9477: फरिश्तों पर ईमान लाने की वास्तविकता


फरिश्तों (स्वर्गदूतों) पर ईमान लाने का मतलब क्या है?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

अल्लाह की प्रशंसा और गुणगान के बाद :

फरिश्ते एक अनदेखी दुनिया हैं जिन्हें अल्लाह तआला ने प्रकाश (रौशनी) से पैदा किया है, जो अल्लाह के आदेशों का पालन करते हैं, "जो हुक्म अल्लाह तआला उन्हें देता है उसकी नाफरमानी नहीं करते बल्कि जो हुक्म दिया जाये उसका पालन करते हैं।" (सूरतुत्तह्रीम :6)

फरिश्तों पर ईमान रखना चार चीज़ों को सम्मिलित है :

1- उनके वजूद (अस्तित्व) का पक्का इक्रार करना और यह कि वे अल्लाह की एक मख्लूक़ (सृष्टि) हैं, उस के अधीन और वशीभूत हैं, "बल्कि वे सम्मानित बन्दे हैं, उस (अल्लाह) के सामने बढ़कर नहीं बोलते, और उस के हुक्म पर अमल करते हैं।" (सूरतुल अंबिया :26-27)  तथा "जो हुक्म अल्लाह तआला उन्हें देता है उसकी नाफरमानी नहीं करते बल्कि जो हुक्म दिया जाये उसका पालन करते हैं।" (सूरतुत्तह्रीम :6) और "वे उसकी उपासना से न अहंकार (घमंड) करते हैं और न थकते हैं। वे दिन-रात उसकी पवित्रता बयान करते हैं और तनिक सा भी आलस्य नहीं करते।" (सूरतुल अम्बिया: 19,20)

2- उन में से जिन के नाम हमें ज्ञात हैं उन पर उनके नाम के साथ ईमान लाना, उदाहरण के तौर पर जिब्रील, मीकाईल, इस्राफील, मालिक, रिज़वान और अन्य, इन सभी पर अल्लाह की शांति अवतरित हो।

3- उन में से जिन की विशेषताओं और गुणों को हम जानते हैं उन पर ईमान लाना, जैसाकि हदीस से हमें जिब्रील अलैहिस्सलमा के विवरण का पता चलता है (कि पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें देखा) कि उनके छ: सौ पंख थे जो छितिज पर छाए हुए थे। (अर्थात् आसमान को भर दिया था।)

उन में से जिन के कार्यों का हम को ज्ञान है उन पर ईमान लाना, उदाहरण स्वरूप जिब्रील अलैहिस्सलाम उस चीज़ पर नियुक्त हैं जिस में दिलों की ज़िन्दगी है अर्थात् अल्लाह तआला की वह्य के अमीन हैं, इस्राफील सूर फूंकने पर नियुक्त हैं, मीकाईल वर्षा बरसाने पर नियुक्त (आदिष्ट) हैं। मालिक, नरक के निरीक्षण पर नियुक्त हैं, इत्यादि।

और सब से महत्वपूर्ण चीज़ों में जिस पर ईमान लाना हमारे लिए ज़रूरी है, यह है कि हर व्यक्ति के साथ दो फरिश्ते तैनात हैं जो उसके कर्मों को लिखते हैं जैसाकि अल्लाह तआला का फरमान है : "जिस समय दो लेने वाले जो लेते हैं, एक दायीं तरफ और दूसरा बायीं तरफ बैठा हुआ है। (इंसान) मुँह से कोई शब्द निकाल नहीं पाता लेकिन उसके पास रक्षक (पहरेदार) तैयार हैं।" (सूरत क़ाफ :17-18)  अर्थात् फरिश्तों में से एक निरीक्षक उपस्थित होता है। अत: ऐ मुसलमान इस बात से सावधान रह कि ये दोनों फरिश्ते तेरे बारे में कोई ऐसी चीज़ दर्ज करें जो क़ियामत के दिन तेरे लिए बुरी हो, आप जो कुछ बोलते और कहते हैं वह आप के कर्मपत्र में लिख दिया जाता है और जब क़ियामत का दिन होगा तो बन्दे के सामने उसके कर्मपत्र को निकाल कर रख दिया जायेगा : "जिसे वह अपने ऊपर खुला हुआ पा लेगा। (और उस से कहा जायेगा :) लो खुद ही अपना कर्मपत्र आप पढ़ लो। आज तो तू आप ही अपना खुद फैसला करने को काफी है।" (सूरतुल इस्रा : 13-14)

अल्लाह तआला से दुआ है कि हमारे पापों को छिपा दे और हमें क्षमा प्रदानक कर दे, नि:सन्देह वह सब कुछ सुनने वाला और स्वीकारने वाला (उत्तरदायी) है। और अल्लाह ही सर्वश्रेष्ठ जानता है।

देखिये : आलामुस्सन्नह अल-मन्शूरा (86) मज्मूअ फतावा शैख इब्ने उसैमीन (3/160)  अधिक जानकारी के लिए प्रश्न संख्या (843) और (14610) देखें।

शैख मुहम्मद सालेह अल-मुनज्जिद
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