Fri 18 Jm2 1435 - 18 April 2014
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हज्ज की तात्कालिक अनिवार्यता

क्या हज्ज पर सक्षम आदमी के लिए कई वर्षों तक हज्ज को विलंब करना जाइज़ है ?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

जो आदमी हज्ज करने की ताक़त रखता है और उसके अंदर हज्ज के अनिवार्य होने की शर्तें पूरी हैं, तो उस पर तत्कालीन हज्ज करना अनिवार्य है, और उसके लिए उसे विलंब करना जाइज़ नहीं है।

इब्ने क़ुदामा रहिमहुल्लाह ने "अल-मुग़्नी" में फरमाया:

"जिस आदमी पर हज्ज वाजिब हो गया और उसके लिए उसको करना संभव है, तो उस पर वह तत्कालीन ही अनिवार्य है और उसके लिए उसे विलंब करना जाइज़ नहीं है। यही बात इमाम अबू हनीफा और इमाम मालिक ने भी कही है। इस कथन का आधार अल्लाह तआला का यह फरमान है:

﴿وَلِلهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًا وَمَنْ كَفَرَ فَإِنَّ اللهَ غَنِيٌّ عَنِ الْعَالَمِينَ  ﴾  [آل عمران : 97]

"अल्लाह तआला ने उन लोगों पर जो उस तक पहुँचने का सामर्थ्य रखते हैं इस घर का हज्ज करना अनिवार्य कर दिया है, और जो कोई कुफ्र करे (न माने) तो अल्लाह तआला (उस से बल्कि) सर्व संसार से बेनियाज़ है।" (सूरत आल-इम्रान: 97)

और अम्र (अर्थात् आदेश) तुरंत करने के लिए होता है। तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित है कि आपने फरमाया: "जो आदमी हज्ज का इरादा करे तो उसे जल्दी करनी चाहिए।" इसे इमाम अहमद, अबू दाऊद और इब्ने माजा ने रिवायत किया है। तथा अहमद और इब्ने माजा की रिवायत में है कि: "क्योंकि आदमी बीमारी से ग्रस्त हो सकता है, सवारी गायब हो सकती है और आदमी को कोई आवश्यकता घेर सकती है।" अल्बानी ने सहीह इब्ने माजा में इसे हसन कहा है।" कुछ संशोधन के साथ अंत हुआ।

अम्र (आदेश) के तत्कालीन होने का अर्थ यह है कि: मुकल्लफ आदमी के ऊपर उस चीज़ को करना जिसका उसे आदेश दिया गया है मात्र उसके करने पर सक्षम होतो ही करना अनिवार्य है, और उसके लिए बिना किसी उज़्र (कारण) के उसे विलंब करना जाइज़ नहीं है।

तथा शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह से प्रश्न किया गया कि: क्या हज्ज की अनिवार्यता तत्कालीन है या विलंब के साथ है ?

तो उन्हों ने उत्तर दिया:

"सहीह बात यह है कि वह तत्कालीन अनिवार्य है, और यह कि उस मनुष्य के लिए जो अल्लाह के पवित्र घर का हज्ज करने पर सक्षम है, उसे विलंब करना जाइज़ नहीं है। इसी प्रकार सभी शरई वाजिबात (धार्मिक कर्तव्य) यदि वे किसी समय या कारण के साथ मुक़ैयद नहीं हैं तो वे तत्कालीन (तुरंत) ही अनिवार्य हैं।"

फतावा इब्ने उसैमीन (21/13).

इस पर उसी का गुणगान और आभार है।
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