Thu 17 Jm2 1435 - 17 April 2014
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एतिकाफ का हुक्म और उसके धर्म संगत होने के प्रमाण

एतिकाफ का हुक्म क्या है ?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

सर्व प्रथम :

एतिकाफ क़ुर्आन, सुन्नत और इजमा´ (यानी मुसलमानों की सर्वसहमति) के द्वारा मश्रू´ (धर्म संगत) है।

क़ुर्आन से इसका प्रमाण अल्लाह तआला का यह फरमान है :

﴿ وَعَهِدْنَا إِلَى إِبْرَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ أَنْ طَهِّرَا بَيْتِيَ لِلطَّائِفِينَ وَالْعَاكِفِينَ وَالرُّكَّعِ السُّجُودِ ﴾ [البقرة : 125]

"हम ने इब्राहीम और इसमाईल की तरफ वह्य की (और उन्हें आदेश दिया) कि तुम मेरे घर को तवाफ करने वालों, एतिकाफ करने वालों, रूकू व सज्दा करने (नमाज़ पढ़ने) वालों के लिए (शिर्क और गंदगी से) पाक साफ रखो।" (सूरतुल बक़रा : 125)

तथा अल्लाह तआला का यह फरमान :

 ﴿وَلا تُبَاشِرُوهُنَّ وَأَنْتُمْ عَاكِفُونَ فِي الْمَسَاجِدِ ﴾ [البقرة : 187]

"और स्त्रियों से उस समय संभोग न करो जब तुम मस्जिदों में एतिकाफ़ में हो।" (सूरतुल बक़रा : 187)

जहाँ तक सुन्नत के प्रमाणों का संबंध है तो इस विषय में बहुत सी हदीसें हैं, जिन में से एक आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की हदीस है कि "नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रमज़ान के अंतिम दस दिनों का एतिकाफ करते थे यहाँ तक कि अल्लाह तआला ने आपको मृत्यु दे दी, फिर आपकी पत्नियों ने आपके बाद ऐतिकाफ किया।" इस हदीस को बुखारी (हदीस संख्या : 2026) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 1172) ने रिवायत किया है।

रही बात इज्मा’ (मुसलमानों की सर्व सहमति) की, तो कई विद्वानों ने एतिकाफ के धर्म संगत होने पर इजमा’ (सर्व सहमति) का उल्लेख किया है, जैसे कि नववी, इब्ने क़ुदामा, और शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिय्या इत्यादि।

देखिये : अल-मजमू’ (6/406), अल-मुग्नी ( 4/456), शर्हुल उ़मदा (2/711).

तथा शैख इब्ने बाज़ ने मजमूउल फतावा (15/437) में फरमाया :

"इस बात में कोई शक नहीं कि मस्जिद में एतिकाफ करना अल्लाह तआला की निकटता के कामों में से एक काम (नेकी) है, और रमज़ान के महीने में एतिकाफ करना अन्य दिनों से श्रेष्ठतर है . . और वह रमज़ान में और रमज़ान के अलावा अन्य दिनों में (भी) धर्म संगत है।" (संछेप के साथ समाप्त हुआ).

दूसरा : एतिकाफ का हुक्म

एतिकाफ के बार में असल यह है कि वह सुन्नत है, वाजिब (अनिवार्य) नहीं है, सिवाय इसके कि वह नज़्र हो (अर्थात् उसकी नज़्र मानी गई हो) तो ऐसी स्थिति में वह अनिवार्य हो जाता है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : "जिस व्यक्ति ने अल्लाह तआला की इताअत (आज्ञापालन) की नज़्र (मन्नत) मानी है वह अल्लाह तआला की इताअत (आज्ञापालन) करे, और जिस व्यक्ति ने उसकी नाफरमानी (अवज्ञा) करने की नज़्र मानी है वह उसकी नाफरमानी न करे।" (अर्थात् उस नज़्र को पूरी न करे) इसे बुखारी (हदीस संख्या : 6696) ने रिवायत किया है।

और इसलिए कि उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा : ऐ अल्लाह के पैगंबर ! मैं ने जाहिलियत (इस्लाम से पूर्व अज्ञानता) के समय काल में मस्जिदे हराम के अन्दर एक रात एतिकाफ करने की नज़्र मानी थी। तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: "तुम अपनी नज़्र पूरी करो।" (हदीस संख्या : 6697).

तथा इब्ने मुंज़िर ने अपनी किताब "अल-इज्मा" (पृष्ठ संख्या : 53) में फरमाया :

"(विद्वानों ने) इस बात पर इत्तिफाक़ किया है कि एतिकाफ सुन्नत है, लोगों पर फर्ज़ और वाजिब नहीं है, सिवाय इसके कि मनुष्य नज़्र मान कर उसे अपने ऊपर अनिवार्य कर ले, तो ऐसी स्थिति में वह अनिवार्य हो जाता है।" (इब्ने मुंज़िर की बात समाप्त हुई).

देखिये : डॉक्टर खालिद अल-मुशैक़िह की किताब "फिक़्हुल एतिकाफ" पृष्ठ संख्या : 31.

 

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।
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