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क्रिसमस में गरीब परिवारों के लिए उपहार खरीदने के लिए दान एकत्र करना

मेरे स्कूल में जन्मदिवस (क्रिसमस) के त्योहारों में कई परंपरायें हैं। प्रति वष कोई एक कक्षा एक गरीब परिवार के मामले की ज़िम्मेदारी उठाती है। वह जन्मदिवस (क्रिसमस) के त्योहारों के लिए उपहार खरीदने के लिए दान एकत्र करती है। किन्तु मैं ने इसे अस्वीकार कर दिया। क्योंकि जब परिवार इन उपहारों को प्राप्त करता है तो वह यह दुआ करता है "अल्लाह तआला ईसाईयों को आशीर्वाद प्रदान करे।" तो क्या यह शुद्ध है ?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

ऐसा प्रतीक होता है कि आप मसीह अलैहिस्सलाम के जन्मदिवस को मुराद ले रहे हैं जिसका ईसाई लोग सम्मान करते हैं और उसे ईद (त्योहार) बनाते हैं। और ईसाईयों के त्योहार उनके धर्म का हिस्सा हैं। और मुसलमानों का हर्ष व उल्लास और खुशी का प्रदर्शन करके और उपहार भेंठ करके काफिरों के त्योहारों का सम्मान करना, उनकी समानता (छवि) अपनाने में दाखिल है। जबकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : "जिस व्यक्ति ने किसी क़ौम (ज़ाति) की समानता और छवि अपनायी वह उन्हीं में से है।" 

अत: मुसलमानों पर अनिवार्य है कि वे ईसाईयों से उनके त्योहारों और उनके विशिष्ट परंपराओं में समानता अपनाने से दूर रहें। आप ने ठीक और अच्छा किया कि जन्मदिवस (क्रिसमस) के त्योहारों के अवसर पर गरीब परिवारों के लिए दान एकत्र करने पर सहमत नहीं हुए। अत: आप अपने मार्ग पर जमे (सुदृढ़) रहें, और अपने भाईयों को सदुपदेश करें (समझायें) और उनसे इस बात को स्पष्ट कर दें कि यह काम जाइज़ नहीं है। क्योंकि हम मुसलमानों के लिए ईदुल फित्र और ईदुल अज़्हा के अलावा कोई अन्य त्योहार नहीं है। और अल्लाह तआला ने इन दोनों ईदों के द्वारा हमें काफिरों के त्योहारों से बेनियाज़ कर दिया है। (अन्त हुआ।)

इसे शैख अब्दुर्रहमान अल-बर्राक ने लिखा है।

हम मुसलमान लोग यदि सदक़ा (दान) करना चाहें तो हम उसे उसके सही हक़दारों को देंगे और उसे जानबूझ कर काफिरों के त्योहारों में नहीं खर्च करेंगे। बल्कि जब भी आवश्यकता पड़ेगी हम उसे निकालेंगे, और भलाई के महान अवसरों का लाभ उठायेंगे, जैसे कि रमज़ान का महीना, ज़ुल-हिज्जा के प्रथम दस दिन और इनके अलावा अन्य प्रतिष्ठित अवसर जिनमें अज्र व सवाब को कई गुना कर दिया जाता है, इसी प्रकार तंगी और कठोरता के समयों में, जैसाकि अल्लाह तआला का फरमान है :

 ﴿فَلا اقْتَحَمَ الْعَقَبَةَ (11) وَمَا أَدْرَاكَ مَا الْعَقَبَةُ (12) فَكُّ رَقَبَةٍ (13) أَوْ إِطْعَامٌ فِي يَوْمٍ ذِي مَسْغَبَةٍ (14) يَتِيمًا ذَا مَقْرَبَةٍ (15) أَوْ مِسْكِينًا ذَا مَتْرَبَةٍ (16) ثُمَّ كَانَ مِنَ الَّذِينَ ءَامَنُوا وَتَوَاصَوْا بِالصَّبْرِ وَتَوَاصَوْا بِالْمَرْحَمَةِ (17) أُولَئِكَ أَصْحَابُ الْمَيْمَنَةِ (18)﴾ [سورة البلد : 11-18]

"सो वह घाटी में प्रवेश नहीं किया, और आप को क्या पता कि घाटी है क्या ? किसी गर्दन को छुड़ाना (अर्थात किसी दास या दासी को आज़ाद करना), या भूख वाले दिन खाना खिलाना किसी रिश्तेदार यतीम (अनाथ) को,  या मिट्टी पर पड़े हुए मिसकीन (गरीब) को। फिर वह उन लोगों में से हो जाता जो ईमान लाते और एक दूसरे को सब्र की और दया करने की वसीयत  करते हैं। यही लोग दायें हाथ (सौभाग्य) वाले हैं।" (सूरतुल बलदः 11-18)

शैख मुहम्मद सालेह अल-मुनज्जिद
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