Sun 20 Jm2 1435 - 20 April 2014
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वह उम्रा को पूरा करने से पहले हलाल हो गया फिर कुछ दिनों के बाद वापस आकर उसे पूरा किया

चार साल पहले मैं अपने पिता के साथ रमज़ान में उम्रा के लिए गया, मेरे पिता बड़ी उमर के (वयोवृद्ध) हैं, पहले तवाफ (चक्कर) के समय ही वह तवाफ करने से रूक गए और चलने पर सक्षम नह हो सके, फिर हम अपने शहर वापस आ गए, फिर मैं उसके दो दिन बाद मक्का गया और नये सिरे से उम्रा किया, और मेरे साथ मेरा भाई भी आया और उसने मेरे पिता की ओर से उम्रा किया, तो इसके बारे में क्या हुक्म है ॽ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

सर्व प्रथम :

जिस व्यक्ति ने हज्ज या उम्रा का एहराम बाँधा है उसके लिए उसे मुकम्मल करने से पहले उससे हलाल हो जाना या उसे समाप्त कर देना जायज़ नहीं है, क्योंकि अल्लाह तआला का फरमान है :

﴿وَأَتِمُّوا الْحَجَّ وَالْعُمْرَةَ لِلَّهِ﴾ [البقرة : 196]

“अल्लाह के लिए हज्ज और उम्रा को पूरा करो।” (सूरतुल बक़रा : 196).

अगर आपके पिता मक्का वापस लौटने और उस उम्रा को पूरा करने पर सक्षम हैं जिसका उन्हों ने एहराम बाँधा था तो उनके ऊपर ऐसा करना अनिवार्य है, और उनके लिए उसे पूरा किए बिना उस से हलाल होना संभव नहीं है जब तक कि वह उस पर सक्षम हैं।

यदि कोई प्रत्यक्ष उज़्र (कारण) पाया जाता है जो उन्हें उसे पूरा करने से रोक रहा है तो ऐसी हालत में वह मोहसर (जिसे हज्ज या उम्रा से रोक दिया गया हो) समझे जायेंगे, अतः वह अपने रोके जाने के स्थान पर एक जानवर ज़ब्ह करेंगें, या उसे मक्का में ज़ब्ह करेंगे और उसे हरम के गरीबों में वितरित कर देंगें, क्योंकि अल्लाह तआला का फरमान है :

﴿فَإِنْ أُحْصِرْتُمْ فَمَا اسْتَيْسَرَ مِنَ الْهَدْيِ﴾ [البقرة : 196]

“यदि तुम रोक दिए जाओ तो जो हदी (क़ुर्बानी का जानवर) तुम्हारे लिए आसान हो उसकी क़ुर्बानी करो।” (सूरतुल बक़रा : 196).

फिर हदी के जानवर की क़ुर्बानी करने के बाद अपने सिर के बाल मुँडा लें या उसे कटवा लें, इस प्रकार वह अपने उम्रा से हलाल हो जायेंगे।

और चूँकि आप के पिता अपनी बीमारी और वयोवृद्धि के कारण उम्रा को मुकम्मल नहीं कर सके और शहर लौट गए, तो ऐसी हालत में वह किसी को मक्का भेजेंगे जो वहाँ उनके लिए हदी के जानवर की क़ुर्बानी करके उसे हरम के गरीबों में आवंटित कर दे, फिर वह अपने सिर के बाल मुँडाएं या उसे छोटा करवाएं, तथा उनके ऊपर अनिवार्य है कि ऐसा होने तक एहराम की हालत में निषिद्ध चीज़ों से बचते रहें क्योंकि वह निरंतर उम्रा के एहराम की हालत में ही हैं यहाँ तक कि उस चीज़ को कर लें जिसके करने का अल्लाह तआला ने हज्ज या उम्रा से रोक दिए गए व्यक्ति को हुक्म दिया है।

तथा प्रश्न संख्या (37995) का उत्तर देखें।

यदि उन्हों ने अपने एहराम बाँधने (यानी उम्रा की नीयत करने) के समय शर्त लगाई थी और कहा था कि : “अल्लाहुम्मा महिल्ली हैसो हबसतनी” (ऐ अल्लाह ! मेरे हलाल होने की जगह वही है जहाँ तू मुझे रोक दे), तो वह उम्रा से हलाल हो जायेंगे, और उनके लिए हदी का जानवर ज़ब्ह करना, या सिर के बाल मुँडाना या कटाना, या कोई और चीज़ करना कुछ भी अनिवार्य नहीं है।

रही उस उम्रा की बात जिसे आपके भाई ने अपने पिता की ओर से किया है, तो वह अपनी जगह पर एक स्वतंत्र (स्थायी) उम्रा है, और वह आपके पिता की ओर से किफायत करेगा यदि वह अपनी वयोवृद्धि या ऐसी बीमारी के कारण जिससे स्वस्थ्य होने की आशा नहीं की जाती है, उम्रा करने में असमर्थ थे।

लेकिन यदि वह स्वयं उम्रा करने पर सक्षम थे, या ऐसी बीमारी से पीड़ित थे जिससे स्वस्थ्य होने की आशा की जाती है, तो फिर ऐसी स्थिति में उनकी ओर से उम्रा करना शुद्ध नही है।

तथा प्रश्न संख्या (41732) का उत्तर देखें।

दूसरा :

आपके मक्का में वापस लौटने के समय आपके ऊपर अनिवार्य यह था कि आप अपने उस उम्रा को पूरा करते जिसका आप ने अपने पिता के साथ एहराम बाँधा था, न कि आप नये सिरे से उम्रा करते ; क्योंकि आप अभी तक मोहरिम (एहराम की हालत में ही) हैं, इसलिए आपका दूसरी बार उम्रा का एहराम बाँधना व्यर्थ (अमान्य) समझा जायेगा, और आपका तवाफ व सई करना और सिर के बाल मुँडाना या कटवाना पहले उम्रा का पूरक समझा जायेगा।

तथा प्रश्न संख्या (48961) और (128712) का उत्तर देखें।

और अगर आप ने मक्का से वापस आने के बाद से फिर उम्रा पूरा करने के लिए मक्का लौटने तक, एहराम की हालत में निषिद्ध चीज़ों में से किसी चीज़ को किया है, तो आपके ऊपर हर उस निषिद्ध चीज़ का फिद्या देना अनिवार्य है जिसे आप ने किया है। हाँ, यदि आप इस से अनभिज्ञ थे तो आप से यह माफ हो जायेगा।

और अल्लाह ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।
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