13642: क्रिसमस के त्योहार में कुछ महिलाओं को उपहार भेंट करना


क्रिसमस के समय पश्चिमी परंपराओं (आदतों) में से एक यह है कि कुछ ग़ैर मुस्लिम,  छोट और बड़े, एकत्र होते हैं और अपने नाम लिखकर उन्हें एक टोपी में डाल देते हैं और उन कागज़ों को मिश्रित कर देते हैं, फिर प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे व्यक्ति का नाम चुनता है, ताकि क्रिसमस के दिन वह उसे उपहार भेंट करे। इस परंपरा को "क्रिस क्रिंगल" (Kriss Kringle) कहा जाता है।

कुछ बहनों ने पिछले वर्ष इस विचार को अपनाते हुए उसके अनुसार कार्य किया। वे इस वर्ष भी इसे करना चाहती हैं। इस (परंपरा) का सार यह है कि प्रति बहन अपने अलावा किसी दूसरी बहन को अनियमित रूप से चुन लेती है और उसके उपर अनिवार्य हो जाता है कि वह उसके लिए 20 डॉलर का उपहार खरीदे।

कुछ बहनों का मानना है कि इस काम में काफिरों की समानता पाई जाती है, तो क्या यह सच है ?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

कुछ बहनों ने आप लोगों को जो नसीहत की है कि यह काम जाइज़ नहीं है, वह सच है। क्योंकि इसमें दो प्रकार से समानता पाई जाती है :

प्रथम : इस त्योहार को मनाना, और यह धार्मिक रूप से एक निषिद्ध चीज़ है। उसी में से इस त्योहार में उपहार भेंट करना भी है।

दूसरा : इन परंपराओं में काफिरों की, उनके इस नवीन अविष्कारित (मनगढ़ंत) त्योहार को मनाने के दिन में नकल करना।

हालांकि इस्लाम में केवल दो त्योहार हैं ; ईदुल फित्र और ईदुल अज़्हा। इन दोनों के अलावा जो भी त्योहार अविष्कार कर लिए गये हैं वह कुछ भी नहीं हैं, विशेषकर यदि वे अन्य धर्मों या इस्लाम से बाहर निकले हुए संप्रदायों के धार्मिक त्योहार हों।

तथा प्रश्न संख्या (947) का उत्तर देखना महत्वपूर्ण है।

इस काम के अंदर बिद्अतों (नवाचारों) के लिए द्वार खोलना पाया जाता है और वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस फरमान के सामान्य अर्थ में दाखिल है : "जिस व्यक्ति ने हमारे इसे मामले में कोई ऐसी चीज़ अविष्कार की जिसका उस से कोई संबंध नहीं है तो वह अस्वीकृत है।" इसे बुखारी (अध्यायः अस्सुल्ह -संधि- हदीस संख्याः 2499) और मुस्लिम (हदीस संख्याः 1718) ने रिवायत किया है। ओर अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।

शैख मुहम्द सालेह अल मुनज्जिद
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