हर
प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।
अनिवार्य
कर्तव्यों और सब से महत्वपूर्ण दायित्वों मे से यह है कि : बन्दा शिर्क के अर्थ,
उसकी गंभीरता और उसके प्रकार की जानकारी प्राप्त करे ताकि उसका एकेश्वरवाद (तौहीद)
संपूर्ण, उसका इस्लाम समूचित और उसका ईमान शुद्ध हो सके। तथा हम कहते है और अल्लाह
ही शक्ति का स्रोत और उचित मार्गदर्शन करने वाला हैः
आप
यह बात जान लें -अल्लाह तआला आप का मार्गदर्शन करे- कि अरबी भाषा में शिर्क का
अर्थ : साझी बनाना है अर्थात् किसी को दूसरे का साझीदार और भागीदार बनाना। कहा
जाता है : "अश्रका बैनहुमा" जब वह उन्हें दो में विभाजित कर दे, या
"अश्रका फी अम्रिहि ग़ैरहु" जब वह उस मामले को दो आदमियों के हाथ में कर
दे।
इस्लामी
शरीअत की शब्दावली में शिर्क का अर्थ : अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल के साथ उसकी रुबूबियत
(स्वामित्व) या इबादत या नामों और गुणों में कोई साझीदार या सदृश बनाना।
"निद्द"
अरबी भाषा का शब्द है जिस का अर्थ समकक्ष और प्रतिद्वंद्वी के होते हैं, इसी लिए
अल्लाह तआला ने निद्द (अपना समकक्ष और प्रतिद्वंद्वी) बनाने से रोका है और क़ुर्आन
करीम की बहुत सी आयतों में अल्लाह तआला को छोड़ कर उस का समकक्ष और सदृश बनाने
वालों की निन्दा की है, अल्लाह तआला ने फरमाया : "अत: जानते हुए अल्लाह के
समकक्ष (शरीक) न बनाओ।" (सूरतुल-बक़रा: 22)
तथा
महान प्रतिष्ठावान अल्लाह ने फरमाया : "और उन्हों ने अल्लाह के लिए समकक्ष
बना लिये ताकि लोगों को अल्लाह के मार्ग से भटकायें। (आप) कह दीजिये कि ठीक है मज़ा
उड़ा लो, तुम्हारा ठिकाना तो अंत में नरक ही है।" (सूरत इब्राहीम : 30)
तथा
हदीस में है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "जो आदमी इस अवस्था
में मरा कि वह अल्लाह को छोड़ कर किसी समकक्ष (प्रतिद्वंद्वी) को पुकारता था, वह
नरक में जायेगा।" (सहीह बुखारी हदीस संख्या : 4497, सहीह मुस्लिम हदीस संख्या
: 92)
शिर्क
के प्रकार :
क़ुरआन
व हदीस के नुसूस (सूत्रों) से इंगित होता है कि शिर्क और अल्लाह के अलावा किसी को
प्रतिद्वंद्वी और समकक्ष बनाना कभी तो धर्म से निष्कासित करने वाला होता है, और
कभी धर्म से निष्कासित नहीं करता है, इस लिए विद्वानों ने उसे दो प्रकार में
विभाजित किया है : "शिर्क अक्बर और शिर्क अस्ग़र" (छोटा शिर्क और बड़ा
शिर्क), और आप के सामने हर
प्रकार की संछिप्त परिभाषा प्रस्तुत की जा रही है :
प्रथम
: शिर्क अक्बर (बड़ा शिर्क)
अल्लाह
तआला की रुबूबियत, उसकी उलूहियत और उस के नामों और गुणों में से जो उस का एक मात्र
हक़ है उसे अल्लाह के अलावा किसी दूसरे के लिए फेर देना शिर्क अक्बर है।
यह
शिर्क कभी ज़ाहिर (प्रत्यक्ष) होता है : जैसे कि मूर्तियों और पत्थरों के पूजकों,
तथा क़ब्रों, मृतकों और अनुपस्थित लोगों के पुजारियों का शिर्क।
और
कभी कभार यह शिर्क गुप्त होता है : जैसे कि अल्लाह के अलावा विभिन्न पूज्यों पर
भरोसा करने वालों का शिर्क, या मुनाफिक़ों (पाखण्डियों) का शिर्क और कुफ्र ;
क्योंकि इन लोगों का शिर्क भले ही बड़ा शिर्क है जो धर्म से निष्कासित कर देता है
और उस के करने वाले को सदैव नरक का भागी बना देता है, किन्तु यह एक गुप्त और
अप्रत्यक्ष शिर्क है, क्योंकि वे लोग इस्लाम का प्रदर्शन (दिखावा) करते हैं और
कुफ्र और शिर्क को छिपाते हैं, अत: वे प्रोक्ष में मुशरिक (अनेकेश्वरवादी) हैं न
कि प्रत्यक्ष रूप से।
इसी
तरह यह शिर्क कभी कभार आस्थाओं (मान्यताओं) में होता है :
जैसे
कि यह आस्था (विश्वास) रखना कि अल्लाह के साथ कोई और भी है जो पैदा करता है, या
जीवन और मृत्यु देता है (मारता और जिलाता है), या इस ब्रह्मांड में नियंत्रण करता
है।
अथवा
यह आस्था रखना कि अल्लाह के अलावा कोई और भी है जिस का अल्लाह के साथ सामान्य रूप
से आज्ञापालन किया जायेगा, चुनाँचि वे किसी भी चीज़ को हलाल (वैद्ध) ठहराने और किसी
भी चीज़ को हराम (अवैध) ठहराने में उस का पालन करते हैं, भले ही वह पैग़ंबरों के
धर्म के विपरीत और विरूद्ध हो।
अथवा
प्रेम और सम्मान में अल्लाह के साथ शिर्क करना (किसी को साझी ठहराना), इस प्रकार
कि आदमी किसी मख्लूक़ से उसी तरह से प्रेम करे जिस तरह कि अल्लाह से प्रेम करता है,
तो यह ऐसा शिर्क है जिसे अल्लाह तआला क्षमा नहीं करेगा, यही वह शिर्क है जिस के
बारे में अल्लाह तआला का फरमान है : "और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अल्लाह के
साझीदार दूसरों को ठहरा कर उन से ऐसा प्रेम रखते हैं जैसा प्रेम अल्लाह से होना
चाहिए।" (सूरतुल बक़रा : 165)
या
यह आस्था रखना कि अल्लाह के साथ कोई और भी है जो प्रोक्ष का ज्ञान (इल्मे-ग़ैब)
रखता है, यह चीज़ कुछ पथभ्रष्ट दलों जैसे कि राफिज़ा, कट्टरपंथी सूफिया और सामान्य
रूप से बातिनिय्या के यहाँ बाहुल्यता से पाई जाती है। राफिज़ा (शिया) अपने इमामों
के बारे में यह आस्था रखते हैं कि वे प्रोक्ष का ज्ञान रखते हैं, इसी प्रकार
बातिनिय्या और सूफिया अपने औलिया (सदाचारियों) के बारे में इसी तरह का आस्था रखते
हैं। और जैसे यह आस्था रखना कि कोई ऐसा भी है जो उसी तरह दया करता है जो दया
अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल के लिए ही योग्य है, चुनाँचि वह अल्लाह तआला के समान दया
करता है और वह इस प्रकार कि वह पापों को क्षमा करता है, अपने भक्तों को माफ कर
देता है और बुराईयों को क्षमा कर देता है।
तथा
कभी-कभार यह शिर्क शब्दों (कथन) में होता है :
जैसे
कि कोई व्यक्ति ऐसी चीज़ में जिस पर केवल अल्लाह तआला ही सामर्थ्य रखता है, अल्लाह
के अलावा किसी दूसरे से फर्याद करे, या सहायता मांगे, या शरण ढूंढ़े ; चाहे वह
दूसरा ईश्दूत हो, या सदाचारी, या फरिश्ता, या जिन्न, या इसके अलावा कोई अन्य
मख्लूक़ (सृष्टि) हो, यह शिर्क अक्बर में से है जो धर्म से निष्कासि कर देता है।
और
जैसे कि वह आदमी जो धर्म का उपहास करे (मज़ाक उड़ाये), या अल्लाह तआला को उसकी
मख्लूक़ के समान और बराबर ठहराये, या अल्लाह के साथ कोई खालिक़ (पैदा करने वाला), या
रोज़ी देने वाला, या संसार का नियंत्रण करने वाला साबित करे। ये सब के सब शिर्क
अक्बर और ऐसा महान पाप है जिसे क्षमा नहीं किया जायेगा।
और
कभी-कभी यह शिर्क कार्यों में होता है :
जैसे
कि वह आदमी जो अल्लाह के अलावा किसी दूसरे के लिए बलि देता (जानवर की क़ुर्बानी
करता), या नमाज़ पढ़ता या सज्दा करता है, या ऐसे नियम (क़ानून) बनाता है जो अल्लाह तआला
के फैसले के समान और सदृश हैं और उन्हें लोगों के लिए वैध ठहराता है और उन्हें उन
नियमों से फैसला कराने का बाध्य कर देता है, और जो मोमिनों के विरूध काफिरों का
सहयोग और उनकी मदद करे, और इसी तरह के अन्य कार्य जो मूल विश्वास (ईमान) ही के
विरूद्ध हैं और उस के करने वाले को इस्लाम धर्म से निष्कासित कर देते हैं। हम
अल्लाह तआला से उसकी क्षमा और सुरक्षा का प्रश्न करते हैं।
दूसरा
: शिर्क अस्ग़र (लघु शिर्क)
:
हर
वह चीज़ जो शिर्क अक्बर का कारण (अर्थात् उस की ओर ले जाने वाली) हो, या जिस के
बारे में क़ुर्आन व हदीस के नुसूस (ग्रंथों) में यह वर्णित हुआ है कि वह शिर्क है
किन्तु वह शिर्क अक्बर की सीमा तक नहीं पहुँचती है।
और
यह आम तौर पर दो प्रकार से होता है :
प्रथम : कुछ ऐसे कारणों
से संबंध जोड़ना जिन की अल्लाह तआला ने अनुमति नहीं दी है, जैसे कि हथेली और माला
(मनका) और इसी जैसी चीज़ें इस उद्देश्य से लटकाना कि ये सुरक्षा का कारण हैं, या ये
बुरी नज़र को दूर करती हैं जबकि अल्लाह तआला ने इन्हें शरई तौर पर और न ही
प्राकृतिक तौर पर इनका कारण नहीं बनाया है।
दूसरा
: कुछ चीज़ों का इस
प्रकार सम्मान करना जो उसे रुबूबियत (स्वामित्व) के स्थान तक न पहुँचाये, जैसे कि
ग़ैरूल्लाह की क़सम खाना, और इसी तरह यह कहना कि : अगर अल्लाह और फलाँ न होता (तो
ऐसा हो जाता) इत्यादि।
विद्वानों
ने कुछ ऐसे नियम और क़ायदे निर्धारित किये हैं जिन के द्वारा शरई नुसूस में वर्णित
होते समय शिर्क अक्बर और शिर्क अस्ग़र के बीच भिन्नता और अंतर स्पष्ट हो जाता है,
उन नियमों में से कुछ निम्नलिखित हैं :
1-
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम स्पष्ट रूप से यह वर्णन कर दें कि यह काम लघु शिर्क
(छोटा शिर्क) है : जैसा कि मुस्नद अहमद (हदीस संख्या :27742) में महमूद बिन लबीद
रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्हों ने कहा कि : अल्लाह के पैग़ंबर सल्लल्लाहु
अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "मुझे तुम्हारे ऊपर सब से अधिक छोटे शिर्क का डर
है।" लोगों ने कहा : ऐ अल्लाह के पैग़ंबर! छोटा शिर्क क्या है ? आप सल्लल्लाहु
अलैहि व सल्लम ने उत्तर दिया : "रियाकारी (किसी को दिखाने के लिये कोई काम
करना)। अल्लाह तआला जिस दिन बन्दों को उन के कामों का बदला देगा उस दिन फरमायेगा :
तुम लोग उन लोगों के पास जाओ जिन्हें दिखाने के लिए तुम दुनिया में अपने कार्य
करते थे, फिर देखो कि क्या तुम उन के पास बदला पाते हो।" (अल्बानी ने अस्सिलसिला
अस्सहीहा में हदीस संख्या: 951 के अंतरगत इसे सहीह कहा है)।
2-
शिर्क का शब्द क़ुरआन व हदीस के नुसूस (ग्रंथों) में "नकिरा" (जाति वाचक
संज्ञा) के रूप में आया हो -अर्थात् वह बिना अलिफ लाम के हो- तो आम तौर पर इस से
अभिप्राय शिर्क अस्ग़र (छोटा शिर्क) होता है, और इसके ढेर सारे उदाहरण हैं, जैसे कि
आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : "मंत्र (झाड़-फूँक), ताबीज़-गण्डा
और प्रेम-मंत्र शिर्क है।" (अबू दाऊद हदीस संख्या : 3883, अल्बानी ने
अस्सिलसिला अस्सहीहा (331) में इसे सहीह कहा है).
यहाँ
पर शिर्क से अभिप्राय छोटा शिर्क है बड़ा शिर्क नहीं।
ताबीज़-गण्डा
से अभिप्राय ऐसी चीज़ है जो बच्चों के गले में लटकायी जाती थी जैसे सीपी, मनका,
माला इत्यादि जिस के बारे में यह गुमान किया जाता था कि वह उसे बुरी नज़र से
सुरक्षित रखती है।
तथा
प्रेम-मंत्र एक ऐसी चीज़ है जिसे इस भ्रम से बनाते थे कि यह पत्नी को उस के पति के
निकट प्यारी और पति को उसकी पत्नी के निकट प्यारा बना देता है।
3-
सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम ने शरीअत के नुसूस (ग्रंथों) से यह अर्थ समझा हो कि इस
स्थान पर शिर्क से मुराद छोटा शिर्क है, बड़ा नहीं और इस में कोई सन्देह नहीं कि
सहाबा की समझा मो'तबर (वज़नदार) है ; क्योंकि वे लोग अल्लाह के धर्म को सब से अधिक
जानने वाले और शरीअत के उद्देश्य को सब से अधिक समझने वाले थे, इसके उदाहरणों में
से वह हदीस है जिसे अबू दाऊद ने इब्ने मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "बुरा शकुन लेना शिर्क है, बुरा
शकुन (फाल) लेना शिर्क है, तीन बार फरमाया, और हम में से कोई भी नहीं है मगर (उस
के दिल में बुरा शकुन आ जाता है) लेकिन अल्लाह तआला तवक्कुल (अल्लाह पर विश्वास और
भरोसा) के द्वारा उस का निवारण कर देता है।"
चुनाँचि
इस हदीस में ( और हम में से कोई नहीं मगर ...) का वाक्य इब्ने मसऊद रज़ियल्लाहु
अन्हु का कथन है जैसा कि हदीस के प्रमुख विद्वानों ने इसे स्पष्ट किया है। इस से
पता चलता है कि इब्ने मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु ने यह समझा कि यह शिर्क अस्ग़र में से
है, क्योंकि यह संभव नहीं है कि इस का उद्देश्य यह हो कि हम में से कोई भी नहीं है
मगर वह शिर्क अक्बर (बड़े शिर्क) में पड़ जाता है, इसी तरह यह बात भी है कि अल्लाह
तआला तवक्कुल के द्वारा शिर्क अक्बर को समाप्त नहीं करता है, बल्कि उस से तौबा
करना आवश्यक है।
4-
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम शिर्क या कुफ्र के शब्द की इस प्रकार व्याख्या करें
कि जिस से यह इंगित होता हो कि उस से अभिप्राय छोटा (शिर्क या कुफ्र) है बड़ा नहीं,
जैसा कि बुखारी (हदीस संख्या: 1038) और मुस्लिम (हदीस
संख्या: 71) ने ज़ैद बिन खालिद
अल-जुहनी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा कि : अल्लाह के
पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हुदैबिया के स्थान पर रात की बारिश के बाद
हमें सुबह (फज्र) की नमाज़ पढ़ाई। जब आप नमाज़ से फारिग हुए तो लोगों का सामना किया
और फरमाया : "क्या तुम जानते हो कि तुम्हारे पालनहार ने क्या कहा है ?"
लोगों ने कहा : अल्लाह और उस के पैग़ंबर अधिक जानते हैं। फरमाया : "मेरे
बन्दों में से कुछ ने मुझ पर विश्वास रखते हुये और कुछ ने मेरे साथ कुफ्र करते
हुये सुबह की। जिस ने यह कहा कि अल्लाह की दया और कृपा से हम पर बारिश हुई तो वह
मुझ पर ईमान रखने वाला और सितारों का इनकार करने वाला है, और जिस ने यह कहा इस और
इस नक्षत्र (तारे) के कारण बारिश हुई है वह मेरे साथ कुफ्र करने वाला और सितारे पर
ईमान रखने वाला है।"
यहाँ
पर कुफ्र के शब्द की व्याख्या दूसरी रिवायत में आई है जिसे अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु
अन्हु ने रिवायत किया है, वह कहते हैं कि : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व
सल्लम ने फरमाया : "क्या तुम ने देखा नहीं कि तुम्हारे रब ने क्या फरमाया ?
उस ने फरमाया : मैं ने अपने बन्दों को किसी ने'मत से सम्मानित नहीं किया मगर उन का
एक दल उस की ना-शुक्री करने वाला (कृत्ध्न) हो गया, वे कहते हैं कि सितारे और
सितारों के कारण।" यहाँ पर यह स्पष्ट कर दिया कि सितारों की ओर इस एतिबार से
बारिश की निस्बत करना कि वे बारिश के उतरने का कारण हैं -हालांकि वास्तव में
अल्लाह ने उन्हें इस का कारण नहीं बनाया है- तो उस का कुफ्र उस पर अल्लाह की ने'मत
का कुफ्र (नाशुक्री) है, और यह बात ज्ञात है कि ने'मत का कुफ्र, छोटा कुफ्र है।
किन्तु जो आदमी यह आस्था रखता है कि सितारे ही ब्रमह्मांड में नियंत्रण करते हैं
और यह कि वही बारिश बरसाते हैं तो यह शिर्क अक्बर है।
शिर्क
अस्ग़र कभी-कभी प्रत्यक्ष (ज़ाहिर) होता है जैसे कि छल्ला, धागा और ताबीज़ पहनना और
इसी तरह के अन्य कर्म और कथन।
और
कभी छिपा हुआ (गुप्त) होता है जैसे कि मामूली रियाकारी (दिखावा)।
इसी
प्रकार कभी आस्थाओं (मान्यताओं) के द्वारा होता है :
जैसे
कि किसी चीज़ के बारे में यह आस्था रखना कि वह लाभ पहुँचाने और हानि को रोकने का
कारण है हालांकि अल्लाह तआला ने उसे इस का कारण नहीं बनाया है। या किसी चीज़ के
अंदर बरकत का आस्था रखना, हालांकि अल्लाह तआला उस में बरकत नहीं रखी है।
और
कभी कभी कथन के द्वारा (शब्दों में) होता है :
जैसे
कि किसी का यह कहना कि हम पर इस और इस सितारे के कारण बारिश हुई है ; जबकि उस का
यह आस्था नहीं है कि सितारे ही स्वत: बारिश बरसाते हैं, या अल्लाह के अलावा किसी
दूसरे की क़सम खाना जबकि जिसकी क़सम खाई है उसकी महानता और अल्लाह के बराबर होने की
आस्था न रखी जाये, या यह कहना कि : जो अल्लाह ने चाहा और आप ने चाहा, और इसके समान
अन्य बातें।
और
कभी-कभी कार्यों के द्वारा होता है :
जैसे
कि आपदा (मुसीबत) को टालने या हटाने के लिए ताबीज़ लटकाना, या छल्ला या धागा
इत्यादि पहनना, क्योंकि जिस ने भी किसी चीज़ के लिए कोई कारण साबित किया हालाँकि
अल्लाह तआला ने धार्मिक तौर पर या ब्रह्मांड के नियमों के अनुसार उसे उसके लिये
कारण नहीं बनाया है, तो उस ने अल्लाह के साथ शिर्क किया। इसी तरह जो आदमी किसी चीज़
को उस से बरकत प्राप्त करने की आशा से छूता है जबकि अल्लाह तआला ने उस में बरकत
नहीं रखी है, जैसे कि मस्जिदों के द्वार का चुंबन करना, उनकी चौकठों को छूना, उन
की मिट्टी (धूल) से रोग निवारण चाहना, और ऐसे ही अन्य कार्य।
शिर्क
के बड़े और छोटे दो भागों में विभाजन के बारे में यह संछिप्त वर्णन है, इसके
विस्तार को इस संछिप्त उत्तर में संपूर्ण रूप से समेटना असंभव है।
निष्कर्ष:
इस
वक्तव्य के बाद : मुसलमान पर अनिवार्य है कि वह छोटे और बड़े शिर्क से बचाव करे, सब
से महान पाप जिस के द्वारा अल्लाह तआला की अवज्ञा की गयी है वह उस के साथ शिर्क
(अर्थात् किसी को साझीदार बनाना), और उस के एक मात्र अधिकार : अकेले और अद्वितीय
रूप से उस की उपासना और आज्ञापालन, का हनन करना है।
इसी
लिए उस ने मुशरिकों (अनेकेश्वरवादियों) के लिए अनंत काल के लिए नरक में रहना
अनिवार्य कर दिया है और यह सूचना दी है कि वह उन्हें क्षमा नहीं करेगा, और उन पर
स्वर्ग को हराम कर दिया है जैसाकि अल्लाह तआला का फरमान है : "अल्लाह तआला
अपने साथ शिर्क किए जाने को क्षमा नहीं करेगा, और इस के अतिरिक्त जिसे चाहेगा
क्षमा कर दे गा, और जो अल्लाह के साथ शिर्क करे उस ने अल्लाह पर भारी आरोप
गढ़ा।" (सूरतुन-निसा: 48)
तथा
अल्लाह तआला ने फरमाया : "जो अल्लाह के साथ शिर्क करेगा अल्लाह ने उस पर
जन्नत हराम कर दी है और उस का ठिकाना नरक है और ज़ालिमों (अन्यायियों) का कोई
सहयोगी न होगा।" (सूरतुल माईदा : 72)
अत:
प्रत्येक बुद्धि वाले और धार्मिक व्यक्ति को चाहिये कि वह अपने ऊपर शिर्क से भय
खाये और अपने पालनहार का शरण ढूंढ़े उस से यह आह्वान करते हुये कि उसे शिर्क से
मुक्ति प्रदान कर दे, जैसाकि इब्राहीम खलील अलैहिस्सलाम ने प्रार्थना करते हुये
कहा था : "तथा मुझे और मेरी संतान को मूर्ति पूजा से सुरक्षित रख।"
(सूरत इब्राहीम : 35)
एक
सलफ (पूर्वज) का कथन है : "इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बाद शिर्क से कौन निर्भय
हो सकता है।"
अत:
सच्चे उपासक को चाहिए कि शिर्क से उस का भय बढ़ जाये, और अपने पालनहार की ओर इस
विषय में उस की अभिरूचि अधिक हो जाये कि वह उसे शिर्क से सुरक्षित रखे, साथ ही उसे
यह महान दुआ भी करनी चाहिए जो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने सहाबा
(साथियों) को सिखाई था जिस समय आप ने उन से फरमाया : "तुम्हारे अंदर शिर्क
चींटी का चाल से भी अधिक सूक्ष्म (गुप्त) है, और मैं तुझे एक ऐसी चीज़ बताऊँगा कि
जब तुम उसे कर लोगे तो वह तुम से छोटे और बड़े शिर्क को समाप्त कर देगी, तुम कहो
:
"अल्लाहुम्मा
इन्नी अऊज़ो बिका अन् उश्रिका बिक व अना आ'लम, व अस्तग़फिरूका लिमा ला आ'लम"
"ऐ
अल्लाह मैं इस बात से तेरे शरण में आता हूँ कि मैं जानबूझ कर तेरे साथ शिर्क करूँ,
और मैं उस चीज़ से तेरी क्षमा चाहता हूँ जिसे मैं नहीं जानता।" ( इस हदीस को
अल्बानी ने सहीहुल जामिअ़ (373) में सहीह कहा है।)
अभी
तक जो बातें वर्णन की गई हैं, उन में वास्तविकता के एतिबार से छोट और बड़े शिर्क के
बीच अंतर, हर क़िस्म (प्रकार) की परिभाषा और उस के भेदों का उल्लेख किया गया है।
जहाँ
तक हुक्म के एतिबार से उन दोनों के बीच अंतर का संबंध है :
तो
वह यह है कि शिर्क अक्बर (बड़ा शिर्क) इस्लाम से निष्कासित कर देता है, चुनाँचि
शिर्क अक्बर करने वाले पर इस्लाम से बाहर निकल जाने और उस के मुर्तद्द हो जाने का
हुक्म लगाया जायेगा, अत: वह काफिर व मुर्तद्द हो जायेगा।
जहाँ
तक छोटे शिर्क का संबंध है तो वह इस्लाम से बाहर नहीं निकालता है, बल्कि कभी-कभी
मुसलमान से भी छोटा शिर्क हो जाता है और वह अपने इस्लाम पर बाक़ी रहता है, किन्तु
उसका करने वाला एक बड़े खतरे पर होता है, क्योंकि छोटा शिर्क बड़े गुनाहों (घोर पाप)
में से है, यहाँ तक कि इब्ने मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु का कहना है: "मेरे लिए
अल्लाह तआला की झूठी क़सम खाना इस बात से अधिक पसंदीदा है कि मैं अल्लाह के अलावा
किसी दूसरे की सच्ची क़सम खाऊँ।"
तो
आप रज़ियल्लाहु अन्हु ने गैरूल्लाह की क़सम (जो कि छोटा शिर्क है) को अल्लाह तआला की
झूठी क़सम खाने से भी अधिक घृणित (घिनावना) क़रार दिया, और यह बात सर्वज्ञात है कि
अल्लाह तआला की झूठी क़सम खाना कबीरा (बड़े) गुनाहों में से है।
हम
अल्लाह तआला से दुआ करते हैं कि हमारे दिलों को अपने धर्म पर सुदृढ़ और साबित रखे
यहाँ तक हम उस से जा मिलें, और हम इस बात से अल्लाह सुब्हानहु व तआला की इज़्ज़त के
शरण में आते हैं कि वह हमें पथभ्रष्ट कर दे ; वही जीवित है जिसे कभी मृत्यु नहीं
आयेगी और जिन्न और मानव सब मर जायेंगे। और अल्लाह तआला ही सर्वाधिक ज्ञान रखने
वाला और सब से बड़ा बुद्धिमान है, और उसी की ओर सब को पलटना और लौट कर जाना है।