Thu 24 Jm2 1435 - 24 April 2014
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ज़कात के मसारिफ (खर्च करने की जगहें)

वो कौन से मसारिफ (जगहें) हैं जिन में ज़कात खर्च करना अनिवार्य है।

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

"जिन जगहों में ज़कात खर्च करना अनिवार्य है वे आठ हैं, जिन्हें अल्लाह तआला ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है, तथा सर्वशक्तिमान अल्लाह तआला ने यह सूचना दी है कि यह अनिवार्य है और ज्ञान और तत्वदर्शिता पर आधारित है, सर्वशक्तिमान अल्लाह ने फरमाया : "ख़ैरात (ज़कात) तो बस फकीरों का हक़ है और मिसकीनों का और उस (ज़कात) के कर्मचारियों का और जिनके दिल परचाये जा रहे हों और गुलाम के आज़ाद करने में और क़र्ज़दारों के लिए और अल्लाह की राह (जिहाद) में और मुसाफिरों के लिए, ये हुकूक़ अल्लाह की तरफ से मुक़र्रर किए हुए हैं और अल्लाह तआला बड़ा जानकार हिकमत वाला है।" (सूरतुत्तौबा :60)

ये आठ प्रकार के लोग हैं जो ज़कात के हक़दार लोग है जिन्हें ज़कात दी जायेगा।

पहला और दूसरा : फुक़रा और मसाकीन (गरीब और जरूरतमंद लोगों) के लिए, इन लोगों को इन की ज़रूरतों और आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ज़कात की राशि में से दिया जायेगा, फुक़रा और मसाकीन के बीच अंतर यह है कि : फक़ीर लोग सख्त ज़रूरतमंद होते हैं, जिन के पास उनकी और उन के परिवार की किफायत भर की रोज़ी का आधा भी नहीं होता है। तथा मिसकीन लोग फक़ीरों से अच्छी स्थिति वाले होते हैं ; क्योंकि इन के पास इन की किफायत भर की रोज़ी का आधा या उस से अधिक होता है, परन्तु किफायत भर की पूरी रोज़ी इनके पास भी नहीं होती है। इन लोगों को इन की आवश्यकता के अनुसार दिया जायेगा।

किन्तु हम आश्यकता का मूल्यांकन कैसे करेंगे ?

विद्वानों का कहना है कि : इन लोगों को ज़कात की राशि से इतना दिया जायेगा जो इन के और इन के परिवार के एक साल की आवश्यकता के लिए काफी हो। क्योंकि जब साल पूरा हो जाता है तो मालों में ज़कात अनिवार्य होती है, तो जिस तरह उस समय को निर्धारित करने के लिए जिस में ज़कात अनिवार्य होती है साल के बीतने को आधार बनाया गया है, उसी तरह फुक़रा व मसाकीन जो ज़कात के हक़दार लोग हैं उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने के समय का अनुमान करने के लिए साल के बीतने को आधार बनाना उचित है। यह एक अच्छा विचार है अर्थात् हम फक़ीर और मिसकीन को उस की और उस के परिवार की पूरे एक साल की आवश्यकता के लिए पर्याप्त राशि प्रदान करें, चाहे हम उसे भोजन और कपड़ों के रूप में दें, या हम उसे पैसे दें जिन से वह अपने लिए उपयुक्त सामान खरीद सके, या हम उसे कारीगरी का सामान दे दें यदि वह कारीगरी करता है, जैसे कि दर्ज़ी, या लोहार, या बढ़ई वगैरा। महत्वपूर्ण बात यह है कि हम उसे इतनी राशि दें जो उस के और उस के परिवार के लिए एक साल के लिए पर्याप्त हो।

तीसरा : ज़कात के कर्मचारी : अर्थात वो लोग जिन्हें शासन अधिकारियों की तरफ से उस पर नियुक्त किया गया है, इसीलिए अल्लाह तआला ने फरमाया है : "और उस पर काम करने वाले।" (सूरतुत्तौबा : 60) यह नहीं फरमाया कि : उस में काम करने वाले। इस से इंगित होता है कि उन्हें अधिकार प्राप्त है, और इस से मुराद ज़कात की वसूली करने वाले हैं जो ज़कात वालों से उस की वसूली करते हैं, और उस के वितरक हैं जो ज़कात के हक़दार लोगों में उसे आवंटित करतें हैं, तथा उसके लिखने वाले इत्यादि हैं, ये लोग उस पर कार्यरत हैं इन्हें ज़कात की राशि से दिया जायेग।

किन्तु इन्हें ज़कात से कितना दिया जायेगा ?

ज़कात पर कार्यरत लोग अपने कार्य करने के स्वरूप में ज़कात के हक़दार बनते हैं, और जो आदमी किसी स्वरूप में ज़कात का हक़दार बना है उसे उस स्वरूप की मात्रा में ही ज़कात दी जायेगी, इस आधार पर ज़कात के कर्मचारी अपने कार्य के अनुसार ज़कात की राशि से दिये जायेंगे, चाहे वे मालदार हों या गरीब, क्योंकि ये लोग अपने कार्य (श्रम) के कारण ज़कात लेते हैं अपनी आवश्यकता के कारण नहीं, इस आधार पर वे अपने कार्य की अपेक्षा के अनुसार ज़कात दिये जायेंगे। यदि ऐसा होता है कि ज़कात पर कार्यरत लोग गरीब हैं, तो उन्हें उन के काम करने की वजह से भी दिया जायेगा, तथा उनकी गरीबी के कारण भी उन्हें एक साल की आवश्यकता भर दिया जायेगा। इसलिए कि वे दो कारणों से ज़कात के हक़दार हैं : उस पर कार्य करने और गरीबी के कारण, अत: उन्हें दोनों कारणों से दिया जायेगा, लेकिन जब हम उन्हें उनके कार्य करने की वजह से ज़कात दें और उनकी साल भर की ज़रूरत पूरी न हो, तो हम उन के लिए साल भर के खर्च को पूरा कर देंगे, इस का उदाहरण यह है कि : यदि मान लिया जाये कि दस हज़ार रियाल उन के एक साल के लिये काफी है, और जब हम उन्हें उनकी गरीबी के कारण देंगे तो वे दस हज़ार रियाल पायेंगे, और ज़कात पर कार्य करने के कारण उन का हिस्सा दो हज़ार होगा, इस आधार पर हम उन्हें दो हज़ार रियाल काम करने के कारण देंगे और आठ हज़ार रियाल उन की गरीबी के कारण देंगे।

चौथा : मुअल्लफ़तुल् क़ुलूब : ये वो लोग हैं जिन्हें इस्लाम की ओर आकर्षित करने के लिये दिया जाता है : या तो वह एक काफिर है जिस के इस्लाम स्वीकार करने की आशा की जाती है, या एक मुसलमान है जिसे हम उस के दिल में ईमान को मज़बूत करने के लिए देते हैं, या वह एक दुष्ट आदमी है जिसे हम मुसलमानों से उस की बुराई को दूर करने के लिए देते हैं, या इसी के समान कोई अन्य व्यक्ति जिस की दिलजोई में मुसलमानों का कोई हित हो।

किन्तु क्या इस में इस बात की शर्त है कि वह आदमी अपनी क़ौम में ऐसा नेता हो जिस की बात मानी जाती हो ताकि उस की दिलजोई में कोई सार्वजनिक हित हो, या यह कि उस की दिलजोई के लिए देना जाइज़ है चाहे वह उस के व्यक्तिगत हित के लिए ही क्यों न हो, जैसे कि कोई आदमी इस्लाम में नया नया प्रवेश किया हो और उसे ज़कात देकर उस की दिलजोई और उसके ईमान की शक्ति की आवश्यकता हो ?

यह मुद्दा विद्वानों के बीच विवादस्पद है, और मेरे निकट शुद्ध राय यह है कि : उस के ईमान को मज़बूत बनाने के उद्देश्य से इस्लाम पर उस की दिलजोई के लिए उसे ज़कात देने में कोई बात नहीं है,भले ही उस को व्यक्तिगत स्तर पर क्यों न दिया जा रहा हो और वह अपनी क़ौम के बीच एक सरदार न हो, क्योंकि अल्लाह तआला का यह फरमान : "और जिनके दिल परचाये जा रहे हों।" सामान्य है, और इसलिए भी कि जब हमारे लिए एक फक़ीर को उसकी शारीरिक (भौतिक) आवश्यकता के लिए देना जाइज़ है, तो फिर हमारे लिए इस कमज़ोर ईमान वाले आदमी को उसके ईमान को मज़बूत बनाने के लिये ज़कात देना और अधिक योग्य है ; क्योंकि एक व्यक्ति के लिए विश्वास (ईमान) को मज़बूत बनाना शरीर के लिए भोजन से अधिक महत्वपूर्ण है।

ये चार लोग स्वामित्व के तौर पर ज़कात दिये जायेंगे, और उस के पूर्ण रूप से मालिक हो जायेंगे यहाँ तक कि यदि साल के बीच ही में वह कारण समाप्त हो जाये जिस की वजह से वे ज़कात के हक़दार हुये हैं, तो उन पर ज़कात को वापस लौटाना अनिवार्य नहीं है, बल्कि वह उन के लिए हलाल रहेगी, अल्लाह तआला ने उनके ज़कात की पात्रता को "लाम" (जो कि अरबी भाषा में स्वामित्व को दर्शाने के लिए आता है) के द्वारा वर्णन किया है, अल्लाह तआला ने फरमाया : "इन्नमस-सदक़ातो लिल-फुक़राये वल-मसाकीने वल-आमिलीना अलैहा वल-मुअल्लफते क़ुलूबुहुम" (ख़ैरात (ज़कात) तो बस फकीरों और मिसकीनों और उस (ज़कात) के कर्मचारियों और उन के लिये है जिनके दिल परचाये जा रहे हों।) अल्लाह तआला ने यहाँ लाम (अर्थात लिये) का प्रयोग किया है, और इस का फायदा यह है कि : यदि फक़ीर साल के बीच ही में मालदार हो जाये तो उस के लिए ज़कात को वापस लौटाना अनिवार्य नहीं है, उदाहरण के तौर पर अगर हम उसकी गरीबी के कारण उसे दस हज़ार रियाल दें जो कि उस के एक साल के लिए काफी है, फिर अल्लाह तआला ने उसे साल के बीच ही में कोई धन कमाने, या किसी निकट संबंध वाले आदमी के मर जाने पर उस के धन को विरासत में पाने या इसी तरह किसी और वजह से मालदार कर दिया, तो उस के लिए ज़रूरी नहीं है कि उस के पास ज़कात से लिये हुये माल में से जो कुछ बाक़ी बचा है उसे वापस लौटा दे ; क्योंकि यह उसकी मिल्कियत और संपत्ति है।

ज़कात के हक़दार लोगों में से पाँचवा वर्ग : गर्दन छुड़ाना (गुलाम आज़ाद करना) है, क्योंकि अल्लाह तआला का फरमान है : "और गर्दन छुड़ाने में" (सूरतुत्तौबा : 60) विद्वानों ने गर्दन छुड़ाने की व्याख्या तीन चीज़ों के द्वारा की है :

पहला : मुकातब गुलाम जिस ने अपने आप को अपने मालिक से कुछ डिरहमों (पैसों) के बदले खरीद लिया है जिन की अदायगी उस के ज़िम्मे है, तो उसे ज़कात से इतनी राशि दी जायेगी जिस से वह अपने मालिक का भुगतान कर सके।

दूसरा : किसी का कोई गुलाम जिसे ज़कात से खरीद कर आज़ाद कर दिया जाये।

तीसरा : कोई मुसलमान बंदी (क़ैदी) जिसे काफिरों ने बंदी बना लिया हो, तो काफिरों को इस क़ैदी को आज़ाद करने के बदले ज़कात से दिया जायेगा। इसी तरह अपहरण पर भी यह लागू होता है, चुनाँचि अगर कोई काफिर या मुस्लिम, किसी मुसलमान का अपहरण कर ले तो उस अपहरण किये गये आदमी को ज़कात के कुछ माल के द्वारा छुड़ाने में कोई बात नहीं है, क्योंकि कारण एक ही है, और वह है मुसलमान को क़ैद से छुड़ाना, और यह ऐसी सूरत में लागू होता है जब मुसलमान अपहरण कर्ता को बिना धन दिये हुये उसे छोड़न पर मजबूर करना हमारे लिए संभव न हो।

छठा : क़र्ज़दार (ऋणी) : उलमा रहिमहुल्लाह ने क़र्ज़ की दो श्रेणियाँ की हैं : एक श्रेणी यह है कि आपस में सुलह और सुधार के लिए क़र्ज़ लेना, और दूसरी श्रेणी यह है कि अपनी व्यक्तिगत ज़रूरत को पूरी करने के लिए क़र्ज़ लेना, जहाँ तक आपस में सुलह और सुधार के लिए क़र्ज़ लेने का संबंध है तो इसका उदाहरण इस प्रकार दिया गया है कि दो क़बीलों के बीच विवाद पैदा हो जाये, या युद्ध घटित हो जाये, तो एक भलाई, प्रतिष्ठा, सम्मान और पद वाला आदमी उठ खड़ा हो और उन दोनों क़बीलों के बीच कुछ धन खर्च करके सुलह और समाधान करा दे, तो हम इस सुधारक आदमी को ज़कात से उतना धन भुतान करेंगे जिस की उस ने ज़िम्मेदारी उठाई है, यह उस के द्वारा किये गये इस महान कार्य के बदला के तौर पर है, जिस के फलस्वरूप विश्वासियों (ईमान वालों) के बीच दुश्मनी और कपट का निवारण और लोगों के रक्तपात की समाप्ति हो गयी, और इस आदमी को ज़कात दी जायेगी चाहे वह गरीब हो या मालदार, क्योंकि हम इसे उस की अपनी आवश्यकता को पूरी करने के लिए नहीं दे रहे हैं बल्कि उस ने जो सार्वजनिक हित का काम किया है उस के कारण दे रहे हैं।

दूसरी श्रेणी : वह है जो अपने लिए क़र्ज़दार हुआ हो, जिस ने अपने आप के लिए क़र्ज़ लिया हो ताकि अपनी आवश्यकता में उसे खर्च करे, या अपनी ज़रूरत की कोई चीज़ अपनी ज़िम्मेदारी पर खरीद ले और उस के पास धन न हो, तो ऐसे आदमी के क़र्ज़ को ज़कात से भुगतान कर दिया जायेगा इस शर्त पर कि उस के क़र्ज़ के भुगतान के लिए धन न हो।

यहाँ पर एक मुद्दा यह है कि : क्या बेहतर यह है कि हम इस ऋणी को ज़कात का धन दे दें ताकि वह स्वयं अपने क़र्ज़ का भुगतान कर दे अथवा यह कि हम स्वयं ऋणदाता के पास जायें और उस की ओर से क़र्ज़ का भुगतान कर दें ?

यह क़र्ज़दार की स्थिति पर निर्भर करता है, अगर यह क़र्ज़दार आदमी अपने क़र्ज़ का भुगतान करने और अपने ज़िम्मे को उतारने का लालायित और उत्सुक है, और उसे क़र्ज़ का भुगतान करने के लिए जो कुछ दिया जा रहा है उस में उस पर भरोसा किया जा सकता है, तो ऐसी स्थिति में हम उसे ही दे देंगे कि वह खुद अपने क़र्ज़ का भुगतान करे, क्योंकि यह उस के लिए अधिक पर्दे और उसे उन लोगों के सामने शर्मिन्दा करने से अति दूर है जो उस से क़र्ज़ की मांग कर रहे हैं।

किन्तु अगर क़र्ज़दार आदमी एक फुज़ूल खर्ची करने वाला आदमी है जो धन को नष्ट कर देता है, और यदि हम स्वयं उस के ही हाथ में धन देते है कि वह अपना क़र्ज़ चुकता करे, तो वह जा कर ऐसी चीज़ें खरीदे गा जिनकी उसे आवश्यकता नहीं है, तो ऐसी स्थिति में हम उस के हाथ में ज़कात नहीं देंगे, बल्कि हम स्वयं ही उस के ऋणदाता के पास जायें गे और उस से कहें गे कि : फलाँ आदमी तुम्हारा कितना क़र्ज़दार है ? फिर हम उसे वह क़र्ज़, या उस का कुछ अंश जैसा कि हमारे लिए सुलभ है उसे भुगतान कर देंगे।

सातवाँ : अल्लाह के मार्ग में। और यहाँ पर अल्लाह के मार्ग से अभिप्राय केवल अल्लाह के मार्ग में जिहाद है, इस से भलाई और नेकी के सभी रास्ते मुराद लेना शुद्ध नहीं है ; क्योंकि अगर इस से मुराद भलाई और नेकी के सभी रास्ते होते तो अल्लाह तआला के फरमान :

"ख़ैरात (ज़कात) तो मात्र फकीरों का हक़ है और मिसकीनों का और उस (ज़कात) के कर्मचारियों का और जिनके दिल परचाये जा रहे हों और गुलाम के आज़ाद करने में और क़र्ज़दारों के लिए और अल्लाह की राह (जिहाद) में और मुसाफिरों के लिए, ये हुकूक़ अल्लाह की तरफ से मुक़र्रर किए हुए हैं और अल्लाह तआला बड़ा जानकार हिकमत वाला है।" (सूरतुत्तौबा :60)

में  (ज़कात के हक़दारों को) सीमित करने का कोई फायदा न होता, क्योंकि सीमित करना निष्प्रभाव हो जाता, अत: 'फी सबीलिल्लाह' (अल्लाह के मार्ग में) से मुराद अल-जिहाद फी सबीलिल्लाह (अल्लाह के मार्ग में जिहाद) है, इस आधार पर अल्लाह के रास्ते में लड़ाई करने वालों को, जिन के हाल से यह प्रत्यक्ष होता है कि वे अल्लाह के कलिमा (धर्म) को सर्वोच्च करने के लिए लड़ाई करते हैं, जक़ात का माल दिया जायेगा, उन्हें खर्चे, हथियार इत्यादि की जो आवश्यकता होती है उसे ज़कात से पूरा किया जायेगा, तथा उन के लिए ज़कात के धन से हथियार खरीदने की अनुमति है ताकि वे उन से लड़ाई कर सकें, किन्तु यह आवश्यक है कि लड़ाई अल्लाह के रास्ते में हो। अल्लाह के मार्ग में लड़ाई क्या है ? नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस को स्पष्ट कर दिया है, जब आप से प्रश्न किया गया कि आदमी अपने जनजाति के लिए लड़ाई करता है, तथा बहादुरी दिखाने के लिए लड़ता है, और अपने स्थान और पद का प्रदर्शन करने के लिए लड़ता है, तो इस में से अल्लाह के रास्ते में कौन है ? तो आप ने फरमाया : "जो इसलिए लड़ाई करता है कि अल्लाह का कलिमा (धर्म) सर्वोच्च हो तो वह अल्लाह के रास्ते में हैं।"

अत: जो आदमी अपने स्वदेश की रक्षा या इस के अतिरिक्त अन्य कारणों के लिए लड़ाई करता है तो वह अल्लाह के रास्ते में लड़ाई करने वाला नहीं है, इसलिए वह उस चीज़ का पात्र नहीं है जिस का अल्लाह के मार्ग में लड़ाई करने वाला पात्र होता है, न तो भौतिक सांसारिक मामलों, और न ही आखिरतके (परलोक) के मामलों में, वह आदमी जो बहादुरी के लिए लड़ता है अर्थात् वह बहादुर होने के कारण लड़ने को पसंद करता है -और किसी भी गुण वाला आदमी आम तौर पर किसी भी स्थिति में उस को अंजाम देने पसंद करता है- तो वह भी अल्लाह के मार्ग में लड़ाई नहीं करता है, और अपने स्थान को दिखाने के लिए लड़ाई करने वाला रियाकारी (दिखावा) और नाम (शोहरत) के लिये लड़ता है वह भी अल्लाह के मार्ग में लड़ाई करने वाला नहीं है, और हर वह आदमी जो अल्लाह के मार्ग में लड़ाई नहीं करता है वह ज़कात का हक़दार नहीं है, इसलिए कि अल्लाह तआला का फरमान है : "और अल्लाह के रास्ते में।" और अल्लाह के रास्ते में लड़ाई करने वाला आदमी वही है जो अल्लाह के कलिमा को सर्वोच्च करने के लिए लड़ाई करता है।

विद्वानों का कहना है कि : अल्लाह के रास्ते ही में से : वह आदमी भी है जो धर्म का ज्ञान (शरई शिक्षा) प्राप्त करने के लिए अपने आप को समर्पित कर देता है, अत: उसे जिन चीज़ों की आवश्यकत होती है जैसे कि खर्च, कपड़ा, खाना, पानी, आवास और ज्ञान की पुस्तकें, वे ज़कात के माल से दी जायेंगी, क्योंकि धर्म की शिक्षा भी अल्लाह के मार्ग में जिहाद का एक प्रकार है, बल्कि इमाम अहमद रहिमहुल्लाह का कहना है कि : (जिस आदमी की नीयत शुद्ध है उस के लिए ज्ञान के बराबर कोई चीज़ नहीं है।) अत: ज्ञान ही संपूर्ण शरीअत का आधार है, और ज्ञान के बिना कोई शरीअत नहीं है, और अल्लाह तआला ने किताब को इस लिए उतारा है ताकि लोग न्याय को स्थापित करें, और अपनी शरीअत के अहकाम (प्रावधानों), और जो अक़ीदा (आस्था), कथन और कर्म आवश्यक हैं उन की शिक्षा प्राप्त करें। इस में कोई शक नहीं कि अल्लाह के रास्ते में जिहाद करना सर्वश्रेष्ठ कामों में से है, बल्कि वह इस्लाम का शिखर है, और उसकी प्रतिष्ठा में कोई सन्देह नहीं, किन्तु ज्ञान (शरई इल्म) का भी इस्लाम में एक उच्च महत्व है, इसलिए उस का अल्लाह के रास्ते में जिहाद के अंर्तगत आना बिल्कुल स्पष्ट है इस में कोई शंका नहीं है।

आठवाँ : इब्नुस्सबील (राह चलता यात्री) : इस से अभिप्राय वह मुसाफिर है जिसका सफर कट गया हो और उस का खर्च समाप्त हो गया हो, अत: उसे ज़कात के धन से इतनी राशि दी जायेगी जिस से वह अपने नगर तक पहुँ जाये, भले ही वह अपने नगर में मालदार ही हो ; इसलिए कि वह ज़रूरतमंद है, और ऐसी स्थिति में हम उस से यह नहीं कहेंगे कि : तुम्हारे लिए ज़रूरी है कि तुम क़र्ज़ ले लो और बाद में उस का भुगतान कर दो, क्योंकि ऐसी स्थिति में हम उस के ऊपर यह अनिवार्य ठहरा रहें हैं कि वह अपने ज़िम्मे क़र्ज़ को अनिवार्य कर ले, किन्तु अगर वह स्वयं उधार लेना पसंद करे और ज़कात न ले तो यह उस के ऊपर निर्भर करता है। यदि हम एक आदमी को पायें जो मक्का से मदीना की ओर यात्रा कर रहा हो और यात्रा के दौरान उस का खर्च (पैसा) खो जाता है, और उस के पास कुछ भी नहीं है और वह मदीना में मालदार है, तो हम उसे केवल इतनी राशि देंगे जिस से वह मदीना पहुँच जाये, क्योंकि यही उस की आवश्यकता है, और हम उसे इस से अधिक नहीं देंगे।

और जब कि हम ने ज़कात के हक़दार लोगों की श्रेणियों को जान लिया जिन्हें ज़कात दी जायेगी, तो ज्ञात होना चाहिए कि इन के अलावा जो सार्वजनिक या निजी हित हैं उन में ज़कात नहीं दी जायेगी, इस आधार पर मस्जिदों के निर्माण, सड़कों की मरम्मत, पुस्तकालयों के निर्माण और इनके समान अन्य चीज़ों में ज़कात नहीं दी जा साकती, इसलिए कि अल्लाह तआला ने जब ज़कात के हक़दार लोगों का उल्लेख किया तो फरमाया : "ये हुकूक़ अल्लाह की तरफ से मुक़र्रर किए हुए हैं और अल्लाह तआला बड़ा जानकार हिकमत वाला है।" अर्थात् ज़कात का यह विभाजन और बटवारा अल्लाह की तरफ से निर्धारित एक दायित्व है और अल्लाह तआला सर्वज्ञानी और सर्वतत्वदर्शी है।

फिर हम कहते हैं : क्या इन ज़कात के हक़दार लोगों में से हर एक वर्ग को देना अनिवार्य है ; क्योंकि "वाव" (अर्थात और) का शब्द सभी की अपेक्षा करता है ?

तो इस का उत्तर यह है कि : यह अनिवार्य नहीं है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुआज़ बिन जबल रज़ियल्लाहु अन्हु से उन्हें यमन की ओर भेजते हुये फरमाया : "उन्हें सूचित करना कि अल्लाह तआला ने उन के ऊपर उन के धनों में ज़कात अनिवार्य किया है, जो उन के मालदारों से लिया जायेगा फिर उन के गरीबों पर लौटा दिया जायेगा।" इस हदीस में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने केवल एक वर्ग का उल्लेख किया है, इस से इंगित होता है कि क़ुरआन की आयत में अल्लाह तआला ने हक़दार लोगों का वर्णन किया है, उस का मतलब यह नहीं है कि इन सभी वर्गों को एक ही समय में ज़कात देना अनिवार्य है।

यदि कहा जाये कि : इन आठ वर्गों में से किस को ज़कात देना सर्वश्रेष्ठ है ?

तो हम कहेंगे कि : जिस वर्ग को ज़कात की आवश्यकता अधिक हो उसे ज़कात देना सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि ये सब के सब ज़कात के हक़दार हैं, अत: जिस की आवश्यकता औ ज़रूरत अधिक है उसे ज़कात देना सब से श्रेष्ठ है, और आम तौर पर फक़ीर और मिसकीन लोग सब से अधिक ज़रूरतमंद होते हैं, इसीलिए अल्लाह तआला ने सब से पहले इन्हीं का उल्लेख किया है : "ख़ैरात (ज़कात) तो बस फकीरों का हक़ है और मिसकीनों का और उस (ज़कात) के कर्मचारियों का और जिनके दिल परचाये जा रहे हों और गुलाम के आज़ाद करने में और क़र्ज़दारों के लिए और अल्लाह की राह (जिहाद) में और मुसाफिरों के लिए, ये हुकूक़ अल्लाह की तरफ से मुक़र्रर किए हुए हैं और अललाह तआला बड़ा जानकार हिकमत वाला है।" (सूरतुत्तौबा :60)

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।

"मजमूअ़ फतावा इब्ने उसैमीन" (18/331-339)
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