Sun 20 Jm2 1435 - 20 April 2014
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मुसलमानों के लिए बैतुल-मक़्दिस का क्या महत्व है ॽ क्या यहूद का उसमें कोई अधिकार हैॽ

चूँकि मैं एक मुसलमान हूँ, इसलिए निरंतर यह बात सुनता रहता हूँ कि मदीनतुल-क़ुद्स हमारे लिए महत्व पूर्ण है। परंतु इसका कारण क्या है ॽ मैं जानता हूँ कि ईशदूत याक़ूब (अलैहिस्सलाम) ने उस नगर में मस्जिदुल अक़्सा का निर्माण किया, और हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने पिछले ईश्दूतों की उसके अंदर नमाज़ में इमामत करवाई, जिस से संदेश और ईश्वरीय वह्य की एकता की पुष्टि होती है, तो क्या इस नगर के महत्वपूर्ण होने का कोई अन्य मूल कारण भी है ॽ या केवल इस कारण कि हमारा मामला मात्र यहूद के साथ है ॽ मुझे लगता है इस नगर में यहूद का हमसे अधिक हिस्सा है।

हर प्रकार की प्रशंसा और स्तुति केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

सर्व प्रथम : बैतुल मक़्दिस का महत्व :

आप इस बात को जान लें - अल्लाह तआला आप पर दया करे - कि बैतुल मक़्दिस के फज़ाइल बहुत अधिक हैं जिन में से कुछ यह हैं :

- अल्लाह तआला ने क़ुरआन में उसके बारे में वर्णित किया है कि वह मुबारक है, अल्लाह तआला ने फरमाया :

﴿سبحان الذي أسرى بعبده ليلاً من المسجد الحرام إلى المسجد الأقصى الذي باركنا حوله ﴾ [سورة الإسراء :1] 

“बहुत पवित्र है वह अस्तित्व (अल्लाह सर्वशक्तिमान) जो अपने बंदे को रातों रात मस्जिदुल हराम से मस्जिदुल अक़्सा तक ले गया जिसके आपसपास हमने बरकतें (विभूतियाँ) रखी हैं।” (सूरतुल इस्रा : 1).

और अल-क़ुद्स, मस्जिद के आसपास के हिस्से में से है, इस तरह वह मुबारक है।

- अल्लाह तआला ने उसके बारे में वर्णन किया है कि वह मुक़द्दस है, जैसाकि मूसा अलैहिस्सलाम की ज़ुबानी अल्लाह तआला के इस फरमान में है :

﴿ يا قومِ ادخلوا الأرض المقدسة التي كتب الله لكم ﴾ ( سورة المائدة: 21 (

“ऐ मेरी क़ौम के लोगो ! उस मुक़द्दस (पवित्र) धरती में प्रवेश करो, जिसे अल्लाह ने तुम्हारे लिए लिख दी है।” (सूरतुल मायदा : 21)

- उसके अंदर मस्जिदुल अक़्सा है, जिसमें नमाज़ पढ़ना अढ़ाई सौ (250) नमाज़ों के बराबर है।

अबू ज़र्र रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्हों ने फरमाया : हम ने पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास यह चर्चा किया कि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मस्जिद सर्वश्रेष्ठ है या बैतुल मक़्दिस ॽ तो पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : “मेरी मस्जिद में एक नमाज़ उसमें (अर्थात मस्जिदुल अक़सा में) चार नमाज़ों से श्रेष्ठतर है और वह कितना ही अच्छा नमाज़ी है, और निकट ही ऐसा समय आयेगा कि आदमी के लिए उसके घोड़े के बांधने भर की ज़मीन का होना जहाँ से वह बैतुल मक़्दिस को देख सके, उसके लिए दुनिया की सारी चीज़ों से बेहतर होगा।” इसे हाकिम (4/509) ने रिवायत करके सहीह कहा है, और ज़ह्बी तथा अल्बानी ने इस पर सहमति जताई है जैसाकि “अस-सिलसिला अस्सहीहा” में हदीस संख्या (2902) पर चर्चा के अंत में है।

मस्जिद नबवी में एक नमाज़ एक हज़ार नमाज़ के बराबर है, तो इस तरह मस्जिदुल अक़्सा में एक नमाज़ अढ़ाई सौ (250) नमाज़ों के बराबर होगी।

जहाँ तक उस सुप्रसिद्ध हदीस का संबंध है जिसमें वर्णित है कि उसके अंदर एक नमाज़ पाँच सौ नमाज़ों के बराबर है तो वह हदीस ज़ईफ (कमज़ोर) है। देखिए : “तमामुल मिन्नह” लिश्शैख अल्बानी रहिमहुल्लाह (पृष्ठ 292).

- काना दज्जाल उसमें प्रवेश नहीं करेगा, क्योंकि हदीस में है कि : “वह पूरी धरती पर प्रकट करेगा सिवाय हरम और बैतुल मक़्दिस के।” इसे अहमद (हदीस संख्या : 19665) ने रिवायत किया है और इब्ने खुज़ैमा (2/327) और इब्ने हिब्बान (7/102) ने इसे सहीह कहा है।

- तथा दज्जाल उसी के निकट क़त्ल किया जायेगा, जिसे मसीह ईसा बिन मरियम अलैहिस्सलाम क़त्ल करेंगे, जैसाकि हदीस में आया है कि “इब्ने मरियम दज्जाल को लुद्द नामी द्वार पर क़त्ल करेंगे।” इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 2937) ने नव्वास बिन सम्आन की हदीस से रिवायत किया है। “लुद्द” बैतुल मक़्दिस के निकट एक स्थान है।

- पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को रातों रात मस्जिदुल हराम से मस्जिदुल अक़्सा ले जाया गया, अल्लाह तआला ने फरमाया :

﴿سبحان الذي أسرى بعبده ليلاً من المسجد الحرام إلى المسجد الأقصى ﴾ [سورة الإسراء :1]

“बहुत पवित्र है वह अस्तित्व (अल्लाह सर्वशक्तिमान) जो अपने बंदे को रातों रात मस्जिदुल हराम से मस्जिदुल अक़्सा तक ले गया।” (सूरतुल इस्रा : 1).

- वह मुसलमानों का पहला क़िब्ला है, जैसाकि बरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि : अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सोलह या सत्तरह महीने बैतुल मक़्दिस की ओर मुँह करके नमाज़ पढ़ी . .  इसे बुखारी (हदीस संख्या : 41) - और शब्द उन्हीं के हैं- और मुस्लिम (हदीस संख्या : 525) ने रिवायत किया है।

- वह वह्य के उतरने का स्थान और नबियों (ईश्दूतों) का स्थल है, और यह बात सर्वज्ञात और प्रमाणित है।

 - वह उन मस्जिदों में से है जिसकी ओर इबादत करने की नीयत से यात्रा की जा सकती है।

अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत करते हैं कि आप ने फरमाया : “तीन मस्जिदों के अतिरिक्त किसी अन्य स्थान के लिए (उनसे बरकत प्राप्त करने और उन में नमाज़ पढ़ने के लिए) यात्रा न की जाएः मस्जिदे हराम, रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मस्जिद और मस्जिदे अक़्सा।” इसे बुखारी (हदीस संख्या : 1132) ने रिवायत किया है। तथा मुस्लिम (हदीस संख्या : 827) ने अबू सईद ख़ुदरी की हदीस से इन शब्दों के साथ रिवायत किया है कि : यात्रा न करो . . .”

- पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मस्जिद अक़्सा के अंदर एक ही नमाज़ में नबियों की इमामत करवाई, एक लंबी हदीस है जिसमें आया है कि : “. . . चुनांचे नमाज़ का समय हो गया तो मैं ने उनकी इमामत करवाई।” इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 172) ने अबू हुरैरह की हदीस से रिवायत किया है।

अतः इन तीनों मस्जिदों के अलावा पूजा प्रयोजन के लिए धरती पर किसी भी स्थान की यात्रा करना जायज़ नहीं है।

दूसरा :

याक़ूब अलैहिस्सलाम के मस्जिदुल अक़्सा का निर्माण करने का अर्थ यह नहीं होता है कि यहूद मस्जिदुल अक़्सा पर मुसलमानों से अधिक अधिकार रखते हैं, क्योंकि याक़ूब अलैहिस्सलाम मुवह्हिद (यानी एकेश्वरवादी) थे, जबकि यहूद मुशरिक (अनेकेश्वरवादी) हैं, अतः इसका मतलब यह नहीं होता है कि उनके बाप याक़ूब ने यदि मस्जिद का निर्माण किया है तो वह उन्हीं की हो गई, बल्कि उन्हों ने उसे इसलिए बनाया था ताकि एकेश्वरवादी उसमें नमाज़ पढ़ें भले ही वे उनके बेटे (संतान) न हों, और मुशरिकों (बहुदेववादियों) को उससे रोका जायेगा यद्यपि वे उनके बेटे ही क्यों न हों ; क्योंकि नबियों की दावत (संदेश) जातीय नहीं थी बल्कि धर्मपरायणता (ईश्भय) पर आधारित थी।

तीसरा :

जहाँ तक आपके यह कहने का संबंध है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नमाज़ के अंदर पिछले नबियों की इमामत करवाई जिससे संदेश और ईश्वरीय वह्य की पुष्टि होती है तो यह नबियों के मूल धर्म और उनके अक़ीदे के दृष्टिकोण से सही है क्योंकि सभी पैगंबर एक ही स्रोत से ग्रहण करते हैं और वह वह्य है और उन सबका अक़ीदा तौहीद (एकेश्वरवाद) का अक़ीदा और उपासना को मात्र अल्लाह के लिए विशिष्ट करने का अक़ीदा है, भले ही विस्तार के पहलू से उनके धर्म-शास्त्र के प्रावधान विभिन्न हैं, और इसकी पुष्टि हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने इस कथन से की है : “मैं दुनिया व आखिरत में ईसा बिन मरियम का लोगों में सबसे अधिक हक़दार हूँ और अंबिया अल्लाती (पैतृक) भाई हैं, उनकी माँये अलग अलग हैं और उनका दीन एक है।” इसे बुखारी (हदीस संख्या : 3259) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 2365) ने रिवायत किया है।

“अल्लाती भाई” का मतलब है ग़ैर सगे भाई जो माँ की तरफ से सौतीले होते हैं और उनके बाप एक होते हैं।

यहाँ पर हम यह अक़ीदा रखने से सावधान करते हैं कि यहूदी, ईसाई और मुसलमान इस समय एक ही स्रोत पर हैं ; क्योंकि यहूदियों ने अपने नबी के धर्म को बदल डाला, बल्कि उनके पैगंबर के धर्म में यह बात है कि वे हमारे नबी का अनुसरण करें और उनके साथ कुफ्र न करें, जबकि वे मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नुबुव्वत के साथ कुफ्र करते हैं और अल्लाह के साथ शिर्क करते हैं।

चौथा :

यहूदियों का अल-क़ुद्स (यरूशलम) में कोई हिस्सा नहीं है ; क्योंकि उसकी धरती पर अगरचे वे पहले निवास कर चुके हैं, लेकिन दो कारणों से वह मुसलमानों के लिए हो गई है :

1- यहूदियों ने कुफ्र किया और बनू इस्राईल में से उन विश्वासियों के धर्म पर बाक़ी नहीं रहे जिन्हों ने मूसा और ईसा अलैहिमस्सलाम का अनुसरण और समर्थन व सहयोग किया।

2- हम मुसलमान लोग उसके इन लोगों से अधिक हक़दार हैं, क्योंकि धरती उसके लिए नहीं होती है जिसने सर्वप्रथम उसे आबाद किया है, बल्कि उसके लिए होती है जो उसमें अल्लाह के हुम्क (नियम) को क़ायम (स्थापित) करता है, इसलिए कि अल्लाह तआला ने धरती को और लोगों को इसलिए पैदा किया है कि वे उसमें अल्लाह की उपासना करें और उसमें अल्लाह के धर्म, उसकी शरीअत और उसके हुक्म को क़ायम और लागू करें, अल्लाह तआला ने फरमाया :

﴿ إن الأرض لله يورثها من يشاء من عباده والعاقبة للمتقين ﴾ [سورة الأعراف :128]

“निःसंदेह यह धरती अल्लाह तआला की है, वह अपने बंदों में से जिसे चाहता है उसका वारिस बना देता है और अंतिम कामयाबी उन्हीं की होती है जो अल्लाह से डरते हैं।” (सूरतुल आराफ : 128).

इसीलिए अगर कोई अरब क़ौम आए जो इस्लाम धर्म पर न हो और कुफ्र के साथ उस पर शासन करे तो उस से लड़ाई की जायेगी यहाँ तक कि वह इस्लाम के फैसले के अधीन हो जाए या उन्हें क़त्ल कर दिया जायेगा।

अतः समस्या और मुद्दा जाति और समुदाय का नहीं है, बल्कि तौहीद (एकेश्वरवाद) और इस्लाम का मुद्दा है।

अधिक जानकारी और फायदे के लिए हम कुछ शोधकर्ताओं की बातों का उल्लेख करते हैं :

“इतिहास इस बात को प्रमाणित करती है कि सबसे पहले जिसने फिलिस्तीन में आवास किया वे कन्आनी हैं, जिन्हों ने छः हज़ार वर्ष ईसा पूर्व में वहाँ निवास ग्रहण किया, वे एक अरबी क़बीला थे जो अरब महाद्वीप से फिलिस्तीन आए, और उनके वहाँ आगमन से उस क्षेत्र का नाम उन्हीं के नाम पर पड़ गया।” “अस्सहयूनीयह, नश्अतुहा, तंज़ीमातुहा, अनशिता तुहा : अहमद अल-इवज़ी” (पृष्ठ : 7)

जहाँ तक यहूदियों का संबंध है तो वे पहली बार फिलिस्तीन में इब्राहीम अलैहिस्सलाम के प्रवेश करने के लगभग छः सौ साल बाद दाखिल हुए, अर्थात वे लगभग 1400 (चौदह सौ साल) ईसा पूर्व दाखिल हुए, इस तरह कन्आनी लोग यहूदियों से लगभग चार हज़ार पाँच सौ वर्ष पूर्व फिलिस्तीन में प्रवेश किए और वहाँ निवास किए।”  उपर्युक्त हवाला (पृष्टः 8).

इससे यह प्रमाणित हो जाता है कि यहूदियों का फिलिस्तीन की धरती पर कोई अधिकार नहीं है, न तो धार्मिक अधिकार है और न ही पहले निवास करने और ज़मीन के स्वामित्व का अधिकार है, और वे लोग ग़सब करने वाले और हमलावर हैं, हम अल्लाह तआला से प्रश्न करते हैं कि उनसे बैतुल मक़्दिस को शीघ्र ही आज़ादी दिलाए, निःसंदेह वह इस पर शक्तिमान और क़बूल करने के योग्य है, और सभी प्रशंसा केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

इस्लाम प्रश्न और उत्तर

शैख मुहम्मद बिन सालेह अल-मुनज्जिद
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