Thu 24 Jm2 1435 - 24 April 2014
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काफिरों को दोस्त बनाने का क्या मतलब है ॽ और काफिरों से मिश्रण का क्या हुक्म है ॽ

क़ुर्आन में वर्णित है कि हमारे लिए काफिरों (नास्तिकों, अविश्वासियों, अधर्मियों, अनेकेश्वरवादियों) को दोस्त बनाना जाइज़ नहीं है, परंतु इसका अभिप्राय क्या है ॽ मेरा मतलब यह है कि किस हद तक यह जाइज़ है ॽ क्या हमारे लिए उनके साथ मामला करना जाइज़ है ॽ मैं पढ़ता हूं, तो क्या हमारे लिए उनके साथ बास्केट बॉल खेलना जाइज़ है ॽ क्या हम उनके साथ बास्के टबॉल आदि के बारे में बात कर सकते हैं ॽ क्या हम उनकी संगत अपना सकते हैं जबकि वे अपने आस्था के मामलों को अपने तक ही रखते हैं ॽ
मैं इसके बारे में इसलिए प्रश्न कर रहा हूँ क्योंकि मैं एक व्यक्ति को जानता हूँ जो इसी तरह उनके साथ रहता है और उसका उनके साथ रहना उसके आस्था पर कोई प्रभाव नहीं डालता है, लेकिन इसके बावजूद मैं उस से कहता हूँ : “तुम इन लोगों के बजाय मुसलमानों के साथ क्यों नहीं रहते हो ॽ” और वह यह जवाब देता है कि : अधिकांश - या कई एक - मुसलमान अपने एकत्र होने के स्थान में शराब पीते हैं और नशीले पदार्थ सेवन करते हैं, तथा उनके साथ गर्लफ्रेंड होती हैं, और वह इस बात से डरता है कि इन मुसलमानों के पाप उसे लुभा सकते हैं, किंतु उसे विश्वास है कि काफिरों का कुफ्र उसे कदापि प्रलोभित नहीं कर सकता है, क्योंकि वह एक ऐसी चीज़ है जो उसके लिए प्रलोभित करने वाली – आकर्षक - नहीं है, तो क्या उसका काफिरों के साथ रहना, खेलना, और खेल के बारे में बात चीत करना “मोमिनों को छोड़कर काफिरों को दोस्त बनाने” में शुमार होगाॽ”
हर प्रकार की प्रशंसा और स्तुति केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

अल्लाह तआला ने मोमिनों (विश्वासियों) पर काफिरों –अविश्वासियों - को दोस्त बनाना निषेद्ध कर दिया है और इस पर बहुत सख्त धमकी दी है। अल्लाह तआला ने फरमाया :

﴿يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لا تَتَّخِذُوا الْيَهُودَ وَالنَّصَارَى أَوْلِيَاءَ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ وَمَنْ يَتَوَلَّهُمْ مِنْكُمْ فَإِنَّهُ مِنْهُمْ إِنَّ اللَّهَ لا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ ﴾ [المائدة : 51]. 

“ऐ विश्वासियो (ईमानवालो !), तुम यहूदियों और ईसाईयों को दोस्त न बनाओ, यह तो आपस में एक दूसरे के दोस्त हैं, तुम में से जो कोई भी इनसे दोस्ती करे तो वह उन्हीं में से है, अल्लाह तआला ज़ालिमों को कभी हिदायत नहीं देता।” (सूरतुल माइदा : 51).

शैख शंक़ीती रहिमहुल्लाह ने फरमाया :

“इस आयत में अल्लाह तआला ने उल्लेख किया है कि मुसलमानों में से जो व्यक्ति यहूदियों और ईसाईयों से दोस्ती करेगा, वह उन्हें दोस्त बनाने के कारण उन्हीं में से हो जायेगा। तथा एक अन्य स्थान पर वर्णन किया है कि उनसे दोस्ती रखना अल्लाह की अप्रसन्नता (क्रोध) और उसके प्रकोप में अनंत के लिए रहने का कारण है, और यह कि यदि उनको दोस्त बनाने वाला मुसलमान होता तो उन्हें दोस्त न बनाता, और वह अल्लाह तआला का यह फरमान हैः  

﴿تَرَى كَثِيرًا مِنْهُمْ يَتَوَلَّوْنَ الَّذِينَ كَفَرُوا لَبِئْسَ مَا قَدَّمَتْ لَهُمْ أَنفُسُهُمْ أَنْ سَخِطَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ وَفِي الْعَذَابِ هُمْ خَالِدُونَ  وَلَوْ كَانُوا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالنَّبِيِّ وَمَا أُنزِلَ إِلَيْهِ مَا اتَّخَذُوهُمْ أَوْلِيَاءَ وَلَكِنَّ كَثِيرًا مِنْهُمْ فَاسِقُونَ﴾ [المائدة: 80-81]

“आप उनमें से अघिकांश लोगों को देखेंगे कि वे काफिरों से दोस्ती करते हैं, जो कुछ उन्हों ने अपने आगे भेज रखा है वह बहुत बुरा है, (यह) कि अल्लाह (तआला) उन से नाराज़ हुआ और वे हमेशा अज़ाब में रहेंगे। अगर वे अल्लाह पर, पैगंबर और जो उनकी तरफ उतारा गया है, उस पर ईमान रखते तो वे काफिरों को दोस्त न बनाते, परंतु उन में से अधिकांश लोग दुराचारी हैं।” (सूरतुल माइदा : 80, 81).

तथा एक अन्य स्थान पर, उनसे घृणित करने के कारण को स्पष्ट करते हुए, उन्हें दोस्त बनाने से मना किया है, और वह अल्लाह तआला का यह फरमान है :

﴿ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لا تَتَوَلَّوْا قَوْمًا غَضِبَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ قَدْ يَئِسُوا مِنْ الآخِرَةِ كَمَا يَئِسَ الْكُفَّارُ مِنْ أَصْحَابِ الْقُبُورِ ﴾ [الممتحنة : 13].

“ऐ विश्वासियो (मुसलमानो), तुम उस क़ौम से दोस्ती न करो, जिन पर अल्लाह का क्रोध (प्रकोप) आ चुका है, जो आखिरत से इस तरह निराश हो चुके हैं जैसेकि मरे हुए क़ब्र वालों से काफिर मायूस हो चुके हैं।” (सूरतुल मुमतहिना : 13).

तथा एक दूसरे स्थान पर इस बात को स्पष्ट किया है कि इस (निषेद्ध) का स्थान यह है कि जब दोस्ती रखना किसी डर और बचाव के कारण न हो, और यदि वह दोस्ती इसी के कारण है तो ऐसा करने वाला व्यक्ति माज़ूर (क्षम्य) है, और वह अल्लाह तआला का यह फरमान है :

﴿ لا يَتَّخِذْ الْمُؤْمِنُونَ الْكَافِرِينَ أَوْلِيَاءَ مِنْ دُونِ الْمُؤْمِنِينَ وَمَنْ يَفْعَلْ ذَلِكَ فَلَيْسَ مِنْ اللَّهِ فِي شَيْءٍ إِلا أَنْ تَتَّقُوا مِنْهُمْ  تُقَاةً ﴾ [آل عمران : 28].

“मोमिनों को चाहिए कि ईमानवालों को छोड़कर काफिरों को अपना दोस्त न बनायें, और जो ऐसा करेगा तो अल्लाह तआसा से उसका कोई संबंध नहीं है (अल्लाह से बेज़ार है), सिवाय इसके कि तुम उनके डर से किसी तरह की हिफाज़त का इरादा करो।” (सूरत आल इमरान : 28).

इस आयत में उन सभी आयतों का स्पष्टीकरण है जो काफिरों से सामान्य रूप से दोस्ती से मना करने वाली हैं कि : इसका स्थान चयन (और स्वेच्छा) की स्थिति में है, लेकिन भय और तक़िय्या (वचाव व सावधानी) की हालत में उनसे दोस्ती रखने की छूट दी गई है केवल इतनी मात्रा में जिसके द्वारा उनकी बुराई से बचा जा सके, तथा इसके अंदर उस दोस्ती से दिल का पवित्र और साफ होना आवश्यक है, और जो व्यक्ति किसी चीज़ को मजबूरी में करता है वह उस आदमी के समान नहीं है जो उसे अपने चुनाव से करता है।

और इन आयतों के प्रत्यक्ष अर्थ से यह समझ में आता है कि जिस व्यक्ति ने काफिरों से जानबूझकर इच्छापूर्वक और उनके अंदर अभिरूचि रखते हुए दोस्ती की तो वह उन्हीं के समान काफिर है।” अंत हुआ

“अज़वाउल बयान“ (2 /98, 99)

तथा काफिरों से दोस्ती रखने के निषिद्ध (हराम) रूपों में से : उन्हें मित्र और संगी बनाना, उनके साथ खाना और खेलना भी है।

प्रश्न संख्या 10342 के उत्तर में हम ने शैख इब्ने बाज़ का निम्नलिखित कथन उल्लेख किया है :

  “काफिर के साथ खाना हराम नहीं है यदि आवश्यकता या धर्मिक हित इसकी अपेक्षा करता है, मगर आप उन्हें साथी न बनाएं कि बिना किसी धार्मिक कारण या धार्मिक हित के उनके साथ खाने लगें, तथा उनकी दिलजोई न करें और न उनके साथ न हंसे, लेकिन यदि उसकी ज़रूरत पड़ जाए जैसे कि मेहमान के साथ खाना या इसलिए ताकि उन्हें अल्लाह की ओर आमंत्रित करे और हक़ (सत्य धर्म) की ओर मार्गदर्शन करे या अन्य धार्मिक कारणों के लिए हो, तो इसमें कोई हर्ज नहीं है।

और अहले किताब (यहूदियों और ईसाइयों) के खाने (ज़बीहे) के हलाल होन का तक़ाज़ा यह नहीं है कि उन्हें मित्र और पार्षद बनायें और न ही वह इस बात का तक़ाज़ा करता है कि बिना आवश्यकता और धार्मिक हित के उनके साथ खाने पीने में साझा करें।” अंत हुआ।

तथा शैख मुहम्मद सालेह अल उसैमीन रहिमहुल्लाह से : काफिरों के साथ उनके इस्लाम की आशा में घुल मिल कर रहने और उनके साथ नर्मी और आसानी का व्यवहार करने के हुक्म के बारे में पूछा गया :

तो उन्हों ने उत्तर दिया : “इसमें कोई संदेह नहीं कि मुसलमान पर अनिवार्य है कि वह अल्लाह के दुश्मनों से द्वेष रखे और उनसे अलगाव प्रकट करे ; क्योंकि यही पैगंबरों और उनके अनुयायियों का तरीक़ा है, अल्लाह तआला ने फरमाया :

﴿ قَدْ كَانَتْ لَكُمْ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ فِي إِبْرَاهِيمَ وَالَّذِينَ مَعَهُ إِذْ قَالُوا لِقَوْمِهِمْ إِنَّا بُرَآءُ مِنْكُمْ وَمِمَّا تَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ كَفَرْنَا بِكُمْ وَبَدَا بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمُ الْعَدَاوَةُ وَالْبَغْضَاءُ أَبَداً حَتَّى تُؤْمِنُوا بِاللَّهِ وَحْدَهُ﴾ [الممتحنة :4]

(मुसलमानो!) तुम्हारे लिए इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) और उनके साथियों में बहुत अच्छा आदर्श (नमूना) है, जबकि उन सब ने अपनी क़ौम से साफ शब्दों में कह दिया कि हम तुम से और जिन-जिन कि तुम अल्लाह के सिवाय पूजा करते हो, उन सबसे पूरी तरह से विमुख (बरी) हैं। हम तुम्हारे (अक़ीदे का) इंकार करते हैं, और जब तक तुम अल्लाह के एक होने पर ईमान न लाओ हमारे और तुम्हारे बीच हमेशा के लिए बैर और द्वेष पैदा हो गया।” (सूरतुल मुमतहिना : 4).

तथा अल्लाह तआला ने फरमाया :

﴿ لا تَجِدُ قَوْماً يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الآخِرِ يُوَادُّونَ مَنْ حَادَّ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَلَوْ كَانُوا آبَاءَهُمْ أَوْ أَبْنَاءَهُمْ أَوْ إِخْوَانَهُمْ أَوْ عَشِيرَتَهُمْ أُولَئِكَ كَتَبَ فِي قُلُوبِهِمُ الأِيمَانَ وَأَيَّدَهُمْ بِرُوحٍ مِنْهُ ﴾ [المجادلة : 22]

“आप अल्लाह और आखिरत के दिन पर ईमान रखने वालों को ऐसा नहीं पाएंगे कि वह अल्लाह और उसके पैग़ंबर से दुश्मनी रखने वालों से दोस्ती रखते हों, चाहे वे उनके बाप, या उनके बेटे, या उनके भाई, या कुंबे - क़बीले वाले ही क्यों न हों, यही लोग हैं जिनके दिलों में अल्लाह तआला ने ईमान को लिख दिया है और जिनका पक्ष अपनी रूह से किया है।” (सूरतुल मुजादिलाः 22)

इस आधार पर मुसलमान के लिए जाइज़ नहीं है कि उसके दिल में अल्लाह के दुश्मनों के लिए स्नेह और प्यार पैदा हो जो वास्तव में उसके ही दुश्मन हैं, अल्लाह तआला ने फरमाया :

﴿ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لا تَتَّخِذُوا عَدُوِّي وَعَدُوَّكُمْ أَوْلِيَاءَ تُلْقُونَ إِلَيْهِمْ بِالْمَوَدَّةِ وَقَدْ كَفَرُوا بِمَا جَاءَكُمْ مِنَ  الْحَقِّ يُخْرِجُونَ الرَّسُولَ وَإِيَّاكُمْ أَنْ تُؤْمِنُوا بِاللَّهِ رَبِّكُمْ ﴾ [الممتحنة : 1]

“ऐ ईमान वालो ! मेरे और अपने दुश्मनों को अपना दोस्त न बनाओ, तुम तो दोस्ती से उनकी ओर संदेश भेजते हो और वे उस सच को जो तुम्हारे पास आ चुका है इंकार करते हैं, वे पैगंबर को और स्वयं तुम को भी केवल इस वजह से निकालते हैं कि तुम अपने रब अल्लाह पर ईमान रखते हो।” (सूरतुल मुमतहिना : 1).

जहाँ तक इस बात का संबंध है कि मुसलमान इस्लाम स्वीकारने और ईमान लाने की आशा में उनके साथ नरमी और आसानी का व्यवहार करता है, तो इसमें कोई हर्ज की बात नहीं है, क्योंकि वह इस्लाम पर दिलजोई करने के अंतर्गत आता है, किंतु यदि वह उनसे निराश हो जाए तो उनके साथ वैसा ही व्यवहार करेगा जैसा व्यवहार किए जाने के वे योग्य हैं, इसे विद्वानों की किताबों में विस्तार के साथ वर्णन किया गया है विशेष रूप से इब्नुल क़ैयिम रहिमहुल्लाह की पुस्तक “अहकामो अह्लिजि़्ज़म्मह” में। अंत हुआ।

“मजमूओ फतावा अश्शैख इब्ने उसैमीन” (3/प्रश्न संख्या : 389).

दूसरा :

जहाँ तक इस आदमी का यह कहना है कि : वह मुसलमान पापियों के साथ मेल मिलाप नहीं रखता है इस डर से कि उनका पाप उसे प्रलोभित न कर दे, लेकिन काफिरों का कुफ्र उसे कदापि प्रलोभित नहीं करेगा।

तो इसका उत्तर यह है कि उस से कहा जायेगा :

जहाँ तक उसके पापियों के साथ  मेल मिलाप और लगाव न रखने की बात है, तो उसने बहुत अच्छा किया है, यदि वह उन्हें नसीहत करने और बुराई से रोकन पर सक्षम नहीं है, और उसे उनके पाप और अवज्ञा में पड़ जाने और उसे अच्छा समझने का भय है।

लेकिन जहाँ तक उसका काफिरों के साथ मेल मिलाप रखने का मामला है, तो काफिरों के साथ मेल मिलाप रखने से निषेद्ध का कारण केवल कुफ्र में पड़ने का भय नहीं है, बल्कि इस प्रावधान के सबसे स्पष्ट कारणों में से : उनका अल्लाह, उसके पैगंबर और मोमिनों से दुश्मनी रखना है, अल्लाह तआला ने इस कारण की ओर अपने इस कथन के द्वारा संकेत किया है :

﴿ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لا تَتَّخِذُوا عَدُوِّي وَعَدُوَّكُمْ أَوْلِيَاءَ تُلْقُونَ إِلَيْهِمْ بِالْمَوَدَّةِ وَقَدْ كَفَرُوا بِمَا جَاءَكُمْ مِنَ  الْحَقِّ يُخْرِجُونَ الرَّسُولَ وَإِيَّاكُمْ أَنْ تُؤْمِنُوا بِاللَّهِ رَبِّكُمْ ﴾ [الممتحنة : 1]

“ऐ ईमान वालो ! मेरे और अपने दुश्मनों को अपना दोस्त न बनाओ, तुम तो दोस्ती से उनकी ओर संदेश भेजते हो और वे उस सच को जो तुम्हारे पास आ चुका है इंकार करते हैं, वे पैगंबर को और स्वयं तुम को भी केवल इस वजह से निकालते हैं कि तुम अपने रब अल्लाह पर ईमान रखते हो।” (सूरतुल मुमतहिना : 1).

तो एक मुसलमान को यह कैसे शोभा देता है कि वह अल्लाह और उसके रसूल के दुश्मन के साथ रहे और उससे दोस्ती रखे ॽ!

फिर यह व्यक्ति उनके तरीक़े को अच्छा समझने से कैसे निर्भय हो सकता है ॽ जबकि बहुत से मुसलमान काफिरों के साथ रहने और उनके देशों मे निवास करने के कारण कुफ्र (नास्तिकता) और अधर्म में गिर चुके हैं और इस्लाम से पलट गए हैं। चुनांचे कुछ यहूदी बन गए, कुछ ईसाई बन गए, और कुछ ने नास्तिक दार्शनिक सिद्धांतों को अपना लिया।

हम अल्लाह तआला से प्रश्न करते हैं कि वह हमें अपने धर्म पर सुदृढ़ रखे।

तथा प्रश्न संख्या (2179) का उत्तर देखिए, उसमें महान नियम : “काफिरों से दोस्ती रखने का निषेद्ध” का स्पष्टीकरण है, तथा उसमें उस वर्जित दोस्ती (वफादारी) के बहुत से रूपों का उल्लेख है।

तथा प्रश्न संख्या (43270) के उत्तर में इस बात के कहने का हुक्म पायेंगे कि काफिरों का रवैया मुसलमानों के शिष्टाचार व रवैये से श्रेष्ठतर है, तथा उसमें इस बात के कहने के निषेद्ध के बारे में शैख इब्ने बाज़ के कथन का उद्धरण है।

तथा प्रश्न संख्या (26118 , 23325) के उत्तर में काफिर की संगत अपनाने और उससे दोस्ती रखने के निषेद्ध का वर्णन है।

 

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।
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