Wed 23 Jm2 1435 - 23 April 2014
65754

रमज़ान के महीने में क़ुरआन ख़त्म करना मुसतहब है

आप से अनुरोध है कि मुझे इस बात से सूचित करें कि क्या मुसलमान पर रमज़ान के महीने के दौरान क़ुरआन ख़त्म करना अनिवार्य है ? यदि इसका जवाब हाँ में है तो कृपया इस बात की पुष्टि करने वाली हदीस उल्लेख करें।

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

सर्व प्रथम :

सम्मानित प्रश्नकर्ता का मसअले को उसके प्रमाण के साथ जानने की अभिलाषा पर धन्यवाद है, और इसमें कोई संदेह नहीं कि यह एक अपेक्षित चीज़ है, जिसके लिए प्रत्येक मुसलमान को प्रयास करना चाहिए, ताकि वह क़ुरआन व हदीस का पालन करने वाला बने।

अल्लामा शौकानी रहिमहुल्लाह ‘‘इरशादुल फुहूल’’ (450-451) में फरमाते हैं कि :

‘‘जब आपके लिए यह बात निर्धारित हो गई कि सामान्य व्यक्ति ज्ञानी से पूछेगा, और इज्तिहाद में कोताही करनेवाला संपूर्ण मुजतहिद (मुजतहिद कामिल) से पूछेगा, तो उसे चाहिए कि धर्मनिष्ठ और मुकम्मल वरअ वाले (यानी ऐसा परहेज़गार जो संदिग्ध चीज़ों से सावधान रहता है) विद्वानों से क़ुरआन व हदीस के ज्ञानी, उनमें जो कुछ है उसका जानकार और उन दोनों को समझने के लिए जिन सहायक विज्ञानों की आवश्यकता होती है उनसे सूचित विद्वान के बारे में पूछे ताकि वे लोग उसकी ऐसे व्यक्ति की ओर मार्गदर्शन करें। फिर वह ऐसे ज्ञानी से अपनी समस्या के बारे में प्रश्न करे और उसके बारे में अल्लाह सर्वशक्तिमान की किताब या पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत में जो कुछ (प्रमाण) वर्णित है उसका मुतालबा करे। तो उस वक्त वह हक़ को उसके खान से लेने और हुक्म को उसके स्थान से लेनेवाला होगा, और उस राय से आराम (छुटकारा) पा जायेगा जिसको लेनेवाला शरीअत के विरूध और हक़ के विपरीत गलती में पड़ने से सुरक्षित नहीं रहता है।’’ अंत हुआ।

तथा इब्नुस्सलाह की किताब ‘‘अदबुल मुफती वल मुसतफती’’ (पृष्ठ 171) में है :

‘‘और अस-समआनी ने उल्लेख किया है कि इस बात में कोई रूकावट नहीं है कि वह (यानी फत्वा पूछनेवाला) अपनी सावधनी (एहतियात) के लिए मुफती से दलील की मांग करे, और उसके लिए ज़रूरी है कि उसके लिए दलील को ज़िक्र करे यदि वह क़तई (निश्चित) है, और अगर वह क़तई नहीं है तो उसके लिए ऐसा करना आवश्यक नहीं है, क्योंकि उसमें इज्तिहाद की ज़रूरत होती है जो आम आदमी की समझ से बाहर है। और अल्लाह तआला ही ठीक बात को बेहतर जानता है।’’ अंत हुआ।

दूसरा :

जी हाँ, मुसलमान के लिए मुसतहब (ऐच्छिक) है कि वह रमज़ान में अधिक से अधिक क़ुरआन का पाठ करे और उसे खत्म करने के लिए लालायित बने, किंतु यह उसके ऊपर अनिवार्य नहीं है, मतलब यह कि यदि उसने क़ुरआन खत्म नहीं किया तो वह गुनाहगार (दोषी) नहीं होगा, परंतु वह अपने आप को बहुत सारे अज्र व सवाब से वंचित कर देगा।

इस बात का प्रमाण वह हदीस है जिसे बुखारी (हदीस संख्या : 4614) ने अबू हुरैरा रजियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि : ‘‘जिब्रील अलैहिस्सलाम प्रति वर्ष एक बार नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर क़ुरआन को पेश करते थे, और जिस वर्ष आपका निधन हुआ उन्हों ने आप पर उसे दो बार पेश किया।’’

इब्नुल असीर ने अपनी किताब ‘‘अल-जामिओ फी गरीबिल हदीस’’ (4/64) में फरमाया :

‘‘अर्थात जो कुछ क़ुरआन उतर चुका होता था उसे वह आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ मिलकर पढ़ते और दोहराते थे।’’ अंत हुआ।

सलफ (पूर्वज) रज़ियल्लाहु अन्हुम का तरीक़ा यह था कि वे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण करते हुए रमज़ान के महीने में क़ुरआन खत्म करने के बहुत अभिलाषी और लालायित होते थे।

इब्राहीम नखई से वर्णित है कि उनहों ने कहा : असवद रमज़ान के महीने में प्रति दो रोतों में क़ुरआन खत्म करते थे।’’ ‘‘सियर आलामुन नुबला’’ (4/51).

तथा क़तादा सात दिन में क़ुरआन खत्म करते थे, और जब रमज़ान का महीना आता तो हर तीन दिन में खत्म करते थे, और जब रमज़ान की अंतिम दहाई आती थी तो हर रात में क़ुरआन खत्म करते थे।’’ ‘‘सियर आलामुन नुबला’’ (5/276).

तथा मुजाहिद के बारे में है कि वह रमज़ान में हर रात में क़ुरआन खत्म करते थे। नववी की किताब ‘‘अत-तिबयान’’ (पृष्ठः 74) और उन्हों ने उसकी इसनाद को सही कहा है।

तथा मुजाहिद से वर्णित है कि उन्हों ने कहा : अली अल-अज़्दी रमज़ान के महीने में हर रात में क़ुरआन खत्म करते थे।’’ ‘‘तहज़ीबुल कमाल’’ (2/983).

तथा रबीअ् बिन सुलैमान कहते हैं : इमाम शाफेई रमज़ान के महीने में साठ बार क़ुरआन खत्म करते थे। ‘‘सियर आलामुन नुबला’’ (10/36).

क़ासिम बिन हाफिज़ इब्ने असाकिर कहते हैं: मेरे पिता (यानी हाफिज़ इब्ने असाकिर) जमाअत की नमाज़ और क़ुरआन की तिलावत के पाबंद थे, हर जुमा को क़ुरआन खत्म करते थे, और रमज़ान के महीने में प्रति दिन क़ुरआन खत्म करते थे। ‘‘सियर आलामुन नुबला’’ (20/562).

नववी रहिमहुल्लाह ने क़ुरआन खत्म करने की मात्रा के बारे में टिप्पणी करते हुए फरमाया :

‘‘पसंदीदा बात यह है कि यह अलग अलग लोगों के साथ अलग अलग होता है, अतः जिस व्यक्ति के लिए सूक्ष्म विचार और चिंतन से लताइफ व मआरिफ (यानी उसकी बारीकियाँ और गहरे अर्थ) प्रत्यक्ष होते हों, तो वह उतनी मात्रा पर निर्भर करे जिससे वह जो कुछ पढ़ रहा है उसे पूरी तरह समझ सके, इसी तरह वह व्यक्ति भी है जो ज्ञान के प्रसार या इसके अलावा दीन के अन्य महत्पूर्ण कामों और सामान्य मुसलमानों के हितों में व्यस्त हो, तो वह उतनी मात्रा पर बस करे जिसके कारण उस काम में गड़बड़ी और खराबी न पैदा हो जिसके लिए वह तैयार किया गया है।

और यदि वह इन उपर्युक्त लोगों में से नही है तो उससे जितना हो सके अधिक से अधिक क़ुरआन पढ़े, लेकिन वह थकावट और जल्दी जल्दी पढ़ने की सीमा को न पहुँचे।’’ अंत हुआ। ‘‘अत-तिब्यान’’ (पृष्ठ 76).

रमज़ान में क़ुरआन पढ़ने और उसे खत्म करने पर इस तरह ज़ोर दिए जाने के बावजूद यह मुसतहब (ऐच्छिक) चीज़ों के दायरे में ही रहता है, और वह उन ज़रूरी और आवश्यक चीज़ों में से नहीं है जिनके छोड़ने से मुसलमान गुनहगार होता है।

शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह से प्रश्न किया गया: क्या रोज़ेदार पर रमज़ान के महीने में क़ुरआन खत्म करना अनिवार्य है ?

तो उन्हों ने उत्तर दिया :

‘‘रोज़ेदार के लिए रमज़ान के महीने में क़ुरआन खत्म करना अनिवार्य नहीं है, लेकिन इंसान को चाहिए कि रमज़ान के महीने में अधिक से अधिक क़ुरआन पढ़े, जैसाकि यह पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का तरीक़ा (सुन्नत) था, चुनांचे पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को जिब्रील अलैहिस्सलाम हर रमज़ान में क़ुरआन पुनः अवलोकन करवाते थे।’’ अंत हुआ।

‘‘मजमूओ फतावा इब्ने उसैमीन’’ (20/516)

तथा प्रश्न संख्या: (66063), (26327) देखिए।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।
Create Comments