Wed 16 Jm2 1435 - 16 April 2014
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अली की क़ब्र की ज़ियारत का सत्तर हज्ज के बराबर होने का मिथ्यावाद

प्रश्न : क्या अली रज़ियल्लाहु अन्हु और हुसैन और अब्बास वगैरह की क़ब्रों की ज़ियारत बैतुल्लाहिल हराम के सत्तर हज्ज के बराबर है ॽ और क्या अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह फरमाया है कि : “जिस व्यक्ति ने मेरी मृत्यु के बाद मेरे अह्ले बैत (घर वालों) की ज़ियारत की तो उसके लिए सत्तर हज्ज लिखा जाता है।” हम आप से अनुरोध करते हैं कि हमें इससे अवगत करायें। अल्लाह तआला आपको बेहतरीन बदला प्रदान करे।

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

क़ब्रों की ज़ियारत करना सुन्नत है और उसमें नसीहत, सदुपदेश और अनुस्मारण है, और यदि क़ब्रें मुसलमानों की हैं तो वह उनके लिए दुआ भी करे . . . नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम क़ब्रों की ज़ियारत करते थे और मृतकों के लिए दुआ करते थे, और इसी तरह आपके सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम भी थे, अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फरमाते हैं : “क़ब्रों की ज़ियारत करो क्योंकि यह तुम्हें आखिरत का स्मरण कराती है।” तथा आप अपने सहाबा को यह शिक्षा देते थे कि जब वे क़ब्रों की ज़ियारत करें तो यह दुआ पढ़े :

السلام عليكم أهل الديار من المؤمنين والمسلمين وإنا إن شاء الله بكم لاحقون ،   نسأل الله لنا ولكم العافية

उच्चारणः “अस्सलामो अलैकुम अह्लद्दियारे मिनल मोमिनीन वल मुस्लिमीन, वइन्ना इन शा अल्लाहो बिकुम लाहिक़ून, नस्अलुल्लाहा लना व लकुमुल आफियह”

ऐ मोमिनों और मुसलमानों के घराने वालो ! तुम पर सलाम (शान्ति) होए, इन शा अल्लाह हम तुम से मिलने वाले हैं, हम अल्लाह तआला से अपने लिए और तुम्हारे लिए आफियत का प्रश्न करते हैं।”  इसे मुस्लिम ने अपनी सहीह (हदीस संख्या : 975, 974) में रिवायत किया है।

तथा आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की हदीस में है कि :

  يرحم الله المستقدمين منا والمستأخرين

उच्चारण : “यरहमिल्लाहुल मुस्तक़्देमीना मिन्ना वल मुस्ताखेरीन”

अल्लाह तआला हम में से पहले जानेवालों और बाद में जानेवालों पर दया करे। (यानी जो मर चुके और जो बाद में मरेंगे उन सब पर दया करे).

तथा इब्ने अब्बास की हदीस में है :

يغفر الله لنا ولكم ، أنتم سلفنا ونحن في الأثر

उच्चारण : “यगफिरिल्लाहो लना व लकुम, अंतुम सलफुना व नह्नो फिल असर”

अल्लाह तआला हमें और आपको क्षमा प्रदान करे, तुम हमारे पूर्वज (आगामी) हो और हम तुम्हारे पीछे आने वाले हैं।

अतः उनके लिए यह और इसके समान अन्य दुआयें करना अच्छी बात है, और ज़ियारत करने में अनुस्मारण, याद् दहानी और नसीहत है ताकी मोमिन उस चीज़ के लिए तैयारी करे जो उनके साथ पेश आई है और वह मृत्यु है, क्योंकि उसके साथ भी वही चीज़ घटने वाली है जो उनके साथ घट चुकी है। इसलिए वह तैयारी कर ले और अल्लाह की आज्ञाकारिता और उसके पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की आज्ञाकारिता में भरपूर कोशिश और संघर्ष करे, और उन सभी पापों से दूर रहे जिन्हें अल्लाह और उसके पैगंबर ने हराम (निषिद्ध) करार दिया है। और उससे जो कोताही हो चुकी है उससे तौबा और पश्चाताप करे, इस प्रकार मोमिन ज़ियारत से लाभ प्राप्त करता है . . परंतु आप ने जो यह उल्लेख किया है कि अली रज़ियल्लाहु अन्हु या हसन या हुसैन या इनके अलावा की क़ब्रों की ज़ियारत करना सत्तर हज्ज के बराबर है - तो यह बात असत्य है और पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर झूठ गढ़ी हुई है, इसका कोई आधार नहीं है। तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़ब्र की ज़ियारतः जो कि सबसे श्रेष्ठ हैं एक हजज के बराबर भी नहीं है, जबकि आपके क़ब्र की ज़ियारत की एक अपनी स्थिति है और उसकी एक प्रतिष्ठा है परंतु वह हज्ज के बराबर नहीं है, तो फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अलावा की ज़ियारत (हज्ज के बराबर) कैसे हो सकती है ॽ यह एक झूठ बात है। इसी तरह उनका यह कहना कि (जिसने मेरी मृत्यु के बाद मेरे घर वालों की ज़ियारत की तो उसके लिए सत्तर हज्ज लिखा जाता है।” इन सबका कोई आधार नहीं है और ये सबके सब असत्य हैं, और यह सब झूठ बोलनेवालों का झूठ हैं। अत मुसलमान के लिए ज़रूरी है कि वह पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर झूठ गढ़ी हुई इन चीज़ों से बचे।

क़ब्रों की ज़ियारत करना मसनून है चाहे वह अह्ले बैत की क़ब्रें हों या उनके अलावा अन्य मुसलमानों की, वह उनकी ज़ियारत करे, उनके लिए दुआ करे, उनपर दया भेजे और वापस हो जाए।

परंतु यदि क़ब्रें काफिरों की हैं तो उनकी ज़ियारत मात्र नसीहत और याद् दहानी के लिए होगी, उनके लिए दुआ नहीं की जायेगी, जैसाकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी माँ की क़ब्र की ज़ियारत की और आपके पालनहार ने आपको उनके लिए मग्फिरत (क्षमा) की दुआ करने से रोक दिया, आप ने उनकी ज़ियारत नसीहत और अनुस्मारण के लिए की और उनके लिए मग़्फिरत की दुआ नहीं की, इसी तरह अन्य क़ब्रों अर्थात अविश्वासियों (ग़ैर मुस्लिमों) की क़ब्रों की यदि विश्वासी (मुसलमान) आदमी नसीहत के लिए ज़ियारत करता है तो कोई पाप नहीं है, परंतु वह उन्हें सलाम नहीं करेगा और उनके लिए मग़फिरत की दुआ नहीं करेगा क्योंकि वे लोग इसके अधिकृत नहीं हैं।

आदरणीय शैख अल्लामा अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुललाह बिन बाज़ रहिमहुल्लाह की किताब मजमूओ फतावा व मक़ालात मुतनौविअह 9/283
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