85108: काफिर का उसके त्योहार के दिन में उपहार स्वीकार करना


मेरी परोड़सन एक ईसाई अमेरिकन है . . . , उसने और उसके परिवार वालों ने क्रिसमस के अवस पर मुझे उपहार प्रस्तुत किए, और मैं इन उपहारों को नहीं लौटा सकती, ताकि कहीं वे मुझसे गुस्सा न हो जायें !!
तो क्या मेरे लिए इन उपहारों को स्वीकार करने की अनुमति है, जिस तरह कि अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने काफिरों के उपहार स्वीकार किए?

उत्तर :

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

सर्व प्रथम :

मूल सिद्धान्त काफिर के उपहार को स्वीकार करने की वैधता है, उसके दिल की सांत्वना और उसके अंदर इस्लाम की रूचि पैदा करने के लिए, जिस तरह कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कुछ काफिरों जैसे कि मुक़ौक़िस आदि के उपहार स्वीकार किए।

इमाम बुखारी ने अपनी सहीह में यह अध्याय क़ायम किया है : मुशरिकों (अनेकेश्वरवादियों) की ओर से उपहार क़बूल करने का अध्याय, आप रहिमहुल्लाह ने फरमाया : ''तथा अबू हुरैरा ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत करते हुए फरमाया कि इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने सारा के साथ हिज्रत किया तो एक गाँव में दाखिल हुए जिसमें एक राजा या एक अहंकारी था, तो उसने कहा कि उसे हाजर प्रदान कर दो। तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को (खैबर के यहूदियों की ओर से) एक ज़हर-युक्त बकरी भेंट की गई। अबू हुमैद कहते है : ऐला के शासक ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लिए सफेद खच्चर और चादर उपहार में भेजे, और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उसे लिखा कि वह अपने देश में शासक बना रहे।

और उन्हों ने यहूदी औरत की कहानी और उसके नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को ज़हर युक्त बकरी उपहार में देने का उल्लेख किया है।

दूसरा :

मुसलमान के लिए काफिर और मुशरिक को, उसकी दिलदारी और उसे इस्लाम की रूचि दिलाने के लिए, उपहार देना जायज़ है, विशेषकर अगर वह निकटवर्ती और पड़ोसी हो। उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने मक्का में अपने मुशरिक भाई को एक जोड़ा (कपड़ा) उपहार में दिया। इसे बुखारी (हदीस संख्या : 2619) ने रिवायत किया है।

लेकिन उसके लिए काफिर को उसके ईद (त्योहार) के दिन में उपहार देना जायज़ नहीं है, क्योंकि इसे झूठे और असत्य त्योहार में भाग लेना और उसको मान्यता देना समझा जायेगा।

और यदि वह उपहार उन चीज़ों में से है जिनके द्वारा त्योहार मनाने पर मदद हासिल किया जाता है जैसे खाना, मोमबत्तियाँ आदि, तो मामला और अधिक हराम होगा, यहाँ तक कि कुछ विद्वान इस बात की ओर गए हैं कि वह कुफ्र है।

ज़ैलई ''तबईनुल हक़ाइक़'' (हनफी) (6/228) में कहते हैं : ''नौरोज़ और महरजान के नाम पर देना जायज़ नहीं है।) अर्थात इन दोनों दिनों के नाम पर उपहार देना हराम बल्कि कुफ्र है, तथा अबू हफस अल-कबीर रहिमहुल्लाह कहते हैं कि यदि कोई बन्दा पचास वर्ष अल्लाह की उपासना करे फिर नौरोज़ का दिन आए, और कुछ मुशरिकों को एक अण्डा उपहार दे दे, जिसका मक़सद उस दिन का सम्मान करना हो, तो उसने कुफ्र किया अैर उसका कार्य बर्बाद हो गया। तथा अल-जामिउल असगर के लेखक का कहना है : यदि उसने किसी दूसरे मुसलमान को नौरोज़ के दिन उपहार दिया, और उससे उस दिन का सम्मान करने का इरादा नहीं किया, बल्कि उसने कुछ लोगों की आदत (परंपरा) के अनुसार किया था, तो उसने कुफ्र नहीं किया। लेकिन उसके लिए उचित यह है कि वह उसे विशेष रूप से उसी दिन में न करे। उससे पहले या उसके बाद करे, ताकि उस क़ौम की समानता और छवि अपनाने वाला न हो, जबकि अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : ''जिसने किसी क़ौम की समानता अपनाई वह उन्हीं में से है।''

तथा अल-जामिउल असगर में वर्णित है किः एक आदमी ने नौरोज़ के दिन कोई चीज़ खरीदी, जिसे वह इससे पहले नहीं खरीदता था, यदि उसने इसके द्वारा उस दिन का सम्मान करने का इरादा किया है जिस तरह कि अनेकेश्वरवादी उस दिन का सम्मान करते हैं तो उसने कुफ्र किया। और यदि उसने खाने-पीने और नेमत से लाभान्वित होने का इरादा किया है तो वह काफिर नहीं होगा।'' अंत हुआ।

तथा ''अत्ताज वल इकलील'' (मालिकी) (4/319) में फरमाया : ''इब्नुल क़ासिम ने नापसंद किया है कि वह ईसाई को उसके त्योहार में इनाम के तौर पर उपहार दे, इसी के समान यहूदी को उसके त्योहार के अवसर पर खजूर की पत्तियाँ देना है।'' अंत हुआ।

तथा हनाबिला की किताबों मे से ''अल-इक़नाअ'' में वर्णित है : ''यहूदियों और ईसाइयों के त्योहारों में उपस्थित होना और उसमें उनसे कोई चीज़ बेचना, और उनके त्योहार के लिए उन्हें उपहार देना निषिद्ध (हराम) है।'' अंत हुआ।

बल्कि मुसलमान के लिए यह भी जायज़ नहीं है कि वह इस त्योहार के लिए मुसलमान को कोई उपहार प्रदान करे, जैसाकि हनफिया के वक्तव्य में यह बात बीत चुकी है। तथा शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिय्या रहिमहुल्लाह ने फरमाया : ''जिसने मुसलमानों को इन त्योहारों में कोई उपहार दिया, इस त्योहार के अलावा शेष सभी वक़्तों में आदत का विरोध करते हुए : तो उसका उपहार स्वीकार नहीं किया जायेगा, विशेष कर यदि वह उपहार उन चीज़ों में से है जिनके द्वारा उनकी समानता और छवि अपनाने पर मदद ली जाती है, उदाहरण के तौर पर क्रिसमस में मोमबत्ती आदि उपहार देना, या छोटे गुरुवार में जो उनके रोज़े के अंत में होता है अण्डे, दूध और बकरी उपहार देना। इसी तरह इन त्योहारों में किसी मुसलमान को त्योहार की वजह से कोई उपहार नहीं दिया जायेगा, विशेष रूप से यदि वह उन चीज़ों में से है जिनके द्वारा उनकी छवि और समानता अपनाने पर मदद हासिल की जाती है, जैसाकि हमने इसका उल्लेख किया है।'' ''इक़्तिज़ाउस सिरातिल मुस्तक़ीम'' (1/227) से अंत हुआ।

तीसरा :

जहाँ तक काफिर से उसके त्योहार में उपहार स्वीकार करने की बात है, तो इसमें कोई हरज (आपत्ति) की बात नहीं है, और इसे उसमें भाग लेना और उसे मान्यता देना नहीं समझा जायेगा। बल्कि उसे सदव्यवहार, दिलदारी और इस्लाम की ओर आमंत्रित करने के तौर पर लिया जायेगा, जबकि अल्लाह तआला ने सदव्यवहार और न्याय को उस काफिर के साथ अनुमेय करार दिया है जिसने मुसलमानों के साथ लड़ाई नहीं की है, अल्लाह तआला ने फरमाया :

﴿لا يَنْهَاكُمُ اللَّهُ عَنِ الَّذِينَ لَمْ يُقَاتِلُوكُمْ فِي الدِّينِ وَلَمْ يُخْرِجُوكُمْ مِنْ دِيَارِكُمْ أَنْ تَبَرُّوهُمْ وَتُقْسِطُوا إِلَيْهِمْ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ ﴾ [الممتحنة :8]

''अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला। निःसंदेह अल्लाह न्याय करनेवालों को पसन्द करता है।'' (सूरतुल मुम्तहिनाः 8).

लेकिन सदव्यवहार और न्याय का मतलब महब्बत और दोस्ती नहीं है, क्योंकि काफिर से प्यार और दोस्ती करना, तथा उसे दोस्त या साथी बनाना जायज़ नहीं है। क्योंकि अल्लाह तआला का फरमान है :

﴿لا تَجِدُ قَوْماً يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الآخِرِ يُوَادُّونَ مَنْ حَادَّ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَلَوْ كَانُوا آبَاءَهُمْ أَوْ أَبْنَاءَهُمْ أَوْ إِخْوَانَهُمْ أَوْ عَشِيرَتَهُمْ أُولَئِكَ كَتَبَ فِي قُلُوبِهِمُ الأِيمَانَ وَأَيَّدَهُمْ بِرُوحٍ مِنْهُ وَيُدْخِلُهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا عَنْهُ أُولَئِكَ حِزْبُ اللَّهِ أَلا إِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْمُفْلِحُونَ﴾ [المجادلة : 22].

तुम उन लोगों को ऐसा कभी नहीं पाओगे जो अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखते हैं कि वे उन लोगों से प्रेम करते हों जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का विरोध किया, यद्यपि वे उनके अपने बाप हों या उनके अपने बेटे हों या उनके अपने भाई या उनके अपने परिवार वाले ही हों। वही लोग हैं जिनके दिलों में अल्लाह ने ईमान को अंकित कर दिया है और अपनी ओर से एक आत्मा के द्वारा उन्हें शक्ति दी है। और उन्हें वह ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, जहाँ वे सदैव रहेंगे। अल्लाह उनसे राज़ी हुआ और वे भी उससे राज़ी हुए। वे अल्लाह की पार्टी के लोग है। सावधान रहो, निश्चय ही अल्लाह की पार्टी वाले ही सफल हैं।'' (सूरतुल मुजादिलाः 22).

तथा अल्लाह सर्वशक्तिमान ने फरमाया :

﴿ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لا تَتَّخِذُوا عَدُوِّي وَعَدُوَّكُمْ أَوْلِيَاءَ تُلْقُونَ إِلَيْهِمْ بِالْمَوَدَّةِ وَقَدْ كَفَرُوا بِمَا جَاءَكُمْ مِنَ الْحَقّ ﴾ [الممتحنة : 1]

''ऐ ईमान लानेवालो! तुम मेरे शत्रुओं और अपने शत्रुओं को मित्र न बनाओ कि उनके प्रति प्रेम दिखाओ, जबकि तुम्हारे पास जो सत्य आया है उसका वे इनकार कर चुके हैं।'' (सूरतुल मुमतहिनाः 1).

तथा अल्लाह ने फरमाया :

﴿ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لا تَتَّخِذُوا بِطَانَةً مِنْ دُونِكُمْ لا يَأْلُونَكُمْ خَبَالاً وَدُّوا مَا عَنِتُّمْ قَدْ بَدَتِ الْبَغْضَاءُ مِنْ أَفْوَاهِهِمْ وَمَا تُخْفِي صُدُورُهُمْ أَكْبَرُ قَدْ بَيَّنَّا لَكُمُ الآياتِ إِنْ كُنْتُمْ تَعْقِلُونَ﴾ [آل عمران : 118]

''ऐ ईमान लानेवालो! अपनों को छोड़कर दूसरों को अपना अंतरंग (राज़दार) मित्र न बनाओ, वे तुम्हें नुक़सान पहुँचाने में कोई कमी नहीं करते। जितनी भी तुम कठिनाई में पड़ो, वही उनको प्रिय है। उनका द्वेष तो उनके मुँह से व्यक्त हो चुका है और जो कुछ उनके सीने छिपाए हुए हैं, वह तो इससे भी बढ़कर है। यदि तुम बुद्धि रखते हो, तो हमने तुम्हारे लिए निशानियाँ खोलकर बयान कर दी हैं।'' (सूरत आल-इम्रानः 118)

तथा अल्लाह का कथन है:

﴿وَلا تَرْكَنُوا إِلَى الَّذِينَ ظَلَمُوا فَتَمَسَّكُمُ النَّارُ وَمَا لَكُمْ مِنْ دُونِ اللَّهِ مِنْ أَوْلِيَاءَ ثُمَّ لا تُنْصَرُونَ﴾ [هود ك 113].

''उन लोगों की ओर तनिक भी न झुकना, जिन्होंने अत्याचार की नीति अपनाई है, अन्यथा आग तुम्हें आ लिपटेगी, और अल्लाह के सिवाय तुम्हारा कोई संरक्षक मित्र नहीं होगा, फिर तुम्हें कोई सहायता भी न मिलेगी।'' (सूरत हूदः 113)

तथा अल्लाह का फरमान है :

﴿يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لا تَتَّخِذُوا الْيَهُودَ وَالنَّصَارَى أَوْلِيَاءَ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ وَمَنْ يَتَوَلَّهُمْ مِنْكُمْ فَإِنَّهُ مِنْهُمْ إِنَّ اللَّهَ لا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ ﴾ [المائدة : 51].

''हे ईमानवालो! तुम यहूदियों और ईसाईयों को दोस्त न बनाओ, ये तो आपस में एक दूसरे के दोस्त हैं, तुम में से जो कोई भी इन से दोस्ती करे तो वह उन्हीं में से है, अल्लाह तआला ज़ालिमों को हिदायत नहीं देता।'' (सूरतुल मायदाः 51)

इसके अलावा अन्य प्रमाण जो काफिर से दोस्ती या महब्बत करने के हराम होने पर दलालत करते हैं।

शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिय्या रहिमहुल्लाह फरमाते हैं : ''जहाँ तक उनकी तरफ से उनके त्योहार के दिन में उपहार क़बूल करने की बात है तो हम अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु से पहले उल्लेख कर चुके हैं कि उनके पास नौरोज़ का उपहार लाया गया तो उन्हों ने उसे स्वीकार कर लिया।

तथा इब्ने अबी शैबा ने रिवायत किया है कि . . . एक महिला ने आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से प्रश्न किया, उसने कहा कि : हमारे यहाँ मजूसियों (अग्निपूजकों) में से कुछ दाईयाँ (दूध पिलानेवाली औरतें) हैं, और उनके त्योहार होते हैं तो वे हमें उपहार देते हैं, तो उन्हों ने उत्तर दिया : जिसे उस दिन के लिए ज़बह किया गया है उसे न खाओ, लेकिन उनके पेड़ों (की चीज़ों) से खाओ।

तथा . . . अबू बरज़ा से वर्णित है कि उनके यहाँ कुछ मजूसी रहते थे, तो वे लोग उन्हें नौरोज और महरजान में उपहार देते थे, तो वे अपने परिवार से कहते थे : जो कुछ फल से हो तो उसे खाओ, और जो कुछ उसके अलावा से हो उसे लौटा दो।

ये सब इस बात को दर्शाता है कि उनके उपहार को स्वीकार करने से निषेद्ध में त्योहार का कोई प्रभाव नहीं है, बल्कि उसका हुक्म त्योहार और गैर त्योहार में बराबर है ; क्योंकि इसमें उनके कुफ्र के प्रतीकों और अनुष्ठानों पर उनकी मदद करना नहीं पाया जाता है . . . ''।

फिर आप रहिमहुल्लाह ने इस बात पर चेतावनी दी है कि यहूदी व ईसाई का बलिदान किया हुआ जानवर अगरचे हलाल है, लेकिन जो उसने अपने त्योहार के लिए बलिदान किया है : उसका खाना जायज़ नहीं है। तथा आप रहिमहुल्लाह ने फरमाया : ''अहले किताब के त्योहार का भोजन खाना, खरीदारी या उपहार आदि के द्वारा केवल उस अवस्था में जायज़ है जब उसने उसे अपने त्योहार के लिए न ज़बह किया हो। जहाँ तक मजूसियों के जब़ह किए हुए जानवर का संबंध है तो उसके बारे में हुक्म सर्वज्ञात है क्योंकि वह आम लोगों के यहाँ हराम है। रही बात उस जानवर की जिसे अहले किताब ने अपने त्योहारों के लिए जबह किया है, और जिसके ज़बह करने से वे गैरूल्लाह की निकटता चाहते हैं जिस तरह कि मुसलमान अपने हज्ज और क़ुर्बानी के जानवरों को अल्लाह की निकटता चाहते हुए ज़बह करते हैं। इसका उदाहरण यह है जो वे मसीह और ज़हरा के लिए ज़बह करते हैं, तो इसके बारे में इमाम अहमद से दो कथन वर्णित हैं, जिनमें सबसे प्रसिद्ध उनके नुसूस में यह है कि उसका खाना जायज़ नहीं है, भले ही उसपर अल्लाह तआला के अलावा का नाम न लिया गया हो। तथा इससे निषेद्ध आयशा और अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुम से उल्ले किया गया है . . . ''

''इक़्तिज़ाउस सिरातिल मुस्तक़ीम'' (1/251) से अंत हुआ।

निष्कर्ष यह कि आपके लिए अपनी ईसाई पड़ोसन से उनके त्योहार के दिन में कुछ शर्तों के साथ उपहार स्वीकार करना जायज़ है :

पहला : यह उपहार, त्योहार के लिए ज़बह किए जानवर से न हो।

दूसरा : वह उन चीज़ों में से न हो जिसके द्वारा उनके त्योहार में उनकी छवि और समानता अपनाने पर मदद न ली जाती हो, जैसे - मोम बत्ती, अण्डे, जरीद, और इसके समान अन्य चीज़ें।

तीसरा : इसके साथ ही आप अपने बच्चों से वला और बरा (अल्लाह के लिए दोस्ती व वफादारी और अल्लाह के लिए दुश्मनी व बेज़ारी) का अक़ीदा स्पष्ट कर दें, ताकि उनके दिल में इस त्योहार का प्यार या उपहार देनेवाले से लगाव न बैठने पाए।

चौथा : उपहार को स्वीकार करना उसकी दिलदारी और उसे इस्लाम की तरफ आमंत्रित करने के उद्देश्य से हो, प्यार और दोस्ती के तौर पर न हो।

और यदि उपहार ऐसा है जिसे क़बूल करना जायज़ नहीं है, तो उचित यह है कि उसे अस्वीकार करने के साथ ही उसका कारण भी स्पष्ट कर दिया जाए, जैसे कि कहा जाए कि : हमने आपका उपहार इसलिए अस्वीकार कर दिया है क्योंकि वह त्योहार के लिए ज़बह किया गया जानवर है, और हमारे लिए इसका खाना जायज़ नहीं है। या कि ये चीज़ें वे लोग स्वीकार करते हैं जो इसके मनाने में भाग लेते हैं, और हम इस त्योहार को नहीं मनाते हैं ; क्योंकि वह हमारे धर्म में धर्म संगत (वैध) नहीं है, और यह एक ऐसी आस्था पर आधारित है जो हमारे यहाँ सहीह नहीं है, इसी तरह कि अन्य बातें जो उन्हें इस्लाम की ओर आमंत्रित करने और जिस नास्तिकता पर वह जमे हुए हैं उसके खतरे को बताने का प्रवेश द्वार बन सकें।

मुसलमान को चाहिए कि वह अपने धर्म पर गर्व करनेवाला, और उसके अहकाम (प्रावधानों) का प्रतिबद्ध हो, शर्म व लज्जा में या किसी के लिए शीलता व सदव्यवहार दिखाते हुए उनसे उपेक्षा न करे। क्योंकि अल्लाह तआला इस बात का सबसे अधिक हक़दार है कि उससे हया व शर्म किया जाए।

तथा अधिक लाभ के लिए प्रश्न सख्या (947) और (13642) देखें।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।
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