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वह कौन सी बीमारी है जो रोज़ेदार के लिए रोज़ा तोड़ना वैध कर देती है ॽ

वह कौन सी बीमारी है जो मनुष्य के लिए रमज़ान के महीने में रोज़ा तोड़ना वैध कर देती है ॽ क्या किसी भी बीमारी के कारण रोज़ा तोड़ना जाइज़ है चाहे वह कोई हल्की बीमारी ही क्यों न हो ॽ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

अधिकांश विद्वान, जिन में चारों इमाम भी शमिल हैं, इस बात की ओर गये हैं कि बीमार व्यक्ति के लिए रमज़ान में रोज़ा तोड़ना जाइज़ नहीं है सिवाय इसके कि उसकी बीमारी गंभीर (सख्त) हो।

गंभीर बीमारी से अभिप्राय यह है कि :

1- रोज़े के कारण बीमारी बढ़ जाए।

2- रोज़े के कारण अरोग्य (शिफायाबी) विलंब हो जाए।

3- उसे बहुत कष्ट और कठिनाई पहुँचती हो, भले ही उसकी बीमारी में वृद्धि या अरोग्य में विलंब न होता हो।

4- विद्वानों ने इसी के साथ उस व्यक्ति को भी संबंधित किया है जिसे रोज़े के कारण बीमार पड़ने की आशंका हो।

इब्ने क़ुदामा रहिमहुल्लाह “अल-मुग़्नी” (4/403) में फरमाते हैं :

“रोज़ा तोड़ने वाली बीमारी वह है जो गंभीर हो जो रोज़े से बढ़ती हो, या उसके स्वस्थ होने में विलंब का डर हो। इमाम अहमद से कहा गया : बीमार रोज़ा कब तोड़ेगा ॽ उन्हों ने कहा : जो वह रोज़ा रखने में सक्षम न हो। कहा गया : उदाहरण के तौर पर बुखार ॽ उन्हों ने कहा : बुखार से बढ़कर गंभीर (सख्त) कौन सी बीमारी है ! . .

स्वस्थ आदमी जिसे रोज़े के कारण बीमारी से ग्रस्त होने का डर है वह रोज़ा तोड़ने की वैधता में उस बीमार आदमी की तरह है जिसे बीमारी के बढ़ने का डर होता है ; क्योंकि बीमार आदमी के लिए रोज़ा तोड़ देना इसलिए वैध किया गया है कि उसे रोज़े के कारण एक नयी चीज़ के पेश आने का डर होता है और वह बीमारी का बढ़ना और लंबी होना है, अतः नवीन रूप से बीमारी का पैदा होना भी उसी के अर्थ में है।) (अंत हुआ)

नववी ने “अल-मजमूअ्” (6/261) में फरमाया :

“किसी ऐसी बीमारी के कारण जिसके दूर होने की आशा की जाती है रोज़ा रखने में असमर्थ व्यक्ति के लिए रोज़ा रखना आवश्यक नहीं है . . . और यह उस स्थिति में है कि उसे रोज़े के कारण प्रत्यक्ष रूप् से कष्ट और कठिनाई होती हो, और इस बात की शर्त नहीं है कि वह ऐसी स्थिति को पहुँच जाये जिसमें रोज़ा रखना संभव नहीं होता है, बल्कि हमारे असहाब का कहना है : रोज़ा तोड़ने के जाइज़ होने की शर्त यह है कि उसे रोज़े के कारण ऐसी कठिनाई होती हो जिसका सहन करना कष्टदायक हो।” (अंत हुआ)

तथा कुछ विद्वान इस बात की ओर गए हैं कि प्रत्येक रोगी के लिए रोज़ा तोड़ना जाइज़ है यद्यपि उसे रोज़े के कारण कठिनाई न होती हो। परंतु यह एक विचित्र कथन है जिसे विद्वानों की बहुमत ने रद्द कर दिया है।

नववी ने फरमाया :

“साधारण बीमारी जिस से प्रत्यक्ष कठिनाई नहीं होती है उसके कारण हमारे निकट बिना किसी मतभेद के रोज़ा तोड़ना जाइज़ नहीं है।” अल-मजमूअ़् (6/261).

तथा शैख इब्ने उसैमीन ने फरमाया :

“वह बीमार जो रोज़ा से प्रभावित नहीं होता है, उदाहरण के तौर पर साधारण ज़ुकाम, या साधारण सिर दर्द, दाँत का दर्द और इसके समान अन्य बीमारियाँ, तो ऐसे व्यक्ति के लिए रोज़ा तोड़ना जाइज़ नहीं है। यद्यपि कुछ विद्वानों का कहना है कि क़ुर्आन की आयत : ﴿وَمَنْ كَانَ مَرِيضاً﴾ [البقرة : 185] “और जो बीमार हो।” (सूरतुल बक़रा : 185) के आधार पर उसके लिए रोज़ा तोड़ना जाइज़ है। किंतु हम कहेंगे कि : यह आदेश एक कारण के साथ संबंधित है और वह यह कि रोज़ा तोड़ देना उसके लिए अधिक आसानी का पात्र हो, परंतु अगर वह रोज़ा से प्रभावित नहीं होता है तो उसके लिए रोज़ा तोड़ना जाइज़ नहीं है, बल्कि उसके ऊपर रोज़ा रखना अनिवार्य है।” (अंत हुआ) अश्शर्हुल मुमते (6/352).

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।
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