Wed 23 Jm2 1435 - 23 April 2014
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शिक्षक उनसे सबक से पहले 300 बार नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद पढ़ने के लिए कहता है।

मैं पवित्र क़ुर्आन की तिलावत के नियम सीखने के पाठ में उपस्थित होता हूँ . . . किंतु अध्यापक सभी उपस्थित लोगों से मुतालबा करता है कि वे पाठ शुरू होने से पहले 300 बार (मौन रूप् से) नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद व सलाम पढ़ें . . उसका कहना है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद भेजना क़ियामत के दिन आपसे निकटता का कारण है, और उसने उल्लेख किया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : “तुम में सबसे अधिक मेरे ऊपर दुरूद भेजने वाला क़ियामत के दिन मुझसे सबसे अधिक निकट होगा।”, तो क्या उनके साथ इस तरह की चीज़ों में भाग लेना जायज़ है ? अन्यथा क्या मेरे लिए चुपके से कोई अन्य ज़िक्र जैसे इस्तिग़फार इत्यादि पढ़ना जायज़ है ?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

सबक़ से पहले इस संख्या के साथ नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद पढ़ने की पाबंदी करना, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीक़े से प्रमाणित नहीं है, और न ही आपके सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम तथा भलाई के साथ उनका अनुसरण करने वाले (ताबेईन) के तरीक़े से ही साबित है, और जो चीज़ इस तरह हो वह बिदअतों और नई अविष्कार कर ली गई चीज़ों में से है, जिनसे पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने इस कथन द्वारा हमें रोका और सवाधान किया है : “और धर्म में नयी ईजाद कर ली गयी चीज़ों (नवाचार) से बचो, क्योंकि (धर्म में) हर नई ईजाद कर ली गई चीज़ बिद्अत है, और हर बिद्अत गुमराही (पथ भ्रष्टता) है।” इसे तिर्मिज़़ी (हदीस संख्या : 2600), अबू दाऊद (हदीस संख्या : 3991) और इब्ने माजा (हदीस संख्या : 42) ने रिवायत किया है, और अल्बानी ने सहीहुल जामे (हदीस संख्या : 2549) ने सही कहा है।

तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरामन है :

“जिस ने कोई ऐसा काम किया जो हमारी शरीअत के अनुसार नहीं है तो उसे रद्द (अस्वीकृत) कर दिया जायेगा।’’ इसे मुस्लिम (हदीस संख्या:  1718) ने रिवायत किया है।

इस कार्य के बिद्अतों और नवाचारों में से होने का कारण यह है कि : इबादत का अपने आप में, उसकी कैफियत, उसके समय और उसकी मात्रा में धर्मसंगत होना ज़रूरी है, क्योंकि अल्लाह की उपासना उसी चीज़ के द्वारा की जायेगी जिसे उसने अपनी किताब (क़ुर्आन) में या अपने पैगंबर  सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ज़ुबानी वैध और धर्मसंगत बनाया है।

और ज़िक्र (जप) कभी मूलतः धर्म संगत होती है, किंतु उसके साथ ऐसी कैफियत जोड़ दी जाती है, या किसी स्थान, या ज़माने या संख्या के साथ उसे संबंधित कर दिया जाता है जो उसे बिदअत व नवाचार की गणना में पहुँचा देती है।

इसका प्रमाण वह हदीस है जिसे इमाम दारमी (हदीस संख्या : 204) ने अम्र बिन सलमह से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा : हम नमाज़े फज्र से पहले अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु के द्वार पर बैठ जाते और जब वह घर से निकलते तो उन के साथ मस्जिद रवाना होते। एक दिन की बात है कि अबू मूसा अश्अरी रज़ियल्लाहु अन्हु आए और कहा क्या अबू अब्दुर्रहमान (यानी अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद) निकले नहीं ? हम ने उत्तर दियाः नहीं, यह सुन कर वह भी हमारे साथ बैठ गए, यहाँ तक कि इब्ने मस्ऊद बाहर निकले, और हम सब उनकी ओर खड़े हो गए, तो अबू मूसा अश्अरी उन से सम्बोधित हुए और कहाः ऐ अबू अब्दुर्रहमान! मैं अभी अभी मस्जिद में एक विचित्र बात देख कर आ रहा हूँ, हालाँकि जो बात मैं ने देखी है वह अल्हमदुलिल्लाह भली ही है। इब्ने मस्ऊद ने कहा कि वह कौन सी बात है ? अबू मूसा अश्अरी ने कहा कि अगर ज़िन्दगी रही तो शीघ्र ही आप भी देख लें गे। कहा : वह बात यह है कि कुछ लोग नमाज़ की प्रतीक्षा में मस्जिद के भीतर हलक़े बनाए बैठे हैं, उन सब के हाथों में कंकरियाँ हैं, और हर हलक़ा में एक आदमी नियुक्त है जो उनसे कहता है कि सौ बार अल्लाहु अक्बर कहो, तो सब लोग सौ बार अल्लाहु अक्बर कहते हैं, फिर कहता है कि सौ बार ला इलाहा इल्लल्लाह कहो, तो सब लोग सौ बार ला इलाहा इल्लल्लाह कहते हैं, फिर कहता है कि सौ बार सुब्हानल्लाह कहो, तो सब लोग सौ बार सुब्हानल्लाह कहते हैं। इब्ने मस्ऊद ने कहा कि फिर आप ने उन से क्या कहा ॽ अबू मूसा ने जवाब दिया कि आप की राय और आपके आदेश की प्रतीक्षा में, मैं ने उन से कुछ नहीं कहा। इब्ने मस्ऊद ने फरमाया कि आप ने उन से यह क्यों न कह दिया कि अपने अपने गुनाह शुमार करो, और फिर इस बात का ज़िम्मा ले लेते कि उनकी कोई भी नेकी नष्ट नहीं होगी।

यह कह कर इब्ने मस्ऊद मस्जिद की ओर रवाना हुए और हम भी उन के साथ चल पड़े, मस्जिद पहुँच कर इब्ने मस्ऊद उन हलक़ों में से एक हलक़े के पास खड़े हुए और फरमायाः तुम लोग क्या कर रहे हो ? उन्हों ने जवाब दिया कि ऐ अबू अब्दुर्रहमान! यह कंकरियाँ हैं जिन पर हम तक्बीर, तह्लील और तस्बीह गिन रहे हैं, इब्ने मस्ऊद ने फरमाया : इसके बजाय, तुम अपने गुनाह गिनो और मैं इस बात का ज़िम्मा लेता हूँ कि तुम्हारी कोई भी नेकी नष्ट नहीं होगी, तुम्हारी खराबी हो ऐ उम्मते मुहम्मद! कि अभी तो तुम्हारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा अधिक संख्या में उपस्थित हैं, अभी आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के छोड़े हुए कपड़े नहीं फटे, आप के बर्तन नहीं टूटे और तुम इतनी जल्दी तबाही के शिकार हो गए! क़सम है उस ज़ात की जिस के हाथ में मेरी जान है! तुम या तो एक ऐसी शरीअत पर चल रहे हो जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शरीअत से श्रेष्ठ है, या गुमराही (पथ भ्रष्टता) का द्वार खोल रहे हो। उन्हों ने कहा कि ऐ अबू अब्दुर्रहमान! अल्लाह की क़सम इस काम से खैर व भलाई के सिवाय हमारा कोई और उद्देश्य नहीं है, इब्ने मस्ऊद ने फरमायाः खैर के कितने आकांक्षी ऐसे हैं जो खैर तक कभी पहुँच ही नहीं पाते। अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हम से एक हदीस बयान फरमाई है कि एक क़ौम ऐसी होगी जो क़ुरआन पढ़ेगी, किन्तु क़ुर्आन उनके गले से नीचे नहीं उतरेगा। अल्लाह की क़सम! क्या पता कि उन में से अधिकतर लोग शायद तुम्हीं में से हों। यह बातें कह कर इब्ने मस्ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु उनके पास से वापस चले गए।

अम्र बिन सलमह रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि इन हलक़ों के अधिकांश लोगों को हम ने देखा कि नहरवान की लड़ाई में वे खवारिज के साथ-साथ हम से नेज़ा ज़नी कर रहे थे।

आप अबू मूसा और अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हुमा के इस व्यवहार (रवैये) पर विचार करें, और देखें कि उन दोनों ने इस कैफियत का जिसे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किया था और न ही आपके सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम ने किया था, किस तरह इनकार और खण्डन किया, यद्यपि मूलतः ज़िक्र करना धर्मसंगत, वांछित और पसंदीदा है।

विद्धानों ने इस बात पर चेतावनी दी है कि इबादत को किसी समय या स्थान के साथ विशिष्ट करना, और उसकी ऐसी कैफियत निर्धारित कर लेना जो वर्णित नहीं है, उसे बिद्अतों और नवाचारों से जोड़ देता है, और उस समय उसका नाम वृद्धि की बिदअत रखा जाता है, चुनाँचे वह बुनियादी तौर पर धर्मसंगत है, परंतु उसके साथ जोड़ दिये गये गुण के ऐतिबार से अस्वीकृत है।

शातिबी रहिमहुल्लाह ने फरमाया : “बिदअत धर्म में एक ऐसे तरीक़े का नाम है जिसे गढ़ लिया गया है जो शरीअत की बराबरी करता है, जिस पर चलने का मक़सद अल्लाह सुब्हानु व तआला की उपासना में अतिश्योक्ति से काम लेना होता है . . .

उन्हीं (बिदअतों) में से : निर्धारित तरीक़ों और कैफियतों की पाबंदी करना है, जैसे कि मिलजुलकर एक ही आवाज़ में ज़िक्र करना, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म के दिन को उत्सव (खुशी) का अवसर बना लेना, और इसके समान अन्य चीज़ें।

उन्हीं में से : कुछ निर्धारित समयों में कुछ निर्धारित इबादतों की प्रतिबद्धता है, जिसका निर्धारण शरीअत में वर्णित नहीं है, जैसे कि पंद्रह शाबान के दिन रोज़ा रखना, और उसकी रात को क़ियाम करना।

“अल-एतिसाम” (1/37-39) से समाप्त हुआ।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद भेजना सबसे बड़ी इबादतों और अल्लाह की निकटता के महान कामों में से है, किंतु तिलावत के प्रत्येक पाठ से पहले और इस विशिष्ट संख्या के साथ उसकी पाबंदी करना, शरीअत में वर्णित नहीं है। अतः वह नयी अविष्कार कर ली गई बिदअत है, भले ही उसका करनेवाला भलाई का इरादा रखता है, क्योंकि कितने ही भलाई के अभिलाषी ऐसे हैं जो भलाई को नहीं पाते हैं, जैसाकि इब्ने मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु का कथन है।

इस शिक्षक को नसीहत करना और यह स्पष्ट करना अनिवार्य है कि वह जो कुछ कर रहा है वह सुन्नत नहीं है, बल्कि वह एक बिद्अत है, यदि वह इस बात को स्वीकार कर ले तो अल्लाह ही के लिए सर्वप्रशंसा है, और यदि वह इस बात को न माने और किसी दूसरे सुन्नत के पैरोकार से तिलावत सीखना संभव है, तो इसकी भर्त्सना के तौर पर, और इस बात से सावधानी और बचाव के तौर पर कि उसके हाथ पर पढ़ने वालों के अंदर वह बिदअत सरायत न कर जाए, उसे छोड़ दिया जायेगा।

अल्लाह तआला हमें और आपको सुननत की मोहब्बत, उसकी रक्षा, और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके पवित्र पुनीत सहाबा की मोहब्बत प्रदान करे।

तथा अधिक लाभ के लिए प्रश्न संख्या (20005), (21902) और (22457) देखें।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

इस्लाम प्रश्न और उत्तर
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