Wed 23 Jm2 1435 - 23 April 2014
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क्या यूरोपीय परिषद का पालन करें यद्यपि वह खगोलीय गणना पर चलती हो?

हम, ब्रिटेन में एक इस्लामी केन्द्र के प्रबंधन, यह चाहते हैं कि अपने केन्द्र में नमाज़ियों के लिए पवित्र रमज़ान के महीने की शुरूआत और अन्त की एक तिथि निर्धारित कर दें, हमारा लक्ष्य मुसलमानों को एकजुट करने का प्रयास है इस प्रकार कि इस विषय पर उनके विचार को एकजुट करने के लिए हम हर सम्भव प्रयास करते हैं, उन में से कुछ का दृष्टिकोण चाँद के दर्शन का एतिबार करना है, और कुछ लोगों का विचार खगोलीय गणना का पालन करने का है। और यूरोपीय फत्वा परिषद का भी इस विषय में एक विचार है, जबकि ज्ञात होना चाहिए कि यूरोप में मुसलमानों के लिए यही परिषद फत्वा जारी करती है।
हमारा प्रश्न यह है कि :
क्या हमें यूरोपीय परिषद का पालन करना चाहिए यद्यपि वह खगोलीय गणना पर चलती हो? या कि हम ने अपने नगर की मिस्जदों में मुसलमानों को एकजुट करने का जो प्रयास किया है उसी पर बाक़ी रहें यद्यपि वह यूरोपीय परिषद के विचार के विरूद्ध हो?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

रमज़ान के महीने की शुरूआत या उसके अन्त को सिद्ध करने के लिये खगोलीय गणना पर अमल करना जाइज़ नहीं है, अनिवार्य यह है कि चाँद के देखने पर अमल किया जाये जैसाकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है : "उसे (चाँद) देख कर रोज़ा रखो और उसे (चाँद) देख कर रोज़ा रखना बंद करो।" इस हदीस को बुखारी (हदीस संख्या: 1909) और मुस्लिम (हदीस संख्या: 1081) ने रिवायत किया है। प्रश्न संख्या (1602) देखिये।

इस बात पर मुसलमानों की सर्वसम्मति है कि जब आसमान साफ हो तो चाँद के दर्शन को छोड़ कर खगोलीय गणना पर अमल करना जाइज़ (वैध) नहीं है, परन्तु अगर आसमान में बादल हो तो कुछ विद्वानों ने विरलता अपनाते हुए (सर्व बहुमत का विरोध करते हुए) केवल खगोल ज्ञानी के लिए खगोलीय गणना पर अमल करना वैध किया है।

शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिय्या रहिमहुल्लाह फरमाते हैं :

"इस्लमाम धर्म में हम इस बात को आवश्यक रूप से जानते हैं कि रोज़ा, या हज्ज, या इद्दत, या ईला (बीवी से संभोग न करने की क़सम खाने) या इनके अतिरिक्त अन्य अहकाम जो चाँद पर आधारित हैं उनके लिए चाँद के देखने के बारे में खगोल विज्ञानी की सूचना कि चाँद दिखायी देगा या दिखायी नहीं देगा, पर अमल करना जाइज़ नहीं है। इस संबंध में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से बहुत सारे नुसूस प्रमाणित हैं, और मुसलमानों की इस पर सर्वसम्मति है, और इस विषय में प्राचीन समय में बिल्कुल किसी मतभेद का पता नहीं चलता है, और आधुनिक समय में भी कोई मतभेद नहीं है, सिवाय इसके कि तीसरी शताब्दी के बाद अपने आपको धर्म-शास्त्री (फुक़हा) कहलाने वाले नये लोगों में से कुछ का यह भ्रम है कि जब चाँद पर बदली छा जाये तो खगोल विज्ञानी के लिए वैध है कि वह स्वयं अपने बारे में खगोलीय गणना पर अमल करे, अगर खगोलीय गण्ना से चाँद के देखे जाने का पता चलता है तो रोज़ा रखे, अन्यथा नहीं।

यह कथन यद्यपि आसमान पर बदली होने के साथ और खगोल विज्ञानी के साथ विशिष्ट है, परन्तु वह एक विरल कथन है और इस से पहले उसके विरूद्ध पर इज्माअ़ (सर्व मुसलमानों का इति्तफाक़) स्थापित हो चुका है, जहाँ तक इस कथन का आसमान साफ होने की हालत में अनुपालन करने, या इस पार सामान्य हुक्म आधारित करने का प्रश्न है, तो इस तरह की बात किसी मुसलमान ने भी नहीं कही है।" (मजमूउल फतावा 25/132)

इस आधार पर आप लोगों के लिए उक्त परिषद का पालन करना जाइज़ नहीं है यदि वह खगोलीय गणना पर भरोसा करती है और चाँद देखने को आधार नही बनाती है।

तथा आप लोगों को चाँद देखने पर अमल करना चाहिए जैसाकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का आदेश है और इसी पर मुसलमानों की सर्वसम्मति है।

अल्लाह तआला आप लोगों को उस चीज़ की तौफीक़ दे जिस से वह प्यार करता और खुश होता है।

और अल्लाह ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।

इस्लाम प्रश्न और उत्तर
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