154850: शाबानिया (शब-ए-बारात) की बिदअत


शाबानिया (शब-ए-बारात) क्या है जिसका दक्षिण एशिया के बहुत से मुसलमान जश्न मनाते हैंॽ

Published Date: 2018-04-27

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

कुछ मुसलमान अर्द्ध शाबान (पंद्रहवीं शाबान) के दिन का जश्न मनाते हैं, उसके दिन का रोज़ा रखते हैं और उसकी रात को क़ियाम करते (उपासना में बिताते) हैं। इस बारे में एक हदीस वर्णित है जो सही नहीं है। इसीलिए विद्वानों ने इस दिन के जश्न मनाने को बिद्अत (विधर्म) शुमार किया है। 

शातिबी रहिमहुल्लाह ने फरमाया : “बिदअत धर्म में एक ऐसे तरीक़े का नाम है जिसे गढ़ लिया गया है जो शरीअत की बराबरी करता है, जिस पर चलने का मक़सद अल्लाह सुब्हानहू व तआला की उपासना में अतिश्योक्ति से काम लेना होता है . . .

उन्हीं (बिदअतों) में से : कुछ निर्धारित तरीक़ों और कैफियतों की पाबंदी करना है, जैसे कि सामूहिक रूप से एक ही आवाज़ में ज़िक्र करना, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म के दिन को उत्सव (त्योहार) का अवसर बना लेना और इसके समान अन्य चीज़ें।

उन्हीं में से : कुछ निर्धारित समयों में कुछ निर्धारित इबादतों की प्रतिबद्धता है, जिसका निर्धारण शरीअत में वर्णित नहीं है, जैसे कि पंद्रह शाबान के दिन रोज़ा रखना और उसकी रात को क़ियाम करना।

''अल-एतिसाम'' (1/37-39) से समाप्त हुआ।

मुहम्मद अब्दुस्सलाम अश-शुक़ैरी कहते हैं : इमाम अल-फ़त्तनी (भारत में गुजरात प्रदेश के जिला “पाटन” की ओर संबंधित) ने अपनी पुस्तक “तज़्किरतुल-मौज़ूआत” में फरमाया : अर्द्ध शाबान की रात को अविष्कार कर लिए गए नवाचारों में से “हज़ारी नमाज़” है, जो एक सौ रकअत है जिसमें सूरत अल-इख़्लास को प्रत्येक रक्अत में दस-दस बार पढ़ा जाता है और यह नमाज़ जमाअत के साथ पढ़ी जाती है। वे जुमुआ (जुमा) और ईदैन की नमाज़ों की तुलना में इस पर अधिक ध्यान देते हैं। हालांकि इसके बारे में ज़ईफ़ (कमज़ोर) या मौज़ू (मनगढ़ंत) को छोड़कर कोई हदीस या असर वर्णित नहीं है। तथा इस तथ्य से धोखा नहीं खाना चाहिए कि इसे “क़ूतुल-क़ुलूब” और “एह्याओ उलूमिद्दीन” वग़ैरह के लेखकों ने इसका उल्लेख किया है, और न ही इस बात से (धोखा होना चाहिए) कि “तफ़्सीर अस-सालबी” में उल्लेखित किया गया है कि वह लैलतुल-क़द्र है।” उद्धरण समाप्त हुआ।

अल्लामा अल-इराक़ी ने कहा : अर्द्ध (शाबान) की रात की नमाज़ से संबंधित हदीस झूठी है। तथा इब्नुल-जौज़ी ने उसे “अल-मौज़ूआत” (मनगढ़ंत हदीसों का संकलन) में उल्लेख किया है।

अर्द्ध (शाबान) की रात को नमाज़ और दुआ से संबंधित हदीस के बारे में अध्याय :

हदीस : “जब अर्द्ध शाबान की रात हो तो उसकी रात को क़ियाम करो (उपासना में बिताओ) और उसके दिन का रोज़ा रखो।” हदीस के अंत तक। इसे इब्न माजा ने अली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है। उसके मुहश्शी (टीकाकार) का कहना हैः “अज़्ज़वाइद” में है कि इब्न अबी बुसरा के ज़ईफ़ (कमज़ोर) होने के कारण इसकी इसनाद ज़ईफ़ (कमजोर) है। उसके बारे में अहमद और इब्न मुईन का कहना है कि : वह हदीस गढ़ा करता था।” उद्धरण समाप्त हुआ।

अर्द्ध शाबान की रात को आपदा टालने, लंबे जीवन और लोगों से निस्पृह होने के इरादे से छह रक्अत नमाज़ पढ़ना, और उनके बीच सूरत यासीन पढ़ना और दुआ करनाः इसमें कोई संदेह नहीं कि यह धर्म में एक नवाचार और संदेशवाहकों के सरदार की सुन्नत का उल्लंघन और विरोध है। 'एह्याओ उलूमिद्दीन' के टिप्पणीकार ने कहा : यह नमाज़ बाद के सूफी सज्जनों की किताबों में सुप्रसिद्ध है, लेकिन मैंने इस (नमाज़) के लिए या उसकी दुआ के लिए सुन्नत (हदीस) में कोई भी सही प्रमाण नहीं देखा है, सिवाय इसके कि यह कुछ मशाइख का अमल है। हमारे असहाब (साथियों) का कहना है : इन वर्णित रातों में से किसी रात को जागने (उपासना में बिताने) के लिए मस्जिदों या अन्य जगहों में इकट्ठा होना घृणित (नापसंदीदा) है। 'अन-नज्म अल-गैटी' अर्द्ध शाबान की रात को सामूहिक रूप से जागने के तरीक़े के विषय में कहते हैं : हिजाज़ के अधिकांश विद्वानों ने इसका खण्डन किया है, जिनमें अता, इब्न अबी मुलैका, मदीना के फुक़हा और इमाम मालिक के साथी शामिल हैं। उन लोगों का कहना है कि : यह सब एक बिद्अत (नवाचार) है, और उस रात को सामूहिक रूप से क़ियाम करने के बारे में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से या आपके सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम से कोई भी चीज़ वर्णित नहीं है। इमाम अन-नववी ने कहा : रजब और शाबान की नमाज़ें दो घृणित बिद्अतें (नवाचार) हैं।” “अस-सुनन वल-मुब्तदाआत” पृष्ठः 144 से समाप्त हुआ। 

इमाम अल-फ़त्तनी रहिमहुल्लाह ने ऊपर उद्धृत किए गए अपने कथन के बाद फरमाया : “आम लोग इस नमाज़ से इतना मुग्ध हो गए हैं कि उन्होंने इसके लिए बहुत अधिक ईंधन जमा कर रखा है और इसके परिणाम स्वरूप कई बुराइयाँ और अपराध जन्म लेते हैं जिनका वर्णन करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यहाँ तक कि औलिया (अल्लाह के क़रीबी दोस्तों) को ज़मीन में धंसा दिए जाने का भय हुआ और वे जंगलों में भाग गए। पहली बार यह नमाज़ 448 हिज्री में बैतुल-मक़्दिस में आरंभ हुई थी। ज़ैद बिन असलम ने कहा: हमने अपने मशाइख़ और फुक़हा (धर्मशास्त्रियों) में से किसी को भी बराअत की रात तथा अन्य रातों पर उसकी श्रेष्ठता की ओर ध्यान देते नहीं पाया है। इब्न देह्या ने कहा : बराअत की नमाज़ के बारे में वर्णित हदीसें मनगढ़ंत हैं और एक हदीस मक़्तूअ (जिसकी सनद ताबेई पर रुक जाती है, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तक नहीं पहुँचती) है। और जो भी एक ऐसी ख़बर के अनुसार कार्य करता है जो वास्तव में झूठ है, तो वह शैतान का नौकर है।

अल-फ़त्तनी की “तज़्किरतुल-मौज़ूआत” पृष्ठः 45 से समाप्त हुआ। तथा देखें : इब्नुल-जौज़ी की अल-मौज़ूआत (2/127), इब्नुल-क़ैयिम की अल-मनार अल-मुनीफ फी अस्सहीह व अज़्ज़ईफ़ पृष्ठः 98, शौकानी की अल-फवाइद अल-मज्मूआ पृष्ठः 51.

 

कुछ लोग शाबानिया का शब्द, शाबान के आखिरी दिनों के लिए प्रयोग करते हैं और कहते हैं किः ये भोजन के लिए विदाई के दिन हैं। अतः वे रमज़ान की शुरूआत से पहले इन दिनों का खाने के लिए भरपूर फायदा उठाते हैं। कुछ विद्वानों का कहना है कि यह विचार मूल रूप से ईसाइयों से लिया गया है, जो अपने रोज़े की अवधि के निकट होने पर ऐसा ही करते थे।

निष्कर्ष यह है कि शाबान में कोई उत्सव नहीं है,  तथा उसके मध्य में या महीने के आखिरी दिनों में कोई विशिष्ट इबादत नहीं है। और ऐसा करना नवाचारों और बिदअतों में से है। और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

इस्लाम प्रश्न और उत्तर
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