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मदद के ज़रूरतमंद एक प्राथमिक स्कूल को ज़कात का भुगतान करने का हुक्म

प्रकाशन की तिथि : 09-12-2015

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प्रश्न

यदि मदरसे (स्कूल) को आर्थिक सहायता की ज़रूरत है, तो क्या बच्चों को प्राथमिक शिक्षा देने वाले मदरसे को ज़कात देना जाजयज़ है?

उत्तर का पाठ

उत्तर :

सही बात यह है कि उस मदरसे (स्कूल) को ज़कात देना जायज़ नहीं है। ज़कात के हक़दार लोगों को अल्लाह ने अपने इस कथन में स्पष्ट किया है :

إِنَّمَا الصَّدَقَاتُ لِلْفُقَرَاءِ وَالْمَسَاكِينِ وَالْعَامِلِينَ عَلَيْهَا وَالْمُؤَلَّفَةِ قُلُوبُهُمْ وَفِي الرِّقَابِ وَالْغَارِمِينَ وَفِي سَبِيلِ اللَّهِ وَاِبْنِ السَّبِيلِ فَرِيضَةً مِنْ اللَّهِ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ [التوبة : 60] .

"सदक़े (ज़कात) तो मात्र फक़ीरों, मिसकीनों, उनकी वसूली के कार्य पर नियुक्त कर्मियोंऔर उन लोगों के लिए हैं जिनके दिलों को आकृष्ट करना और परचाना अभीष्ट हो, तथा गर्दनों को छुड़ाने, क़र्ज़दारों के क़र्ज़ चुकाने, अल्लाह के मार्ग (जिहाद) में और (पथिक) मुसाफिर पर खर्च करने के लिए हैं।यहअल्लाह की ओर से निर्धारित किए हुए हैं, और अल्लाह तआला बड़ा जानकार, अत्यंत तत्वदर्शी (हिकमत वाला)है।" (सूरतुत्तौबा : 60)

1- फक़ीर (गरीब) : वह व्यक्ति है जिसके पास कुछ न हो।

2- मिस्कीन : वह व्यक्ति है जिसके कुछ चीज़ें हों लेकिन वह पर्याप्त न हो।

3- सदक़ा का कर्मचारी: वह व्यक्ति है जिसे इमाम (शासक) ने इस लिए नियुक्त किया हो कि वह सदक़ात वसूल करके लाए। उसे उसके कार्य के अनुसार (ज़कात के माल) से दिया जाएगा, भले ही वह मालदार हो।

4- जिनके दिलों को परचाया जाता हो, यह वो लोग हैं जिन्हें नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इस्लाम के लिए आकर्षित करते और उनसे लगाव पैदा करते थे ताकि वे मुसलमान हो जाएं या उनकी बुराई को दूर कर सकें या ताकि उनका इरादा दृढ़़ हो जाए और वे इस्लाम पर जम जाएं। तो वे तीन प्रकार के लोग थे।

5- गर्दनों को छुड़ाना, इससे अभिप्राय वे गुलाम हैं जिन्हों ने अपने मालिकों से कुछ धन का भुगतान कर आज़ादी पर समझौता कर लिया हो, या बिना किसी समझौता के गुलामों को आज़ाद करने के लिए भुगतान करना।

6- क़र्ज़दार, इससे अभिप्राय वह क़र्जदार (ऋणी) है जो अपने क़र्ज को चुकाने में असमर्थ हो।

7- अल्लाह के रास्ते में, इससे अभिप्राय वे सैनिक हैं जो अल्लाह के रास्ते में जिहाद (संघर्ष) और इस्लाम के कलिमा को सर्वोपरि करने के लिए समर्पित हों।

8- पथिक मुसाफिर, वह परदेसी मुसाफिर जो अपने माल से कट गया हो, उसे ज़कात से इतनी राशि दी जायेगी जिससे उसकी आवश्यकता पूरी हो जाए, भले ही वह अपने देश में धनवान हो।

ज़कात देने वाले को इस बात की अनुमति और अधिकार है कि वह इन सभी वर्ग के लोगों को ज़कात देया इन में से कुछ को दे, चाहे वह किसी भी वर्ग से कोई एक ही क्यों न हो। कुछ लोगों ने ‘‘और अल्लाह के रास्ते में’’ के शब्द में विस्तार से काम लिया है, जबकि राजेह (वज़नदार बात) यह है कि वह जिहाद के बारे में है, और उसमें हज्ज के दाखिल होने की संभावना है।

इब्ने कसीर रहिमहुल्लाह कहते हैं: ‘‘रही बात ''फी सबीलिल्लाह'' (अल्लाह के रास्ते में) की तो उनमें वे योद्धा (मुजाहिदीन) हैं जिनका कोई सरकारी वेतन न हो। तथा इमाम अहमद, हसन, और इसहाक़ के निकट ‘हज्ज’ अल्लाह के रास्ते में से है। इस बारे में वर्णित हदीस के आधार पर। ''तफसीर इब्न कसीर'' (2/367).

और हदीस से अभिप्राय वह हदीस है जो मुसनद इमाम अहमद में साबित है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : ‘‘हज्ज और उम्रा अल्लाह के रास्ते में से हैं।’’

सारांश यह कि : इस मदरसा के लिए ज़कात का भुगतान करना जायज़ नहीं है, सिवाय इसके कि उसके छात्र गरीब हों या इन आठ वर्गों में से किसी वर्ग के अंतर्गत आते हों। शरीअत में इस मदरसा की मदद के लिए दरवाज़े खुले हुए हैं, जैसे, सदक़ात व खैरात, दान, और वक़्फ़ (धर्माथ दान)। और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

इस्लाम प्रश्न और उत्तर

स्रोत: शैख मुहम्मद सालेह अल-मुनज्जिद

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