Sat 19 Jm2 1435 - 19 April 2014
69829

उसने निवासी होने के बावजूद तीन दिन मसह किया तो क्या वह दो दिन की नमाज़ें दोहरायेगा ॽ

मैं ने वुज़ू किया और लगातार तीन दिन तक वही मोज़े पहने रहा, तीन दिनों के दौरान उन्हें नहीं उतारा जबकि यह बात ज्ञात है कि जुर्राबों पर मसह करने की अवधि निवासी के लिए एक दिन और एक रात है, क्या दूसरे और तीसरे दिन में मेरी नमाज़ शुद्ध है या कि मेरे ऊपर उन्हें दोहराना अनिवार्य है क्योंकि मसह के लिए अनुमेय अवधि की मुखालफत हुई है ॽ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए है।

सर्व प्रथम :

सहीह सुन्नत (हदीस) से पता चलता है कि मोज़ों पर मसह करने की अवधि निवासी के लिए एक दिन और एक रात, तथा मुसाफिर के लिए तीन दिन और रात है, और जुर्राबों पर मसह करना, मोज़ों पर मसह करने के समान ही है।

मुस्लिम (हदीस संख्याः 276) ने शुरैह बिन हानी से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा : मैं आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा के पास उनसे मोज़ों पर मसह करने के बारे में प्रश्न करने के लिए आया, तो उन्हों ने कहा: तुम इब्ने अबी तालिब के पास जाओ और उनसे पूछो क्योंकि वह अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ यात्रा करते थे, तो हम ने उनसे पूछा : तो उन्हों ने उत्तर दिया : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुसाफिर के लिए तीन दिन उनकी रातों समेत और निवासी के लिए एक दिन और एक रात निर्धारित किया है।’’

तथा तिर्मिज़ी (हदीस संख्याः 95), अबू दाऊद (हदीस संख्याः 157) और इब्ने माजा (हदीस संख्याः 553) ने ख़ुज़ैमा बिन साबित रज़ियल्लाहु अन्हु से उन्हों ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत किया है कि आप से मोज़े पर मसह के बारे में प्रश्न किया गया तो आप ने फरमाया: “मुसाफिर के लिए तीन दिन और निवासी के लिए एक दिन है।” इसे अल्बानी ने सही तिर्मिज़ी में सही कहा है।

तथा तिर्मिज़ी (हदीस संख्याः 96), नसाई (हदीस संखः 127) और इब्ने माजा (हदीस संख्याः 478) ने सफवान बिन अस्साल रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा : “अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हमें आदेश देते थे कि जब हम यात्रा में हों तो तीन दिन रात अपने मोज़ों को न निकालें सिवाय जनाबत के, किंतु शौच और मूत्र और नींद के कारण नहीं।” इस हदीस को अल्बानी ने हसन कहा है।

दूसरा :

मसह की अवधि के आरंभ के बारे में फुक़हा (धर्म शास्त्रियों) का राजेह कथन यह है कि वह अपवित्रा (यानी वुज़ू टूटने के बाद) पहली बार मसह करने के समय से शुरू होता है, मोज़ा पहनने से नहीं और न तो मोज़ा पहनने के बाद वुज़ू टूटने से। यदि वह फज्र की नमाज़ के लिए वुज़ू करे और मोज़ों को पहन ले, फिर सुबह नौ बजे उसका वुज़ू टूट जाए और वह वुज़ू न करे, फिर वह बारह बजे वुज़ू करे, तो अवधि का आरंभ बारह बजे से शुरू होगा और वह एक दिन और रात अर्थात चौबीस घंटे तक बाक़ी रहेगा।

नववी रहिमहुल्लाह ने फरमाया : “तथा औज़ाई और अबू सौर ने कहा : अवधि की शुरूआत वुज़ू टूटने के बाद मसह करने से होती है। यह अहमद और अबदाऊद की एक रिवायत है, और दलील की दृष्टि से यही राजेह है, और इब्नुल मुंज़िर ने इसे चयन किया है, और इसके समान उमर बिन खत्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णन किया है।” “अल-मजमूअ” (1/512) से अंत हुआ।

और इसी को शैख इब्ने उसैमीन ने राजेह कहा है और फरमाया : “इसलिए कि हदीस के शब्द हैं कि “निवासी मसह करेगा”, “मुसाफिर मसह करेगा।” और उसके ऊपर यह नहीं बोला जा सकता कि वह मसह करने वाला है मगर मसह की क्रिया के द्वारा ही, और यही सहीह है।” “अश्श्रहुल मुम्ते” (1/186).

तीसरा :

विद्वानों के एक समूह ने, जिनमें इब्ने हज़्म और शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिय्या रहिमहुमुल्लाह शामिल हैं, इस बात को चयन किया है कि मसह की अवधि समाप्त होने से तहारत खत्म नहीं होती है, क्योंकि इसका कोई प्रमाण नहीं है, बल्कि तहारत (पवित्रता) सर्वज्ञात वुज़ू तोड़ने वाली चीज़ों से ही समाप्त होती है जैसे हवा खारिज होना। (अल-मुहल्ला 2/151, अल-इख्तियारात अल-फिक़्हिय्या पृष्ठ: 15, अश्शरहुल मुम्ते 1/216.(

इस आधार पर : जो व्यक्ति तहारत की हालत में है और मसह की अवधि ज़ुहर से पहले खत्म हो गई, तो उसके लिए अपनी पिछली तहारत से जुहर और उसके बाद की नमाज़ें पढ़ना जाइज़ है यहाँ तक कि उसका वुज़ू टूट जाए।

और पिछली सभी बातों के आधार पर :

यदि मसह की अवधि समाप्त हो जाए और आप बिना तहारत (वुज़ू) के हैं, तो आपके ऊपर अनिवार्य है कि उन सभी नमाज़ों को दोहराएं जिन्हें आप ने मसह की अवधि समाप्त होने के बाद पढ़ी हैं और उनमें अपने पैरों को नहीं धुला है।

और यदि मसह की अवधि समाप्त हो गई और आप तहारत की हालत में थे, तो आपके ऊपर अनिवार्य है कि उन नमाज़ों को दोहरायें जिन्हें आपने ने मसह की अवधि समाप्त होने के बाद पहली बार वुज़ू टूटने के समय से पढ़ी हैं।

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।
Create Comments