Fri 18 Jm2 1435 - 18 April 2014
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आलस्य एवं काहिली से नमाज़ छोड़ने का हुक्म

अगर मैं मात्र आलस्य एवं काहिली के कारण नमाज़ न पढूँ तो क्या मैं काफिर समझा जाऊँगा या पापी मुसलमान ?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

इमाम अहमद रहिमहुल्लाह ने आलस्य एवं काहिली से नमाज़ छोड़ने वाले के काफिर होने की बात कही है और यही कथन राजेह है, और इसी बात पर अल्लाह की किताब (क़ुरआन), उसके पैगंबर की सुन्नत (हदीस), सलफ सालेहीन (सदाचारी पूर्वजों) के  कथन और शुद्ध मननचिंतन दलालत करते हैं। (अश्शर्हुल मुम्ते 2/ 26)

क़ुरआन की आयतों और हदीसों में मननचिंतन करने वाला इस तथ्य को पायेगा कि वे (क़ुरआन व हदीस) नमाज़ छोड़ने वाले के कुफ्रे अक्बर (महान कुफ्र) करने पर तर्क स्थापित करते हैं जो मिल्लत (इस्लाम धर्म) से निष्कासित कर देता है।

क़ुरआन के प्रमाणों में से अल्लाह तआला का यह फरमान है:

﴿فإن تابوا وأقاموا الصلاة وآتوا الزكاة فإخوانكم في الدين﴾ [التوبة: 11]  

“यदि ये तैाबा कर लें और नमाज़ के पाबंद हो जायें और ज़कात देते रहें, तो तुम्हारे दीनी भाई हैं।” (सूरत तौबा : 11)

इस आयत से प्रमाण स्थापित करने का तरीक़ा यह है कि अल्लाह तआला ने हमारे और मुश्रेकीन के बीच भाईचारा के स्थापित होने की तीन शर्तें लगाई हैं: वे शिर्क (अल्लाह के साथ किसी को साझी ठहराने) से तौबा कर लें, नमाज़ क़ायम करें और  ज़कात अदा करें। अगर वे र्श्कि से तौबा कर लेते हैं परंतु नमाज़ नहीं पढ़ते हैं तथा जकात अदा नहीं करते हैं, तो वे हमारे भाई नहीं हैं। इसी प्रकार अगर वे लोग नमाज़ क़ायम करें परंतु ज़कात न अदा करें तो वे हमारे भाई नहीं हैं। और दीन के अंदर भाईचारा (दीनी भाईचारा) उसी समय समाप्त होती है जब मनुष्य पूरी तरह से दीन से निकल जाता है। अवज्ञा और कुफ्रे अक्बर से कमतर कुफ्र (अर्थात छोटे कुफ्र) से इस्लामी भाई चारा समाप्त नहीं होती है।

तथा अल्लाह तआला का यह फरमान भी है:

﴿فَخَلَفَ مِنْ بَعْدِهِمْ خَلْفٌ أَضَاعُوا الصَّلاةَ وَاتَّبَعُوا الشَّهَوَاتِ فَسَوْفَ يَلْقَوْنَ غَيًّا إِلا مَنْ تَابَ وَآمَنَ وَعَمِلَ صَالِحًا فَأُولَئِكَ يَدْخُلُونَ الْجَنَّةَ وَلا يُظْلَمُونَ شَيْئًا﴾  [سورة مريم : 59-60]   

“फिर उनके बाद ऐसे नाख़लफ (अयोग्य लोग) पैदा हुए कि उन्हों ने नमाज़ को नष्ट कर दिया और मन की इच्छाओं के पीछे पड़ गये, अतः उनका नुक़सान उनके आगे आयेगा। सिवाय उनके जो तौबा कर लें और ईमान लायें और नेक कार्य करें। ऐसे लोग जन्नत में जायेंगे और उन पर कुछ भी ज़ुल्म न किया जायेगा।” (सूरत मर्यम : 59-60)

इस आयत से प्रमाण स्थापित करने का तरीक़ा यह है कि अल्लाह तआला ने इस आयत में नमाज़ को नष्ट करने वालों मन की इच्छाओं के पीछे पड़ने वालों के बारे में फरमाया: (सिवाय उनके जो तौबा कर लें और ईमान लायें)। इस से यह तर्क निकला कि वे लोग नमाज़ को नष्ट करने और मन की इच्छाओं के पीछे चलने के समय मोमिन नहीं थे।

जहाँ तक नमाज़ छोड़ने वाले के कुफ्र पर सुन्नत (हदीस) के तर्क का संबंध है तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : “(मुसलमान) आदमी और शिर्क तथा कुफ्र के बीच अंतर नमाज़ का छोड़ना है।” इस हदीस को इमाम मुस्लिम ने किताबुल ईमान में जाबिर बिन अब्दुल्लाह के माध्यम से नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत किया है।

 

तथा बुरैदा बिन हुसैब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है वह कहते हैं कि मैं ने अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को फरमाते हुए सुना कि: हमारे और उन (मुशरेकीन) के बीच प्रतिज्ञा (अह्द व पैमान) नमाज़ है। अतः जिसने उसे छोड़ दिया उसने कुफ्र किया।” इसे अहमद, अबू दाऊद, तिर्मिज़ी, नसाई और इब्ने माजा ने रिवायत किया है।

यहाँ पर कुफ्र से अभिप्राय मिल्लत अर्थात् इस्लाम धर्म से निष्कासित करने वाला कुफ्र है क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नमाज़ को मोमिन और काफिर के बीच अंतर (पृथक्करण) बनाया है। और यह बात सर्वज्ञात है कि कुफ्र की मिल्लत, इस्लाम की मिल्लत से भिन्न है। अतः जिसने इस प्रतिज्ञा को पूरा नहीं किया वह काफिरों में से है।

और इसी विषय में औफ बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: “तुम्हारे सर्वश्रेष्ठ इमाम वे हैं जिन्हें तुम पसंद करते हो और वे तुम्हें पसंद करते हैं, वे तुम्हारे लिए भलाई की दुआ करते हैं और तुम उनके लिए भलाई की दुआ करते हो, और तुम्हारे सबसे बुरे इमाम वे लोग हैं जिनसे तुम घृणा करते हो और वे तुम से घृणा करते हैं तथा तुम उन पर धिक्कार करते हो और वे तुम पर धिक्कार करते हैं।” कहा गया: ऐ अल्लाह के पैगंबर, क्या हम तलवार के द्वारा उनसे लड़ाई न करें ॽ आपने फरमायाः “नहीं, जब तक वे तुम्हारे बीच नमाज़ को क़ायम करते रहें।” 

अतः इस हदीस के अंदर इस बात पर तर्क मौजूद है कि शासकों से लड़ाई करना और उनके विरूध तलवार उठाना जाइज़ है यदि वे नमाज़ क़ायम न करें। और शासकों से विवाद करना और उनसे लड़ाई करना उसी समय जाइज़ है जब वे स्पष्ट रूप से कुफ्र करें जिसके विषय में हमारे पास अल्लाह की ओर से कोई दलील हो। क्योंकि उबादह बिन सामित रज़ियल्लाहु अन्हु का फरमान है: “अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमें आमंत्रित किया और हम ने आप से बैअत किया, चुनाँचे आपने हमसे जो अह्द व पैमान लिए उनमें से यह भी था कि हम ने खुशी और नापसंदीदगी, आसानी और तंगी तथा अपने ऊपर दूसरों को प्राथमिकता दिए जाने की अवस्था में आप की बात को सुनने और उसका पालन करने पर बैअत किया और यह कि हम शासकों से प्रशासन को छीनने के लिए विवाद न करें। आप ने फरमाया: सिवाय इसके कि तुम स्पष्ट और खुल्लम खुल्ला कुफ्र देखो जिसके बारे में तुम्हारे पास अल्लाह की ओर से कोई दलील (प्रमाण) हो।” (सहीह बुखारी व सहीह मुस्लिम) इस आधार पर उनका नमाज़ को छोड़ देना, जिस पर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनसे विवाद करना और तलवार के द्वारा लड़ाई करना लंबित किया है, स्पष्ट और खुल्लम खुल्ला कुफ्र होगा जिसके बारे में हमारे पास अल्लाह की ओर से प्रमाण मौजूद है।

अगर कोई कहने वाला यह कहे कि क्या यह जाइज़ नहीं है कि नमाज़ छोड़ने वाले के कुफ्र पर दलालत करने वाले नुसूस को उस व्यक्ति पर महमूल किया जाये जिसने नमाज़ को उसके वजूब का इंकार करते हुए छोड़ दिया है ॽ

तो हमारा उत्तर यह होगा कि यह जाइज़ नहीं है क्योंकि इसमें दो निषेद्ध पाए जाते हैं:

सर्व प्रथम: उस वस्फ (विशेषण) को निरस्त कर देना जिसका शरीअत ने एतिबार किया है और उस पर हुक्म को संबंधित (आधारित) किया है, क्योंकि शरीअत ने कुफ्र का हुक्म नमाज़ के छोड़ने पर लगाया है न कि इनकार करने पर, और दीनी भाई चारा को नमाज़ के क़ायम करने पर निष्किर्षित किया है न कि उसके वुजूब का इक़रार करने पर, अल्लाह तआला ने यह नहीं कहा है कि: यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ के वुजूब का इक़रार कर लें, और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह नहीं कहा है कि आदमी के बीच और शिर्क तथा कुफ्र के बीच नमाज़ के वुजूब का इनकार करना है। या हमारे और उन मुश्रेकीन के बीच अह्द व पैमान नमाज़ के वुजूब का इक़रार करना है, अतः जिसने उसके वाजिब होने का इनकार कर दिया उसने कुफ्र किया। यदि अल्लाह और उसके पैगंबर का यही अभिप्राय होता तो उस से उपेक्षा करना उस स्पष्टीकरण के विपरीत होता जिसके साथ क़ुरआन आया है, अल्लाह तआला ने फरमाया:

﴿ وَنَزَّلْنَا عَلَيْكَ الْكِتَابَ تِبْيَاناً لِكُلِّ شَيْءٍ ﴾ [النحل: 89]

“और हम ने आप पर यह किताब उतारी है जिस में हर चीज़ का स्पष्ट उल्लेख है।” (सूरतुन-नहल : 89)

तथा अल्लाह तआला ने अपने पैगंबर को संबोधित करते हुए फरमाया:

﴿وأنزلنا إليك الذكر لتبين للناس ما نزل إليهم﴾  [النحل: 44]  

“यह ज़िक्र (किताब) हम ने आप की तरफ उतारी है कि लोगों की तरफ जो उतारा गया है आप उसे स्पष्ट रूप से बयान कर दें, शायद कि वे सोच विचार करें।”

(सुरतुन नह्ल : 44)

दूसरा: ऐसे वस्फ (विशेषण) का एतिबार करना जिसे शरीअत ने हुक्म का कारण नहीं बनाया है, क्योंकि पाँच समय की नमाज़ों की अनिवार्यता का इनकार उस आदमी के कुफ्र का करण है जिसकी अज्ञानता का उसमें बहाना स्वीकारनीय नहीं होता है, चाहे वह मनुष्य नमाज़ पढता हो या न पढ़ता हो। अगर कोई मनुष्य पाँच समय की नमाज़ें पढ़े और उसकी सभी शर्तों, अरकान, वाजिबात और मुसतहब्बात को पूरा करे, परंतु वह बिना किसी कारण के उसके वुजूब का इनकार करने वाला हो, तो वह मनुष्य काफिर होगा जबकि उसने उसे नहीं छोड़ा है। इस से यह बात स्पष्ट हुई कि क़ुरआन व हदीस के नुसूस को उस मनुष्य पर महमूल (लागू) करना जो नमाज़ को उसके वुजूब का इनकार करते हुए छोड़ देता है, सही नहीं है, बल्कि सही बात यह है कि नमाज़ छोड़ने वाला काफिर है जिसके कारण वह इस्लाम से बाहर निकल जाता है, जैसा कि यह इब्ने अबी हातिम की हदीस में स्पषट रूप से वर्णित है जिसे उन्हों ने अपनी किताब सुनन में उबादा बिन सामित रजियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्हों ने फरमाया: अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हम को वसीयत की: “अल्लाह के साथ किसी को भी साझी न ठहराओ, और जानबूझ कर नमाज़ न छोड़ो। जिसने उसे जानबूझ कर छोड़ दिया वह मिल्लत (इस्लाम धर्म) से निष्कासित हो गया।”

इसी तरह यदि हम उसे उसकी अनिवार्यत का इनकार करते हुए छोड़ने पर महमूल करें तो नुसूस में नमाज़ को विशिष्ट करने का कोई फायदा न होगा। क्योंकि यह हुक्म ज़कात, रोज़ा, हज्ज सभी में आम (सामान्य) है, जिसने उनमें से किसी एक को भी उसके वुजूब का इनकार करते हुए छोड़ दिया, उसने कुफ्र किया यदि वह अज्ञानता के कारण मा'ज़ूर नहीं है।

जिस प्रकार शरीअत (क़ुरआन व हदीस) के तर्क नमाज़ छोड़ने वाले के कुफ्र की अपेक्षा करते हैं, उसी तरह शुद्ध बुद्धि और मननचिंतन (बौद्धिक तर्क) भी इसकी अपेक्षा करता है, चुनांचे आदमी के पास ईमान कैसे बाक़ी रह सकता है जबकि वह धर्म के स्तंभ नमाज़ को छोड़ देता है ॽ हालांकि उस को क़ायम करने की अभिरूचि दिलाने में ऐसे प्रमाण आये हैं जो हर बुद्धि रखने वाले मोमिन से इस बात की अपेक्षा करते हैं कि वह उसे स्थापित करे और उसमें पहल करे, तथा उसे छोड़ने पर ऐसी धमकियाँ वर्णित हैं जो प्रत्येक बुद्धि रखने वाले मोमिन से इस बात की अपेक्ष करती हैं कि वह उसे छोड़ने और नष्ट करने से बचे और सावधान रहे। अतः इस अपेक्षा और तक़ाज़े के होते हुए उसे छोड़ देना उसके छोड़ने वाले के पास ईमान को बाक़ी नहीं रखता है।

यदि कोई कहने वाला कहे: क्या यह संभव नहीं है कि नमाज़ छोड़ने वाले के बारे में कुफ्र से मुराद नेमत का कुफ्र (नाशुक्री) लिया जाए, मिल्लत का कुफ्र नहीं, या उस से अभिप्राय कुफ्र अक्बर से कमतर कुफ्र लिया जाए। इस तरह वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के निम्नलिखित फरमान के समान हो:

“लोगों के अंदर दो चीज़ें ऐसी हैं जो उनके कुफ्र का कारण बनती हैं ; नसब (वंश) में ऐब लगाना और मृतक पर नौहा (मातम) करना।” तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह फरमान “मुसलमान को गाली देना अवज्ञा है, और उस से लड़ाई झगड़ा करना कुफ्र है।” और इसी के समान अन्य हदीसें भी हैं।

तो हम कहेंगे कि यह संभावना व्यक्त करना और उसके लिए उदाहरण देना, कई कारणें से सही नहीं है:

पहला: अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नमाज़ को मुसलमान एवं काफिर और ईमान एवं कुफ्र के बीच अंतर और विभाजन करने वाली सीमा बना दिया है जो परिसीमित तत्व को पृथक कर देता है और उसे उसके अतिरिक्त से बाहर (अलग) कर देता है। इस तरह दोनों परिसीमित चीज़ें एक दूसरे से भिन्न और विपरीत होती हैं, उनमें से एक दूसरे में दाखिल नहीं होती हैं।

दूसरा: नमाज़ इस्लाम के स्तंभों में से एक स्तंभ है, अतः, उसको छोड़ने वाले पर कुफ्र का शब्द बोलना इस बात की अपेक्षा करता है कि वह ऐसा कुफ्र है जो इस्लाम से निष्कासित करने वाला है क्योंकि उसने इस्लाम के एक स्तंभ को ध्वस्त कर दिया, जबकि कुफ्र के कार्यों में से किसी कार्य पर कुफ्र का शब्द बोलने का मामला इसके विपरीत है।

तीसरा: कुछ अन्य नुसूस (प्रमाण) भी हैं जो नमाज़ छोड़ने वाले व्यक्ति के मिल्लते इस्लाम से निष्कासित करने वाला कुफ्र करने पर दलालत करते हैं। अतः (यहाँ भी) कुफ्र को उसी अर्थ में लेना अनिवार्य है जिस पर अन्य नुसूस की दलालत (तर्क) है, ताकि सभी नुसूस एक दूसरे के अनुकूल हो जायें।

चौथा: कुफ्र को विभिन्न शैलियों में वर्णन किया गया है, चुनांचे नमाज़ छोड़ने के बारे में फरमाया: “आदमी के बीच और शिर्क तथा कुफ्र (अल-कुफ्र) के बीच”, कुफ्र के शब्द को 'अलिफ लाम' के साथ वर्णन किया गया है (अर्थात् “अल-कुफ्र” का शब्द इस्तेमाल किया गया है) जो इस बात को दर्शाता है कि कुफ्र से अभिप्राय कुफ्र की हक़ीक़त (वास्तविक कुफ्र) है। इसके विपरीत “कुफ्र” का शब्द (नकिरा के रूप में बिना अलिफ लाम के) या “’’कफर” का शब्द क्रिया के रूप में, तो यह इस बात पर दलालत करता है कि यह कुफ्र में से है या उसने इस कर्म में कुफ्र किया है, उस से अभिप्राय संपूर्ण कुफ्र नहीं है जो इस्लाम से खारिज कर देता है।

शैखुल इस्लाम इब्ने तौमिय्या अपनी किताब (इक़्तिज़ाउस्सिरातिल मुस्तक़ीम, पृ़ष्ठ 70, प्रकाशन अस्सुन्नह अल-मुहम्मदिय्या) में  रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कथन (اثنتان في الناس هما بهما كفر) पर टिप्पड़ी करते हुए फरमाते हैं कि:

आप का फरमान “هما بهما كفر” अर्थात ये दोनों आदतें कुफ्र हैं जो लोगों में उपस्थित हैं। अतः स्वयं दोनों आदतें कुफ्र हैं, क्योंकि ये दोनों कुफ्र के कार्यों में से थीं और वे दोनों लोगों में उपस्थित हैं, किंतु प्रत्येक वह व्यक्ति जिसके अंदर कुफ्र का कोई प्रकार उपस्थित होता है, वह संपूर्ण काफिर नहीं हो जाता है यहाँ तक कि कुफ्र की हक़ीक़त (वास्तविक कुफ्र) उपस्थित हो जाये। जिस तरह कि हर वह व्यक्ति जिसके अंदर ईमान का कोई प्रकार उपस्थित हो जाए, वह मोमिन नहीं हो जाता यहाँ तक कि ईमान का आधार और उसकी वास्तविकता उसके अंदर विद्यमान हो जाए। तथा अलिफ लाम के साथ “अल-कुफ्र” जैसा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के फरमान ( ليس بين العبد وبين الكفر أو الشرك إلا ترك الصلاة ) में है तथा नकिरा के रूप् में “कुफ्र” के बीच अंतर पाया जाता है। (शैखुल इस्लाम की बात का अंत हुआ)

जब यह बात बिलकुल स्पष्ट हो गई कि बिना किसी शरई उज़्र (कारण) के नमाज़ छोड़ने वाला इन प्रमाणों के आधार पर काफिर है उसने ऐसा कुफ्र किया है जो मिल्लते इस्लाम से निकाल देता है, तो सही मत इमाम अहमद का है और यही इमाम शफेई के दो कथनों में से एक कथन है, जैसा कि इब्ने कसीर ने अल्लाह तआल के फरमान:

﴿فخلف من بعدهم خلف أضاعوا الصلوات واتبعوا الشهوات﴾ [مريم : 59]

“फिर उनके बाद ऐसे नाख़लफ (अयोग्य लोग) पैदा हुए कि उन्हों ने नमाज़ को नष्ट कर दिया और मन की इच्छाओं के पीछे पड़ गये।” (सूरत मर्यम : 59)

की व्याख्या करते हुए उल्लेख किया है। तथा इब्ने क़ैयिम ने किताबुस्सलात में वर्णन किया है कि यही इमाम शाफेई के मत में एक रूप है, और तहावी ने शाफेई से उल्लेख किया है।

और यही जमहूर सहाबा (सहाबा की बहुमत) का मत है, बल्कि कई एक ने इस पर उनकी सर्वसहमति का उल्लेख किया है।

अब्दुल्लाह बिन शक़ीक फरमाते हैं : नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा नमाज़ छोड़ने के सिवा किसी और काम के छोड़ने को कुफ्र नहीं समझते थे। इसे तिर्मिज़ी और हाकिम ने रिवायत किया है और हाकिम ने इसे बुखारी व मुस्लिम की शर्त पर सही कहा है।

सुप्रसिद्ध इमाम इसहाक़ बिन राहवैह ने फरमाया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित है कि नमाज़ छोड़ने वाला काफिर है। और इसी प्रकार नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़माने से लेकर हमारे आज के समय तक के विद्वानों (उलमा) का विचार यही रहा है कि जान बूझकर बिना किसी शरई उज़्र के नमाज़ छाड़ देने वाला यहाँ तक कि उसका समय निकल जाए, काफिर है।

तथा इब्ने हज़्म ने उल्लेख किया है कि यही विचार उमर, अब्दुर्रहमान बिन औफ़, मुआज़ बिन जबल, अबू हुरैरा और इनके अलावा अन्य सहाबा से वर्णित है। और उन्हों ने कहा कि हम इन लोगों (उपर्युक्त सहाबा) का सहाबा में से कोई विरोध करने वाला नहीं जानते हैं। इस बात को मुनज़िरी ने अपनी किताब “तरगीब व तरहीब” में उनसे वर्णन किया है और सहाबा में से इन लोगों की वृद्धि की है : अब्दुल्लाह बिन मसऊद, अब्दुल्लाह बिन अब्बास, जाबिर बिन अब्दुल्लाह, अबू दरदा रज़ियल्लाहु अन्हुम। उन्हों ने कहा: सहाबा के अलावा में से अहमद बिन हंबल, इसहाक़ बिन राहवैह, अब्दुल्लाह बिन मुबारक, नखई, हकम बिन उतैबा, अय्यूब सखतियानी, अबू दाऊद अत्तयालिसी, अबू बक्र बिन अबी शैबा, जुहैर बिन हर्ब वगैरह हैं। (अंत)

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।

स्रोत: रिसालह फी हुक्मे तारिकिस्सलात लिश्शैख मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन
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