Thu 17 Jm2 1435 - 17 April 2014
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उसकी माँ कुफ्र की अवस्था में मर गई तो क्या वह उसके लिए दुआ कर सकता है ?

क्या कोई मुसलमान अपनी ग़ैर-मुस्लिम माँ के निधन के बाद उसके लिए दुआ कर सकता है?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

अल्लाह तआला ने अपनी किताब (कुरआन) में फरमाया है:

]ما كان للنبي والذين آمنوا أن يستغفروا للمشركين ولو كانوا أولي قربى من بعد ما تبين لهم أنهم أصحاب الجحيم [ [التوبة . 116]

“पैगंबर तथा दूसरे मुसलमानों के लिए वैध नहीं कि मुश्रेकीन के लिए क्षमा की दुआ मांगें यद्यपि वे रिश्तेदार ही हों इस बात के स्पष्ट हो जाने के बाद कि ये लोग नरकवासी हैं।” (सूरत तौबा : 116)

अल्लामा क़ुर्तुबी अपनी किताब अल-हकाम (8/173) में कहते हैं कि यह आयत काफिरों से संबंध विच्छेद करने पर आधारित है चाहे वे जीवित हों या मृतक। क्योंकि अल्लाह तआला ने मोमिनों को मुश्रिकों के लिए इस्तिग़फ़ार (क्षमायाचना) करने की अनुमति नहीं प्रदान की है, अतः, मुश्रिक के लिए माफी की दुआ करना जाइज़ नहीं है।

इसी प्रकार इमाम मुस्लिम ने अपनी सहीह (हदीस संख्या : 916) में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्हों ने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को फरमाते हुए सुना कि : “मैं ने अपने रब (प्रभु) से अपनी माँ के लिए इस्तिगफार करने की अनुमति मांगी तो मुझे इसकी अनुमति नहीं मिली, तथा मैं ने उस से उनकी क़ब्र की ज़ियारत की अनुमति मांगी तो उसने मुझे इसकी अनुमति प्रदान कर दी।”

यह हदीस स्पष्ट करती है कि अल्लाह तआला ने अपने नबी को, जबकि आप पूरी मानव जाति में सब से उत्तम सृष्टि हैं, अपनी मॉ के लिए उनकी मृत्यु के बाद इस्तिगफार करने की अनुमति प्रदान नहीं की। तथा इसी चीज़ (अर्थात काफिर के लिए इस्तिगफार) से अल्लाह तआला ने पिछली आयत में मना किया है। और यह हदीस इस विषय में स्पष्ट प्रमाण है। तथा इमाम शौकानी फत्हुल क़दीर (2/410) में फरमाते हैं कि यह आयत काफिरों से मित्रता को खत्म करने तथा उन के लिए इस्तिगफार और अवैध दुआ करने की हुर्मत (निषेद्ध) पर आधारित है। (शौकानी की बात का अंत हुआ)

अब अगर कोई यह कहे कि इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने काफिर बाप के लिए इस्तिग़फार किया जिस को कुरआन ने इन श्ब्दों में बयान किया है:

]قَالَ سَلامٌ عَلَيْكَ سَأَسْتَغْفِرُ لَكَ رَبِّي إِنَّهُ كَانَ بِي حَفِيًّا[ [سورة مريم:47]   

“कहा, अच्छा तुम पर सलाम हो, मैं तो अपने पालनहार से तुम्हारी बख्शिश की दुआ करूंगा, वह मुझ पर बहुत दयालू है।" (सूरत मरयम : 47)

इसका उत्तर यह है जो अल्लाह तआला ने अपने इस फरमान में वर्णन किया हैः

]وَمَا كَانَ اسْتِغْفَارُ إِبْرَاهِيمَ لأَبِيهِ إِلا عَنْ مَوْعِدَةٍ وَعَدَهَا إِيَّاهُ فَلَمَّا تَبَيَّنَ لَهُ أَنَّهُ عَدُوٌّ لِلَّهِ تَبَرَّأَ مِنْهُ إِنَّ إِبْرَاهِيمَ لأَوَّاهٌ حَلِيمٌ [ [سورة التوبة: 114] 

“और इब्राहीम अलैहिस्सलाम का अपने बाप के लिए बख्शिश की दुआ मांगना वह केवल वादा के कारण था जो उन्हों ने उस से वादा कर लिया था। फिर जब उन पर यह बात प्रत्यक्ष हो गई कि वह अल्लाह का दुश्मन है तो वह उस से ला-ताल्लुक़ हो गये।” (सूरत तौबा : 114)

इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु ने इस आयत की तफसीर करते हुऐ फरमाया: जब इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पिता का निधन हो गया, तो आपके लिए यह बात स्पष्ट हो गई कि वह अल्लाह के दुश्मन थे। (तफसीर इबने कसीर )

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।
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