Wed 23 Jm2 1435 - 23 April 2014
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ईदैन की नमाज़ में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का तरीक़ा

मैं ईदैन की नमाज़ में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का तरीक़ा जानना चाहता हूँ।

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ईदैन की नमाज़ ईदगाह में पढ़ते थे, और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बारे में यह बात साबित नहीं है कि आप ने ईद की नमाज़ अपनी मस्जिद में पढ़ी हो।

इमाम शाफई ने “अल-उम्म” में फरमाया : हमें यह बात पहुँची है कि अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ईदैन में मदीना में ईदगाह की तरफ निकलते थे, इसी तरह आप के बाद आने वालों ने किया सिवाय इसके कि बारिश वगैरह का कोई उज़्र (बहाना) हो, तथा इसी तरह मक्का को छोड़ कर अन्य शहरों के सामान्य लोग करते थे। (अंत)

तथा आप ईदैन के लिए निकलने के लिए अपना सबसे अच्छा पोशाक पहनते थे, चुनाँचे आपके पास एक हुल्ला (वस्त्र) था जिसे आप ईदैन और जुमा के लिए पहनते थे।

(एक ही प्रकार के दो कपड़ों को हुल्ला (जोड़ा) कहा जाता है).

तथा आप ईदुल फित्र में निकलने से पहले खुजूरें खाते थे, और उन्हें विषम (ताक़) संख्या में खाते थे।

बुखारी (हदीस संख्या : 953) ने अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा : “अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ईदुल फित्र के दिन नहीं निकलते थे यहाँ तक कि कुछ खजूरें खा लेते, तथा उन्हें ताक संख्या में खाते थे।”

इब्ने क़ुदामा ने कहा : हम ईदुल फित्र के दिन खाने में जल्दी करने के मुस्तहब होने के बारे में कोई मतभेद नहीं जानते हैं। (अंत)

नमाज़ से पहले खाने की हिक्मत (तत्वदर्शिता) यह है कि कोई व्यक्ति यह भ्रम न कर बैठे कि ईद की नमाज़ पढ़ने तक रोज़ा रखना आवश्यक है।

तथा उसकी हिक्मत के वर्णन में यह भी कहा गया है : रोज़ा के अनिवार्य होने के बाद रोज़ा तोड़ने के अनिवार्य होने के बारे में अल्लाह के आदेश का पालन करने में जल्दी और पहल करते हुए (नमाज़ से खाया जाता है)।

अगर मुसलमान खजूर न पाए तो वह उसके अलावा किसी अन्य चीज़ पर रोज़ा तोड़ दे चाहे पानी ही सही, ताकि उसे सुन्नत प्राप्त हो जाए और वह ईदुल फित्र की नमाज़ से पहले इफ्तार करना है।

जहाँ तक ईदुल अज़्ह़ा का संबंध है तो आप कोई चीज़ नहीं खाते थे यहाँ तक कि नमाज़गाह से वापस आ जाते, फिर अपनी क़ुर्बानी के गोश्त से खाते थे।

तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बारे में वर्णित है कि आप ईदैन के लिए गुस्ल करते थे। इब्नुल क़ैयिम ने फरमाया : “इसके बारे में दो ज़ईफ हदीसें हैं . . . किंतु इब्ने उमर से, उनके सुन्नत का सख्त अनुकरण करने के बावजूद, साबित है कि वह ईद के दिन निकलने से पहले स्नान करते थे।” (अंत)

तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ईद की नमाज़ के लिए पैदल चलकर जाते थ और पैदल चलकर वापस आते थे। इब्ने माजा (हदीस संख्या : 1295) ने इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा कि अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ईद के लिए पैदल चलकर जाते थे और पैदल चलकर वापस आते थे। इसे अल्बानी ने सहीह इब्ने माजा में हसन क़रार दिया है।

तथा तिर्मिज़ी (हदीस संख्या : 530) ने अली बिन अबू तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्हों ने फरमाया : “यह बात सुन्नत से है कि तुम ईद के लिए पैदल निकलो।” इसे अल्बानी ने सहीह तिर्मिज़ी में हसन कहा है।

तिर्मिज़ी ने फरमाया : अधिकतर विद्वानों के निकट इस हदीस के अनुसार अमल किया जायेगा, वे लोग इस बात को मुसतहब समझते हैं कि आदमी ईद के लिए पैदल निकले . . . और मुस्तहब यह है कि वह बिना उज़्र के सवारी न करे।

जब आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ईदगाह पहुँचते तो बिन अज़ान और इक़ामत तथा “अस्सलातो जामिअह” कहे हुए नमाज़ शुरू कर देते थे, तथा सुन्नत यह है कि इनमें से कोई चीज़ न की जाऐ।

आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ईदगाह में ईद की नमाज़ से पहले या उसके बाद कोई अन्य नमाज़ नहीं पढ़ते थे।

तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम खुत्बा से पहले नमाज़ पढ़ते थे, चुनाँचे आप दो रक्अत नमाज़ पढ़ते, पहली रक्अत में तक्बीरतुल एहराम के साथ या उसके अलावा निरंतर सात तक्बीरें (अर्थात सात बार अल्लाहु अक्बर) कहते थे। हर दो तक्बीरों के बीच थोड़ा मौन धारण करते थे, तथा आप से तक्बीरों के बीच कोई विशिष्ट ज़िक्र (जप) सुरक्षित (वर्णित) नहीं है। लेकिन इब्ने मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु के बारे में उल्लेख किया गया है कि उन्हों ने कहाः वह अल्लाह की प्रशंसा करेगा, उसकी स्तुति करेगा और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद भेजगा।

इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अनुकरण का पक्का अभिलाषी होन के बावजूद, हर तक्बीर के साथ अपने दोनों हाथों को उठाते थे।

जब आप तक्बीर मुकम्मल कर लेते तो क़िराअत शुरू करते, चुनाँचे आप सूरतुल फातिहा पढ़ते, फिर उसके बाद एक रक्अत में “क़ाफ वल क़ुरआनिल मजीद” और दूसरी रक्अत में “इक़्तरबतिस्साअतो वनशक़्क़ल क़मर” पढ़ते थे, और कभी कभार उन दोनों में “सब्बेहिस्मा रब्बिकल आला” और कभी कभी “हल अताका हदीसुल गाशिया” पढ़ते थे। आपसे यह भी प्रमाणित है और वह भी प्रमाणित है। इसके अलावा कोई अन्य सूरत आप से प्रमाणित नहीं है। जब आप क़िराअत से फारिग़ हो जाते तो तक्बीर कहते और रूकूअ़ करते फिर जब रक्अत मुकम्मल कर लेते और सज्दे से उठ कर खड़े होते, तो निरंतर पाँच तक्बीरें कहते थे। जब तक्बीर मुकम्मल कर लेते तो क़िराअत शुरू करते। इस तरह आप दोनों रक्अतों में सबसे पहले तक्बीरें कहते थे, और क़िराअत के बाद रूकूअ करते थे।

तथा तिर्मिज़ी ने कसीर बिन अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन औफ अन अबीह अन जद्दिहि की हदीस से रिवायत किया है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ईदैन में पहली रक्अत में क़िराअत से पहले सात तक्बीरें और दूसरी रकअत में क़िराअत से पहले पाँच तक्बीरें कहीं। तिर्मिज़ी ने कहा : मैं ने मुहम्मद -अर्थात् बुखारी - से इस हदीस के बारे में पूछा तो उन्हों ने फरमाया : इस अध्याय में इस से अधिक सही कोई चीज़ नहीं है, और मेरा इसी के अनुसार कथन है।” (अंत)

आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब नमाज़ मुकम्मल कर लेते तो पलट कर लोगों के सामने खड़े हो जाते जबकि लोग अपनी सफों में बैठे हुए होते थे, तो आप उन्हें सदुपदेश और वसीयत करते तथा उन्हें आदेश देते और मनाही करते। और यदि कोई जत्था भेजना चाहते तो उसे रवाना फरमाते या कोई आदेश करना चाहते तो आदेश करते।

तथा वहाँ कोई मिंबर नहीं होता था जिस पर आप चढ़ते थे, और न ही मदीना का मिंबर निकाल कर लाया जाता था, बल्कि आप ज़मीन पर खड़े हो कर लोगों को खुत्बा देते थे। जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु ने फरमाया : मैं अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ ईद के दिन उपस्थित हुआ तो आप ने बिना अज़ान और इक़ामत के खुत्बा से पहले नमाज़ शुरू की। फिर आप बिलाल रज़ियल्लाहु अन्हु का सहारा लिए हुए खड़े हुए और अल्लाह तआला के तक़्वा (ईश्भय) का आदेश दिया, उसकी आज्ञाकारिता पर उभारा और ज़ोर दिया, और लोगों को सदुपदेश और नसीहत किया फिर चले यहाँ तक कि औरतों के पास आए और उन्हें सदुपदेश और नसीहत किया। (सहीह बुखारी व सहीह मुस्लिम)

अबू सईद खुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा : नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ईदुल फित्र और ईदुल अज़्ह़ा के दिन ईदगाह की तरफ निकलते तो सबसे पहले जिस चीज़ से आरंभ करते वह नमाज़ होती थी, फिर आप नमाज़ से फारिग होकर लोगों के सामने खड़े होते इस हाल में कि लोग अपनी सफों में बैठे हुए होते थे . . . हदीस के अंत तक। इसे मुस्लिम न रिवायत किया है।

तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने सभी खुत्बों का आरंभ अल्लाह की हम्द व सना (स्तुति) से करते थे, और आप के बारे में किसी एक हदीस में भी यह बात सुरक्षित नहीं है कि आप ईदैन के खुत्बों का आरंभ तक्बीर से करते थे। बल्कि इब्ने माजा ने अपनी सुनन (हदीस संख्या : 1287) में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के मुअज़्ज़िन सअद अल-क़रज़ से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा : “नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम खुत्बा के बीच तक्बीर कहते थे, आप ईदैन के खुत्बा में अधिक तक्बीर कहते थे।” इस हदीस को अल्बानी ने ज़ईफ इब्ने माजा में ज़ईफ करार दिया है। यह हदीस ज़ईफ होने के साथ साथ, इस बात पर तर्क स्थापित नहीं करती है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ईद के खुत्बा का आरंभ तक्बीर से करते थे।

किताब “तमामुल मिन्नह” में फरमाया : “बावजूद इसके कि यह हदीस ईद के खुत्बा का आरंभ तक्बीर से करने की वैधता को नहीं दर्शाती है, इसकी इसनाद ज़ईफ है, इसके अंदर एक कमज़ोर रावी और एक मजहूल (अज्ञात) रावी है, अतः इस हदीस से खुत्बा के मध्य तक्बीर के सुन्नत होने पर दलील पकड़ना जाइज़ नहीं है।”

इब्नुल क़ैयिम ने फरमाया :

“लोगों ने ईदैन और इस्तिस्क़ा (बारिश मांगने की नमाज़) के खुत्बा के आरंभ करने के बारे में मतभेद किया है। चुनाँचे कहा गया है कि : दोनों का आरंभ तक्बीर के द्वारा किया जायेगा। तथा कहा गया है कि : इस्तिस्क़ा के खुत्बा का आरंभ इस्तिग़फार (अस्तगफिरूल्लाह) से किया जायेगा। तथा यह भी कहा गया है कि : दोनों का आरंभ हम्दो व सना से किया जायेगा। शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिय्या ने फरमाया : और यही सहीह है . . . और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने सभी खुत्बों का आरंभ अल्लाह की हम्द व सना से करते थे।” (अंत)

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ईद की नमाज़ में उपस्थित होने वाले को यह रूख्सत (छूट) प्रदान की है कि वह खुत्बा के लिए बैठे, या चला जाए।

अबू दाऊद (हदीस संख्या : 1155) ने अब्दुल्लाह बिन साईब से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा : मैं अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ ईद में उपस्थित हुआ, तो जब आप ने नमाज़ पूरी कर ली तो फरमाया : (हम खुत्बा दे रहे हैं, अतः जो खुत्बा के लिए बैठना पसंद करे वह बैठे, और जो जाना चाहे वह चला जाए।) इसे अल्बानी ने सहीह अबू दाऊद में सहीह कहा है।

तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ईद के दिन रास्ता बदल देते थे, चुनाँचे आप एक रास्ते से जाते और दूसरे रास्ते से वापस आते थे।

बुखारी (हदीस संख्या : 986) ने जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा : नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब ईद का दिन होता तो रास्ता बदल देते थे।

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।
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