69558: काफिरों के त्योहार के दिन दुकानों को खोलने का हुक्म


यदि कोई व्यक्ति ईद (त्योहार) के दिनों में अपनी दुकान खोल लेता है, तो क्या इसमें कोई निषेध हैॽ

Published Date: 2017-01-23

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

सर्व प्रथम :

मुसलमानों के त्योहारों (ईदुल-फित्र और ईदुल अज़्हा) के दिनों में मुसलमान के लिए अपनी दुकान को खोलने में कोई आपत्ति नहीं है, इस शर्त के साथ कि वह कोई ऐसी चीज़ न बेचे जिस से कुछ लोगों को अल्लाह तआला की अवज्ञा करने में मदद मिल सकती है।

दूसराः

रही बात उन दिनों में दुकानों को खोलने की जिन को गैर मुस्लिम लोग त्योहार बनाते हैं, जैसेः क्रिसमस और इसी तरह यहूदियों, या बौद्धों या हिंदुओं के त्योहारों के दिन, तो उन दिनों में भी दुकानों को खोलने में कोई हर्ज नहीं है, लेकिन शर्त यह है कि वह उनसे कोई ऐसी चीज़ न बेचे जिससे उन्हें उनके अवज्ञा के कामों में मदद मिल सकती है, जैसेः झंडे, बैनर, छवियों (फोटो), बधाई कार्ड, लालटेन, फूल, रंगीन अंडे और हर वह चीज़ जिसको वे अपने त्योहार को आयोजित करने के लिए इस्तेमाल करते हैं।

इसी प्रकार वह मुसलमानों से भी कोई ऐसी चीज़ नहीं बेचे गा जिससे वे काफिरों के त्योहारों में उन की समानता अपनाने में मदद ले सकते हैं।

इस विषय में बुनियादी सिद्धांत यह है कि मुसलमान व्यक्ति को अवज्ञा और पाप करने और ऐसा करने के लिए किसी की सहायता करने से मना किया गया है, क्योंकि अल्लाह तआला का फरमान हैः

 [ ﴿ وَتَعَاوَنُوا عَلَى الْبِرِّ وَالتَّقْوَى وَلا تَعَاوَنُوا عَلَى الإِثْمِ وَالْعُدْوَانِ وَاتَّقُوا اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ ﴾  [المائدة : 2

"नेकी और तक़्वा (परहेज़गारी) के कामों में एक दूसरे का सहयोग किया करो तथा पाप और अत्याचार पर एक दूसरे का सहयोग न करो, और अल्लाह से डरते रहो, नि:संदेह अल्लाह तआला कड़ी यातना देने वाला है।" (सूरतुल मायदा : 2)

शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिय्या रहिमहुल्लाह कहते हैं:

''तथा मुसलमान कोई ऐसी चीज़ नहीं बेचेगा जिस से मुसलमानों को त्योहार में उन काफिरों की नकल करने और उनकी छवि अपनाने में मदद मिल सकती है, जैसे- खाना, कपड़ा और इस जैसी अन्य चीज़ें; क्योंकि इसके अंदर बुराइयों पर मदद करना पाया जाता है।''

''इक़्तिज़ाउस्सिरातिल मुस्तक़ीम'' (2/520) से अंत हुआ।

तथा आप - रहिमहुल्लाह - ने फरमाया :

जहाँ तक मुसलमान का उन्हें (काफिरों को) उनके त्योहारों में ऐसी चीज़ों के बेचने का संबंध है जिनसे वे अपने त्योहार पर मदद हासिल करते हैं जैसे- खाना, कपड़ा, सुगंध और इनके समान अन्य चीज़ें, या फिर उन्हें ये चीज़ें उपहार में देने का संबंध है : तो इसके अंदर एक प्रकार से उनके हराम (निषिद्ध) त्योहार के मनाने पर उनकी मदद करना पाया जाता है।''

इब्न हबीब मालिकी रहिमहुल्लाह से उनका यह कथन उल्लेख किया गया है किः

''क्या तुम नहीं देखते कि मुसलमानों के लिए ईसाइयों से उनके त्योहार के हित से संबंधित कोई भी चीज बेचना हलाल (जायज़) नहीं है, चाहे वह मांस हो, या सालन, या कपड़ा। और न ही उन्हें कोई सवारी उधार दी जाएगी, और न ही उनके त्योहारों में उनकी किसी भी प्रकार की कोई सहायता की जाएगी। क्योंकि यह उनके शिर्क का सम्मान करने और उनके कुफ्र पर उनका सहयोग करने में शामिल है। अधिकारियों को मुसलमानों को ऐसा करने से मना करना चाहिए। यह इमाम मालिक वगैरह का कथन है, इसमें मुझे किसी भी मतभेद का ज्ञान नहीं है।''

''इक़्तिज़ा-उस्सिरातिल मुस्तक़ीम'' (2/526), ''अल-फतावा अल-कुब्रा'' (2/489), ''अहकामो अहलिज़्ज़िम्मा'' (3/1250).

तथा शैखुल इस्लाम रहिमहुल्लाह यह भी फरमाते हैं :

''यदि वे जिस चीज़ को खरीदते हैं उससे स्वयं हराम कार्य करते हैं जैसेः सलीब, या शआनीन (पाम, ईसाइयों का एक त्योहार जिसमें ईसा अलैहिस्सलाम के बैतुल-मक़्दिस में प्रवेष की यादगार मनाई जाती है), या बपतिस्मा, या गैरुल्लाह के लिए बलिदान करना, या चित्र आदि, तो इसके हराम होने में कोई संदेह नहीं है, जैसे कि उनसे जूस बेचना ताकि वे उसे शराब बना लें, और उनके लिए चर्च का निर्माण करना।

रही बात उन चीज़ों की जिनसे वे अपने त्योहारों में खाने, पीने और पोशाक के रूप में लाभ उठाते हैं, तो इमाम अहमद वगैरह के सिद्धांत उसकी कराहत (अनेच्छिक होने) की अपेक्षा करते हैं, लेकिन यह कराहत निषेध के तौर पर है, जैसा कि इमाम मालिक का मत है, या कि यह कराहत पवित्रता के तौर पर हैॽ सबसे संभावित बात यह है कि, उनके निकट शेष समरूप चीज़ों की तरह, यह कराहत निषेध के तौर पर है। क्योंकि वह उन फासिक़ों को रोटी, मांस और सुगंध बेचना जायज़ नहीं ठहराते हैं जो उनपर शराब पीते हैं। और इसलिए भी क्योंकि यह सहयोग असत्य धर्म को प्रकट करने तथा उनके त्योहार के लिए अधिक लोगों के इकट्ठा होने और उसके प्रदर्शन का कारण बनता है, जो एक विशेष व्यक्ति की मदद करने से भी बदतर है।''

''अल-इक़्तिज़ा'' (2/2/552)।

इब्न हजर मक्की रहिमहुल्लाह से एक काफिर को कस्तूरी बेचने के बारे में पूछा गया जिसके बारे में उसे पता है कि वह उसे अपनी मूर्ति को सुगंध लगाने के लिए खरीद रहा है, इसी प्रकार ऐसे काफिर से जानवर बेचना जिसके बारे में यह पता हो कि वह उसे शरई तरिक़े से ज़बह किए बिना मारकर खाएगाॽ

तो उन्होंने यह उत्तर दियाः ''दोनों सूरतों में बेचना हराम है, इसी तरह विद्वानों का यह कथन भी उसे शामिल हैः हर वह चीज़ जिसके बारे में बेचनेवाले को पता है कि खरीदने वाला उससे अवज्ञा करेगा, तो उसके ऊपर उससे वह चीज़ बेचना हराम है। मूर्ति को सुगंध लगाना और खाने वाले जानवर को बिना ज़बह किए वध करना दो बड़े पाप हैं, यहाँ तक कि उनके लिए भी। क्योंकि सबसे सही बात यह है कि मुसलमानों की तरह काफिर भी शरीअत के फैसलों (अहकाम) के संबोधित हैं। अतः ऐसी चीज़ बेचकर उनकी मदद करना जायज़ नहीं है जो उन दोनों कामों के करने का कारण बन सकती है। और यहाँ पर ज्ञान से अभिप्राय अनुमान की प्रबलता (यानी सबसे अधिक संभावित पहलू) है। और अल्लाह ही सबसे अधिक जानता है।''

''अल-फतावा अल-फिक़्हिय्या अल-कुब्रा'' (2/270) से अन्त हुआ।

निष्कर्ष यह कि मुसलमान के लिए काफिरों के त्योहारों के दिनों में अपनी दुकान को खोलना दो शर्तों के साथ जायज हैः

पहलीः उन काफिरों को कोई ऐसी चीज न बेचे जिसे वे पाप करने के लिए इस्तेमाल करते हैं, या जिससे उन्हें अपने त्योहार को मनाने में मदद मिलती है।

दूसरीः

मुसलमानों से कोई ऐसी चीज न बेचे जिससे उन्हें इन त्योहारों में काफिरों की नकल करने में मदद मिलती है।

इसमें कोई शक नहीं कि वहाँ कुछ ज्ञात चीजें हैं जो इन त्योहारों के लिए तैयार की जाती हैं, जैसे बधाई कार्ड,  चित्र, मूर्तियाँ, सलीबें और कुछ प्रकार के पेड़, तो इन वस्तुओं को बेचना जायज़ नहीं है, बल्कि मूलतः इन्हें दुकान में लाना ही जायज़ नहीं।

इसके अलावा जो चीज़ें हैं जिन्हें त्योहार वगैरह में इस्तेमाल किया जा सकता है, तो दुकान के मालिक को इजतिहाद से काम लेना चाहिए (यानी अपनी पूरी कोशिश करनी चाहिए) और उसे ऐसे आदमी को नहीं बेचना चाहिए जिसकी हालत से उसे यह ज्ञात हो, या अधिक गुमान हो कि वह (आदमी) उसे हराम काम में इस्तेमाल करेगा, या वह त्योहार को मनाने में उससे मदद लेगा,  जैसे कपड़े, सुगंध और खाद्य पदार्थ।

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।

इस्लाम प्रश्न और उत्तर
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