका खण्डन और निंदा करेगा। और इतना करना उसके लिए काफी है ताकि उसके अपने हाथ के द्वारा उसका खण्डन करने की वजह से ऐसी चीज़ घटित न हो जो उस बुराई बढ़कर बुरी हो जिसका उसने इनकार किया है। जैसा कि विद्वानों ने इस बात को स्पष्टता के साथ वर्णन किया है। उसके लिए इतना काफी है कि वह अपनी ज़ुबान से इनकार करे। चुनांचे वह कहे : ऐ मेरे भाई! अल्लाह से डरो, ऐसा करना जायज़ नहीं। इसे छोड़ देना ज़रूरी है, इसे करना वाजिब है, इसके समान अन्य अच्छे शब्द और अच्छी शैली में।

फिर ज़ुबान के बाद दिल से निंदा करने की श्रेणी है। अर्थात वह अपने दिल से उस बुराई को नापसंद करे। वह अपनी नापसंदी को प्रकट करे और ऐसे लोगों के साथ न बैठे। तो यह उसका अपने दिल से इनकार करना है ... और अल्लाह तआला ही तौफीक़ प्रदान करने वाला है।

शैख अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ के फतावा से। ‘‘मजल्लतुल बुहूसिल इस्लामिया’’ 36/121-122
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