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गरीब को हज्ज करने के लिए ज़कात का माल देना

क्या गरीब आदमी को हज्ज के फरीज़ा की अदायगी के लिए ज़कात के माल से देना जाइज़ है ?

हर प्रकरा की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिये योग्य है।

अल्लाह तआला ने ज़कात को खर्च करने के स्थानों का अपने इस फरमान में उल्लेख किया है : "ख़ैरात (ज़कात) तो बस फकीरों का हक़ है और मिसकीनों का और उस (ज़कात) के कर्मचारियों का और जिनके दिल परचाये जा रहे हों और गुलाम के आज़ाद करने में और क़र्ज़दारों के लिए और अल्लाह की राह (जिहाद) में और मुसाफिरों के लिए, ये हुकूक़ अल्लाह की तरफ से मुक़र्रर किए हुए हैं और अललाह तआला बड़ा जानकार हिकमत वाला है।" (सूरतुत्तौबा : 60)

तथा विद्वानों की इस बात पर सर्व सहमति है कि अल्लाह तआला के फरमान (व फी सबीलिल्लाह) से मुराद अल्लाह के मार्ग में जिहाद है।

फिर उन का इस बारे में मतभेद है कि क्या जिहाद के साथ हज्ज भी सम्मिलित है या नहीं ?

तो अधिकांश विद्वान इस बात की ओर गये हैं कि यह जिहाद के साथ विशिष्ट है और हज्ज को शामिल नहीं है। और इमाम अहमद इस बात की ओर गये हैं कि इस में हज्ज भी दाखिल है, और उन्हों ने उस हदीस से दलील पकड़ी है जिसे अबू दाऊद (हदीस संख्या : 1988) ने उम्मे माक़िल से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा कि : ऐ अल्लाह के पैग़ंबर ! मेरे ऊपर हज्ज अनिवार्य है और अबू माक़िल के पास एक जवान ऊँट है, अबू माक़िल ने कहा : उस ने सच्च कहा, मैं ने उसे अल्लाह के रास्ते में कर दिया है, तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : उसे दे दो कि वह उस पर हज्ज करे, क्योंकि यह (अर्थात् हज्ज) भी अल्लाह के रास्ते में है।" इसे अल्बानी ने सहीह अबू दाऊद में सहीह कहा है।

तथा इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने से साबित है कि उन्हों ने कहा : सुनो ! नि:सन्देह हज्ज अल्लाह के रास्ते में से है। हाफिज़ (इब्ने हजर) ने कहा है : इसे अबू उबैद ने सहीह इस्नाद के साथ उल्लेख किया है। (समाप्त हुआ)

देखिये : अल-मुग़नी (9/328) और अल-मजमूअ़ (6/212)

तथा शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिय्या ने "इख्तियारात" (105) में फरमाते हैं :

"जिस ने इस्लाम का हज्ज (अर्थात् फर्ज़ हज्ज) नहीं किया है और वह गरीब है तो उसे हज्ज करने भर का धन दिया जायेगा।" अर्थात् ज़कात के माल से दिया जायेगा।

तथा स्थायी समिति के फतावा (10/38) में आया है कि :

"मुसलमान गरीबों को इस्लाम के फरीज़े के हज्ज के लिए सवारी उपलब्ध कराने और उस में उनका खर्च उठाने में ज़कात का माल देना जाइज़ है, क्योंकि ज़कात के मसारिफ की आयत में अल्लाह तआला के फरमान "व फी सबीलिल्लाह" (और अल्लाह के रास्तें में) के सामान्य अर्थ में यह भी दाखिल है।" (फताव स्थायी समिति 10/38)

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।

इस्लाम प्रश्न और उत्तर
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